उपदेश

विषय २ : व्यवस्था

[2-1] यदि हम नियमो के अनुसार कार्य करे, तो क्या वह हमें बचा पायेंगे? (लूका १०:२५-३०)

(लूका १०:२५-३०)
“और देखो, एक व्यवस्थापक उठा और यह कहकर उसकी परीक्षा करने लगा, “हे गुरु, अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूँ?” उसने उस से कहा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?” उसने उत्तर दिया, “तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्‍ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख ।” उसने उससे कहा, “तू ने ठीक उत्तर दिया, यही कर तो तू जीवित रहेगा। ” परन्तु उसने अपने आप को धर्मी ठहराने की इच्छा से यीशु से पूछा, “तो मेरा पड़ोसी कौन है?” यीशु ने उत्तर दिया, “एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए”। 
 
 
इंसानकी सबसे बड़ी समस्या 
कौन सी है?
वो गलत भ्रम में जी रहे है।

लूका १०:२८, “यदि यह कर तो जीवित रहेगा”।
लोग अपने गलत भ्रम में जीवन जी रहे है। ऐसा लगता है की वे ख़ास तौर पर इस में कमज़ोर है। वह काफी बुध्धिमान लगते है लेकिन आसिने से धोख़ा खा जाते है और अपने बुरे पक्षों से अनजान रहते है। हम जन्म से ही खुद के बारे में कुछ नहीं जानते फिर भी हम सब कुछ जानते है ऐसा दिखावा करते है। इंसान खुद के बारे में कुछ भी नहीं जानता, इसीलिए बाइबल बार बार कहती है की हम पापी है। 
लोग केवल खुद के पाप के अस्तिव के बारे में बात करते है। ऐसा लगता है की इंसान अच्छा कार्य करने में असमर्थ है, हालाकि, वे अपने आप को अच्छा दिखाने के लिए इच्छुक है। वह अपने अच्छे कार्यो के लिए गर्व करते है, हालाकि वे अपने होंठो से खुद को पापी कहते है।
वह जानते नहीं की उनमे कुछ भी अच्छा नहीं है और अच्छा करने की क्षमता भी नहीं है, इसलिए वे दूसरो को धोख़ा देने की कोशिश करते है और कई बार खुद को भी धोख़ा देते है। “हम पूरी रीति से दुष्ट नहीं है, हमारे अन्दर कुछ तो अच्छा है”। 
परिणाम स्वरुप, वो दूसरो की ओर देखके खुदको कहते है की, “अरे, काश उसने ऐसा न किया होता। अगर उसने ऐसा नहीं किया होता तो उसके लिए अच्छा होता। अगर उसने इस प्रकार से बात की होती तो कितना अच्छा होता। मुझे लगता है की इस रीति से सुसमाचार का प्रचार करना उसके लिए अच्छा रहेगा। उसने मुझसे पहले छूटकारा पाया है, इसलिए उसे छूटकारा पाए हुए व्यक्ति की तरह पेश आना चाहिए। मैंने अभी अभी छूटकारा पाया है, अगर मैं और जानू, तो उससे बहेतर कार्य करूंगा”। 
जब वह दुखी हो जाते है तब ऐसे लोग अपने हृदय में छूरी को ज्यादा तेज़ बनाते है। “तुम ठहर जाओ, तुम देखोगे की मैं तुमसे बिलकुल विपरीत हूं। तुम शायद सोचते होंगे की तुम मुझसे आगे हो, लेकिन थोडा ठहर जाओ। बाइबल में लिखा है की जो पीछे है वो आगे किए जाएंगे। मैं जानता हूं की यह मुझ पर लागू होता है। इंतज़ार करो में तुम्हें दिखाऊंगा”। लोग अपने आप को धोख़ा देते है। 
अगर वो दूसरी व्यक्ति के स्थान पर होता तो उसने भी वैसी ही प्रतिक्रिया दी होती। फिर भी वह उसका न्याय करता है। जब वो मंच पर खड़ा होगा, तब वो अचानक खुद को असहाय पाता है क्योंकि वह अपने पहिनावे के प्रति सचेत रहता है। जब पूछा जाता है की क्या आप में अच्छे कार्यो करने की क्षमता है तब ज्यादातर लोग कहेंगे, नहीं। लेकिन उनके अन्दर ऐसा भ्रम होता है की वे अच्छे काम करने की क्षमता रखते है। इसलिए, जब तक वे मरते नहीं तब तक अच्छे काम करने की कोशिश करेंगे। 
उनको लगता है की उनके दिल में ‘अच्छाई’ है इसलिए वो अच्छे काम करने की क्षमता रखते है। वे ऐसा भी मानते है की वह बहुत अच्छे है। वह कितने समय से धर्मी है इस बात को ध्यान में रखकर, ख़ास तौर पर उन लोगो के बिच जिन्होंने परमेश्वर की सेवा में अधिक प्रगति हांसिल की है, वह सोचते है, ‘मैं परमेश्वर के लिए सबकुछ कर सकता हूं। 
लेकिन अगर हम परमेश्वर को अपने जीवन से बहार निकाल दे, तो क्या हम अच्छाई कर पाएंगे? क्या मनुष्य में कुछ अच्छा है? क्या हम अच्छे काम करके जी पाएंगे? मनुष्य में अच्छे काम करने की क्षमता नहीं है। जब भी वे अपनी इच्छा के मुताबिक़ अच्छा काम करने की कोशिश करते है, तब वो पाप करते है। कुछ लोग यीशु पर विश्वास करने के बाद उसे बगल में रख देते है और अपने आप ही अच्छे बनने की कोशिश करते है। हम सभी के अन्दर बुराई के आलावा ओर कुछ भी नहीं है, इसलिए हम केवल बुरे काम ही करते है। अपने आप से (जिन्होंने उद्धार पा लिया है वे भी), हम केवल पाप ही करते है। यह हमारे देह की वास्तविकता है। 
 
हम हमेशा क्या करते है? 
अच्छाई या दुष्टता?
दुष्टता

हमारे भजन संग्रह में ‘परमेश्वर की स्तुति हो’ ऐसा एक गीत है जिसके बोल यह है, “यीशु के बगैर हम ठोकर खाते है। हम उस समुद्री जहाज जैसे बेकार है, जो बिना पतवार के समुद्र में डोलता है”। यीशु के बिना, हम केवल पाप ही करते है क्योंकि हम दुष्ट है। उद्धार पाने के बाद ही हम धार्मिक काम कर सकते है। 
प्रेरित पौलुस कहता है, “क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ” (रोमियों ७:१९)। यदि मनुष्य यीशु के साथ हो तो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, लेकिन फ़र्क तब पड़ता है जब वो यीशु के साथ किसी भी प्रकार का रिश्ता रखे बिना परमेश्वर के सन्मुख अच्छे काम करने की कोशिश करता है। तब जितना ज्यादा वह कोशिश करेगा उतना ही ज्यादा वह बुरा काम करता जाएगा। 
यहाँ तक की राजा दाऊद का भी यही हाल था। जब उसका राज्य शांत और समृद्ध था तब, एक शाम, वो छत पर टहलने के लिए गया। वहाँ वो प्रलोभन में गिरने वाला द्रश्य देखता है और दैहिक वासना के पाप में गिर जाता है। जब वो परमेश्वर को भूल गया तब वो किस के समान था? तब वो दुष्ट के समान था। उसने बतशेबा से व्यभिचार किया और उसके पति ऊरिय्याह को मार डाला, लेकिन दाऊद ने अपने आप की दुष्टता को नहीं पहिचाना। लेकिन उसने अपने कुकर्मो को छिपाने के लिए बहाने बनाए।
एक दिन नातान प्रबोधक उसके पास आया और बोला, “एक नगर में दो मनुष्य रहते थे, जिनमें से एक धनी और एक निर्धन था। धनी के पास तो बहुत सी भेड़-बकरियाँ और गाय बैल थे; परन्तु निर्धन के पास भेड़ की एक छोटी बच्‍ची को छोड़ और कुछ भी न था, और उसको उसने मोल लेकर जिलाया था। वह उसके यहाँ उसके बाल-बच्‍चों के साथ ही बढ़ी थी; वह उसके टुकड़े में से खाती, और उसके कटोरे में से पीती, और उसकी गोद में सोती थी, और वह उसकी बेटी के समान थी। फिर धनी के पास एक यात्री आया, और उसने उस यात्री के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाने को अपनी भेड़-बकरियों या गाय बैलों में से कुछ न लिया, परन्तु उस निर्धन मनुष्य की भेड़ की बच्‍ची लेकर उस जन के लिये, जो उसके पास आया था, भोजन बनवाया” (२ शमूएल १२:१-४)। 
दाऊद ने कहा, “जिस मनुष्य ने ऐसा कम किया वह प्राण दण्ड के योग्य है!” उसका कोप भड़का, इसलिए उसने कहा, “उसके पास तो अपने बहुत सारे थे; वह उसमे से ले सकता था। लेकिन उसके बदले, उसने अतिथि के लिए उस निर्धन मनुष्य की इकलौती भेड़ छीन ली। वह प्राण दण्ड के योग्य है!” तब नातान ने उससे कहा, “तू ही वह मनुष्य है”। यदि हम यीशु के पीछे नहीं चलेंगे और उसके साथ नहीं रहेंगे तो, नया जन्म पाए हुए लोग भी ऐसे पाप कर सकते है। 
यह सबके लिए एक जैसा ही है। हम यीशु के बगैर ठोकर खाते है और बुरे काम करते है। इसलिए हम आज भी परमेश्वर के आभारी है की, हमारे अन्दर दुष्टता होने के बावजूद भी यीशु ने हमें बचा लिया। “मैं क्रूस की छाव तले आराम करना चाहता हूं” हमारे हृदय यीशु में छुटकारे की छाव तले आराम कर रहे है, अगर यदि हम इस छाव को छोड़ खुद के पीछे जाएंगे तो कभी भी आराम नहीं कर पाएंगे। 
 
 
परमेश्वर ने हमें व्यवस्था से पहले विश्वास की धार्मिकता दी है
 
पहले किसका पालन करना चाहिए, 
विश्वास या व्यवस्था?
विश्वास

प्रेरित पौलुस कहता है की परमेश्वर ने हमें आरंभ से ही विश्वास की धार्मिकता दी है। उसने आदम और हव्वा को, कैन और हाबिल को, शेत और एनोश को, नूह को, अब्राहम को, इसहाक को और अंत में याकूब और उसके बारह बेटों को दी। व्यवस्था के बगैर भी वह परमेश्वर के वचनों पर विश्वास रखने से परमेश्वर के सन्मुख धर्मी ठहरे। परमेश्वर के वचनों पर विश्वास रखने से वह आशीषित हुए और उनको आराम दिया गया। 
समय बिता और यूसुफ़ की वजह से याकूब के वंशज ४०० साल तक मिस्र की गुलामी में अपना जीवन जीते रहे। फिर, परमेश्वर मूसा के द्वारा उनको वहाँ से निकाल कर कनान देश में लेकर आया। मगर, ४०० साल की गुलामी में वह विश्वास की धार्मिकता भूल गए थे। 
इसलिए पेमेश्वर उनको चमत्कार से लाल समुन्दर पार कराके जंगल में ले गया। जब वह पाप के जंगल में पहुंचे, तब सीनै पर्वत पर उसने उनको व्यवस्था दी। उसने उनको व्यवस्था दी, जिसमे दस आज्ञाए और ६१३ विस्तृत धाराए थी। परमेश्वर ने घोषित किया, “मैं तुम्हारा प्रभु परमेश्वर हूं, मैं अब्राहम, इसहाक और याकूब का परमेश्वर हूं। मूसा को सीनै पर्वत पर आने दो, और मैं तुम्हें आज्ञाए दूंगा”। तब, परमेश्वर ने इस्राएल को व्यवस्था दी। 
परमेश्वर ने उनको व्यवस्था दी ताकि उनको ‘पाप की पहिचान हो सके’ (रोमियों ३:२०)। ऐसा करने का परमेश्वर का उद्देश्य ये था की, लोग जाने की परमेश्वर को क्या अच्छा लगता है और क्या अच्छा नहीं लगता और अपनी धार्मिकता और पवित्रता प्रगट हो।
मिस्र की ४०० साल की गुलामी में जितने इस्राएल के लोग थे उन सब ने लाल समुन्दर पाप कर लिया था। अब्राहम, इसहाक, और याकूब के परमेश्वर से उनकी कभी मुलाकात नहीं हुई थी। वो परमेश्वर को नहीं जानते थे।
जब वह लोग ४०० साल की गुलामी में जी रहे थे तब वह परमेश्वर की धार्मिकता को भूल गए थे। उस समय, उनके पास कोई अगुआ नहीं था। याकूब और यूसुफ़ उनके अगुए थे, लेकिन वह तो पहले ही मर चुके थे। ऐसा लगता है की यूसुफ़ अपने दो बेटों मनश्शे और एप्रैम को विश्वास के बारे में शिखाने में विफल हो गया था। 
इसलिए, उनको अपने परमेश्वर को फिर से तलाश कर मिलने की जरुरत थी क्योंकि वह परमेश्वर की धार्मिकता को भूल गए थे। हमें याद रखना है की जब वो लोग परमेश्वर को भूल गए उसके बाद परमेश्वर ने उनको पहले विश्वास की धार्मिकता दी और फिर व्यवस्था दी। परमेश्वर ने उनको व्यवस्था दी ताकि वह उनके पास वापस लौट सके।
इस्राएल को बचाने के लिए और उनको अपने लोग बनाने के लिए परमेश्वर ने उनको खतना करवाने की आज्ञा दी। 
उनको बुलाने के पीछे का परमेश्वर का उद्देश्य ये था की वो जाने की व्यवस्था की स्थापना के द्वारा ही परमेश्वर का अस्तित्व है, दूसरा ये की वो जाने की वह लोग परमेश्वर के आगे पापी है। परमेश्वर चाहता था की वह लोग उनके समक्ष आए और उसने दी हुई बलिदान की विधि के द्वारा उनका छूटकारा हो और वह परमेश्वर के लोग बन जाए। और ऐसे परमेश्वर ने उनको अपने लोग बनाए।इस्राएल के लोगो का छूटकारा व्यवस्था की बलिदान की विधि के द्वारा आने वाले मसीह पर विश्वास करने से हुआ। लेकिन समय के साथ साथ बलिदान की विधि भी चली गई। आइए देखे की ऐसा कब हुआ था। 
लूका १०:२५ में यीशु की परीक्षा करने वाले व्यवस्थापक का उल्लेख किया गया है। वह व्यवस्थापक फरीसी था। फरीसियों बहुत ही रूढ़िवादी थे जो परमेश्वर के वचन अनुसार अपना जीवन जीने की कोशिश करते थे। उन्होंने पहले देश को बचाने का प्रयास किया और फिर परमेश्वर की व्यवस्था का पालन किया। उस समय, ऐसे भी कट्टरपंथी थे, जो बहुत ही आवेगशील थे और अपना दर्शन पूरा करने के लिए हिंसा का सहारा लेते थे, रोम से इस्राएल को स्वतंत करने के लिए। 
 
यीशु किसको मिलाना चाहते थे?
बिना चरवाहे के पापिओ को

आज भी उनके जैसे लोग धार्मिक अगुए है। वह “संसार के पीड़ित लोगो को बचाए” जैसे सूत्रों के साथ सामाजिक आंदोलनों का संचालन करते है। वह मानते है की यीशु गरीब और पीड़ित लोगो को बचाने के लिए आया था। इसलिए, विद्यालयों में धर्मशास्त्र सीखने के बाद, वो राजनीति में हिस्सा लेते है और समाज के हर क्षेत्र में ‘पिछड़े लोगो को छुडाने का’ प्रयास करते है। 
वो वही लोग है जो कहते है की, “आइए हम सब पवित्र और दयालु व्यवस्था के साथ जीवन जिए...उसके वचनों के द्वारा व्यवस्था से जिए”। लेकिन वास्तव में वह व्यवस्था का सही मतलब नहीं समझते है। वे व्यवस्था के अनुसार जीने का प्रयास करते है लेकिन व्यवस्था के दैवीय प्रकाशन को नहीं समझ पाते। 
इसलिए, हम कह सकते है की मसीह के ४०० साल पहले इस्राएल में कोई प्रबोधक या परमेश्वर के सेवक नहीं थे। इसी कारण, वह बिना चरवाहे के भेड़ो के झुण्ड जैसे बन गए थे। 
उनके पास न तो व्यवस्था थी और न तो सच्चा अगुआ था। परमेश्वर ने उस समय के पाखंडी धार्मिक अगुओ के द्वारा अपने आप को प्रगट नहीं किया था। देश रोमन साम्राज्य का उपनिवेश बन गया था। इसलिए, यीशु ने जंगल में उसके पीछे आने वाले इस्राएल के लोगो को कहा की वो उनको भूखा वापस नहीं भेजेगा। उसे बिना चरवाहे के भेड़ो की झुण्ड पर तरस आया क्योंकि उस समय कई लोग पीड़ा में थे। 
व्यवस्थापक और वैसे ही पद पर बैठे लोग अनिवार्य रूप से वही लोग थे जिनके पास निहित विशेषाधिकार थे; फरीसी लोग यहूदी धर्म के रूढ़िवादी वंश के थे। वह बहुत ही अभिमानी थे। 
यह व्यवस्थापक यीशु को लूका १०:२५ पूछता है, “अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए मैं क्या करूँ?” उसने शायद ऐसा सोचा होगा की इस्राएल में उससे बढ़कर और कोई नहीं। इसलिए इस व्यवस्थापक ने (जिसने अभी तक छूटकारा नहीं पाया था) उसे चुनैती दी। और कहा, “अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए मैं क्या करूँ?”
व्यवस्थापक हमारे खुद का प्रतिक है। उसने यीशु से पूछा, “अनन्त जीवन का वारिस होने के लिए मैं क्या करूँ?” यीशु ने उत्तर दिया, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?” 
इसलिए व्यवस्थापक ने उत्तर दिया, “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुध्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख”। 
यीशु ने उसे कहा, “तू ने ठीक उत्तर दिया, यही कर तो तू जीवित रहेगा”। 
वह खुद दुष्ट है, पापो का ढेर है जो कभी भी अच्छाई नहीं कर सकता इस बात को जाने बिना उसने यीशु को चुनौती दी। इसलिए यीशु ने उससे पूछा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?” 
 
आप व्यवस्था को कैसे पढ़ते है?
हम पापी है जो कभी भी व्यवस्था का
पालन नहीं करते।

“तू कैसे पढ़ता है?” इस भाग के द्वारा यीशु आपसे, मुझसे और हम सबसे पूछता है की कोई व्यक्ति कैसे व्यवस्था को जान सकता है और समझ सकता है। 
जैसे कई लोग आजकल करते है वैसे ही, इस व्यवस्थापक ने भी सोचा की परमेश्वर ने उसको व्यवस्था पालन करने के लिए दी है। इसलिए वो उत्तर देता है, “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुध्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख”। 
व्यवस्था में कोई गलती नहीं थी। उसने हमें संपूर्ण व्यवस्था दी है। उसने हमसे कहा है की तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुध्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख। हमारे सारे मन और शक्ति से परमेश्वर पर प्रेम रखना सच्ची बात है, लेकिन यह एक पवित्र आज्ञा है जिसका कभी पालन नहीं किया जा सकता है। 
“तू कैसे पढ़ता है?” इसका मतलब है की व्यवस्था सच्ची और खरी है, लेकिन आप इसे किस रीति से समझते है? व्यवस्थापक ने सोचा की परमेश्वर ने उसे व्यवस्था पालन करने के लिए दी है। हालाकि, हमें परमेश्वर की व्यवस्था दी गई ता की हम अपनी कमजोरी को जान सके। “तूने पाप किया है। मैंने तुझें खून करने के लिए मना किया था फिर भी तूने खून किया है। क्यों तूने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया?” 
व्यवस्था मनुष्य के हृदय के पापो को उजागर करतीं है। मान लीजिए की यहाँ आने के लिए में मार्ग में था, मैंने खेत में कई पके हुए खरबूजों को देखा। परमेश्वर ने व्यवस्था के द्वारा मुझे चिताया, “खाने के लिए उस खरबूजों को मत तोड़। अगर तू ऐसा करेगा तो में शर्मिंदा हो जाऊँगा”। “हाँ, पिताजी”। “खेत तो किसी और का है, इसलिए, तुझें तोड़ना नहीं चाहिएं”। “हाँ, पिताजी”। 
जिस पल हम सुनते है की हमें तोड़ना नहीं है, तब हमें उसे तोड़ने के लिए ज्यादा इच्छा होती है। अगर हम स्प्रिंग को दबाएंगे, तो प्रतिक्रिया में वो उछलती है। मनुष्य के पाप भी वैसे ही है। 
परमेश्वर ने हमें बुरे काम करने से मना किया है। परमेश्वर ऐसा कह सकता है क्योंकि वो पवित्र, संपूर्ण है और ऐसा करने की उसकी क्षमता है। दूसरी तरफ, हम ‘कभी भी’ पाप किए बिना रह नहीं सकते और ‘कभी भी’ पूरी तरह अच्छे नहीं बन सकते। हमारे मन में ‘कभी भी’ अच्छाई नहीं हो सकती। व्यवस्था ‘कभी भी’ शब्द के साथ निर्धारित है। क्यों? क्योंकि मनुष्य के मन में लालसा भरी हुई है। हम अपनी लालसा के मुताबिक़ काम करते है। हम व्यभिचार करते है क्योंकि हमारे मन में व्यभिचार भरा हुआ है। 
हमें बाइबल को ध्यान से पढ़ना चाहिए। जब पहली बार मैंने कोशिश की, तब मैंने वचन को शब्द में विश्लेषण किया। मैंने पढ़ा की यीशु मेरे लिए क्रूस पर मरा और मैं अपने आंसुओं को बहेने से रोक नहीं पाया। मैं तो कितना बुरा व्यक्ति था और वो मेरे लिए क्रूस पर मरा...मेरे दिल में बहुत पीड़ा हुई और मैंने उस पर विश्वास किया। फिर मैंने सोचा, ‘यदि मैं विश्वास करूंगा, तो केवल वचन के अनुसार ही विश्वास करूंगा’। 
जब में निर्गमन २० पढ़ रहा था, उसमे लिखा है, “तू मुझे छोड़ दूसरों को ईश्वर करके न मानना”। मैंने इस आज्ञा के मुताबिक़ पछतावे की प्रार्थना की। मैंने अपने स्मरण में खोजना शुरू किया की उसके समक्ष मेरे कोई दुसरे इश्वर तो नहीं है, या फिर में किसी दुसरे इश्वर के आगे झुका तो नहीं। मुझे समझ में आया की मै मेरे पुरखों के सन्मान की धार्मिक क्रिया में कई बार दुसरे ईश्वरों के आगे झुका हूं। दुसरे इश्वरो को रखने के कारण मैंने पाप किया है। 
इसलिए मैंने पछतावे के साथ प्रार्थना की, “प्रभु, मैंने मूर्तियों की आराधना की है। इसके लिए मेरा न्याय होना चाहिए। कृपया करके मेरे पापो को माफ़ कर दीजिए। मैं फिर कभी भी ऐसा नहीं करूंगा”। इस तरह, एक पाप का निवारण हो गया। 
फिर मैंने याद करने का प्रयास किया की मैंने कही उनका नाम व्यर्थ में तो नहीं लिया। बाद में, मुझे याद आया की जब मैंने पहलीबार परमेश्वर पे विश्वास करना शुरू किया था तब मैं धूम्रपान करता था। मेरे दोस्त ने मुझे कहा था, “क्या तुम धूम्रपान करने के द्वारा परमेश्वर के नाम को शर्म में नहीं डाल रहे हो? मसीही धुम्रपान कैसे कर सकता है? 
वह उसके नाम को व्यर्थ में लेने के समान है, क्या यह नहीं है? इसलिए मैंने दुबारा प्रार्थना की, “प्रभु, मैंने तेरे नाम को व्यर्थ में लिया है। कृपया करके मुझे माफ़ कर दीजिए। में धूम्रपान करना छोड़ दूँगा”। इसलिए मैंने धूम्रपान छोड़ने का प्रयास किया लेकिन नहीं हुआ, एक साल मैंने ऐसे ही बिता दिया। धूम्रपान छोड़ना असंभव था। लेकिन अंत में, मैंने पूरी रीति से धूम्रपान छोड़ दिया। मुझे ऐसा एहसास हुआ की दुसरे पाप का भी निवारण हो गया। 
अब दूसरी बात थी, “विश्रामदिन को पवित्र मानना”। उसका मतलब है मुझे रविवार के दिन ओर कोई काम नहीं करना चाहिए; काम या पैसे कमाना....इसलिए मैंने उसे भी बंद किया। 
उसके बाद, “तू अपने पिता और अपनी माता का आदर करना”। जब मैं दूर होता तब में उनका सन्मान करता, लेकिन जब में करीब होता तब मेरे लिए मुश्किल बन जाता। “हे प्रभु, मैंने परमेश्वर के विरुध्ध में पाप किया है। कृपया करके मुझे माफ़ कीजिए, प्रभु”। मैंने पछतावे के साथ प्रार्थना की।
लेकिन में अपने माता-पपिता का ज्यादा समय तक सन्मान नहीं कर पाया क्योंकि उस समय के दौरान वो दोनों मर गए थे। मैं क्या कर सकता हूं? “प्रभु, कृपया करके इस बेकार पापी को माफ़ कीजिए। तूं मेरे लिए क्रूस पर मरा है”। मैं कितना धन्यवादित था!
इस तरह, मैंने सोचा की मैंने एक-एक करके अपने सारे पापो का निवारण किया, दूसरी व्यवस्था भी थी जैसे की खून न करना, व्यभिचार न करना, लालच न करना...जब तक मुझे एहसास नहीं हुआ की मैंने एक भी आज्ञा का पालन नहीं किया, तब तक मैंने हरदिन पूरी रात प्रार्थना की। लेकिन आप जानते है, पछतावे के साथ प्रार्थना करने में आनंद नहीं आता। आइए इस विषय पे बात करें।
जब मैं यीशु को क्रूस पे चढ़ाए जाने के बारे में सोचता। तब वो कितना दर्दनाक था वह महसूस कर सकता था। और हमारे लिए मरा जो उसके वचन के अनुसार अपना जीवन नहीं जी सकते। मैं पूरी रात यह सोचके रोया की उसने मुझसे कैसा प्रेम किया और मुझे सच्चा आनंद देने के लिए उसका धन्यवाद किया।
कलीसिया में जाने का मेरा पहला साल बहुत ही आसान था लेकिन उसके बाद थोड़े सालो तक पछतावे में रोना मेरे लिए बहुत ही कठिन हो गया क्योंकि आँसू बहाने के लिए काफी सोचना पड़ता था उसके बाद मैंने ये कई बार किया।
जब आँसू नहीं आए, तब कई बार में प्रार्थना करने के लिए पर्वत पर चला जाता था और ३ दिन तक उपवास करता था। तब जाके, आँसू आते। मैं अपने आँसुओ में डूब गया, समाज में वापस आया, और कलीसिया में रोया। 
मेरे आसपास के लोगो ने कहा, “आप पर्वत पर अपनी प्रार्थनाओं से बहुत पवित्र बन गए है”। लेकिन अनिवार्य रूप से आँसू फिर से सूख गए। तीसरा साल वास्तव में बहुत ही कठिन था। मैं अपने दोस्तों और साथी मसीहियों के साथ किए बुरे कामों के बारे में सोचता और फिर रोता। इसके चार साल बाद, आँसू फिर से सूख गए, मेरी आँखों में आँसू ग्रंथियाँ थी, लेकिन वह काम नहीं कराती थी। 
५ साल के बाद, मैं चाहे जीतनी भी कोशिश करता, लेकिन मैं रो नहीं पाता था। मेरा नाक बहेने लगता था। इसके कुछ सालों के बाद, मुझे अपने आप से घृणा हो गई, इसलिए मैं फिर से बाइबल की ओर मुड़ा। 
 
 
व्यवस्था पाप की पहिचान के लिए है 
 
हमें व्यवस्था के बारे में क्या एहसास
होना चाहिए?
हम कभी भी व्यवस्था का 
पालन नहीं कर सकते।

रोमियों ३:२० में हम पढ़ते है की, “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है”। शुरू में, मैंने इस वचन को प्रेरित पौलुस के व्यक्तिगत संदेश के तौर पर गिना और केवल पसंदीदा शब्दों पर विश्वास करने की कोशिश की। लेकिन मेरे आँसू सूख जाने के बाद, मैं अपने विश्वास के धर्मी जीवन को आगे नहीं लेजा पाया। 
इसलिए, मैंने बार बार पाप किया और जाना की मेरे दिल में पाप है इसलिए व्यवस्था के मुताबिक़ जीवन जीना असम्भव है। मैं वो सहन नहीं कर सका, लेकिन मैं व्यवस्था को भी छोड़ नहीं पाया क्योंकि उसका पालन करने के लिए हमें दी गई है। अंत में, मैं व्यवस्थापक बन गया, पवित्रशास्त्र में जिसका उल्लेख किया गया है वैसा ही। विश्वास का जीवन जीना मेरे लिए बहुत ही कठिन बन गया। 
मैंने बहुत सारे पाप किए थे, जब में व्यवस्था को पढ़ रहा था तब, मैंने तोड़ी हुई दस आज्ञाओं के बारेमें समझ में आना शुरू हुआ। मन में पाप करना वो भी एक पाप है, और मैं अनजाने में ही व्यवस्था पर विश्वास करनेवाला बन गया। 
जब मैंने व्यवस्था का पालन किया, तब मैं खुश था। लेकिन जब मैं व्यवस्था का पालन नहीं कर सका, तब मैं दुखी, चिडचिडा और मायूस बन गया। आखिरकार, मैं निराश हो गया। कितना सरल होता यदि मुझे शुरू से ही व्यवस्था का सच्चा ज्ञान शिखाया गया होता, “नहीं, नहीं। व्यवस्था का दूसरा अर्थ भी है। जो आपको बताता है की आप पाप के ढेर है; आप पैसो से, विपरीत लिंग से और सुन्दर दिखने वाली चीजो से प्रेम करते है। आप के पास ऐसी चीजे है जिसे आप परमेश्वर से ज्यादा प्रेम करते है। आप सांसारिक चीजो का अनुसरण करना चाहते हो। व्यवस्था आपको दी गई, पालन करने के लिए नहीं, लेकिन खुद को पहिचानने के लिए की आपके मन में दुष्टता के साथ आप पापी हो”। 
यदि किसीने मुझे सत्य सिखाया होता, तो मुझे १० साल तक सहन नहीं करना पड़ता। इस प्रकार, मुझे इस बात का एहसास हुआ उससे पहले १० सालो तक में व्यवस्था के आधीन रहा। 
चौथी आज्ञा है, “तू विश्रामदिन को पवित्र मानने के लिए स्मरण रखना”। इसका मतलब है हमें विश्रामदिन में काम नहीं करना चाहिए। वह सिखाता है की यदि हम विश्रामदिन में लम्बी यात्रा करे तो हमें सवारी नहीं करनी चाहिए, बल्कि चल कर जाना चाहिए। मैंने सोचा की जिस जगह मुझे प्रचार करने जाना है उस जगह चल कर जाना ज्यादा उचित और माननीय रहेगा। आखिरकार, मैं व्यवस्था का ही तो प्रचार करने वाला था। इस प्रकार, मुझे लगा की मैं जो प्रचार करता हूं उसका अमल भी तो करना चाहिए। यह इतना मुश्किल था की मैं हार मानने वाला था। 
जैसे यहाँ दर्शाया गया है, “तू कैसे पढ़ता है?” मैं इस प्रश्न को समझ नहीं पाया और १० साल तक सहन करता रहा। व्यवस्थापक को भी समझ में नहीं आया था। उसने सोचा की यदि वो व्यवस्था का पालन करेगा और सावधानी से जीवन जिएगा, तो वह परमेश्वर के आगे आशीषित होगा। 
लेकिन यीशु ने उसे कहा, “तू कैसे पढ़ता है?” उस व्यक्ति ने अपने विधि सम्मत विश्वास के अनुसार उत्तर दिया। और उसने उस व्यक्ति से कहा, “हां, तूने सही उत्तर दिया है; जैसे लिखा है वैसे ही तू बात करता है। कोशिश कर और उसका पालन कर। यदि तू ऐसा करेगा तो तू जीवित रहेगा, लेकिन अगर वैसा नहीं करेगा तो तू मरेगा। पाप की मजदूरी तो मृत्यु है। यदि तू वैसा नहीं करेगा तो तू मर जाएगा”। (जीवन का विरोधी मृत्यु है, क्या नहीं है?) 
लेकिन व्यवस्थापक अभी समझ नहीं पाया। यह व्यवस्थापक हम सब के जैसा ही है, आपके और मेरे जैसा। मैंने १० साल तक धर्मशास्त्र का अभ्यास किया। मैंने सारे प्रयास किए, सब कुछ पढ़ा और सब किया; उपवास किए, गलत फहमी पाली, अन्य भाषाओँ में बोला...आदि। मैंने १० साल तक बाइबल पढ़ा और कुछ पूरा होने की उम्मीद रखी। लेकिन इस तरह, मैं अभी भी अंधा था। 
इसीलिए पापी को कोई ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहिए जो उसकी आँखे खोले, और वह कोई व्यक्ति हमारे प्रभु यीशु है। तब, व्यक्ति को एहसास होता है की, “अरे! हम कभी भी व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की हमने व्यवस्था का पालन करने के लिए कितनी कोशिशे की है, कोशिश करने से केवल हमारी मृत्यु होती है। लेकिन यीशु पानी और आत्मा से हमें बचाने आए! हाल्लेलूया! पानी और आत्मा हमें बचा सकता है। यह अनुग्रह है, परमेश्वर का उपहार। इसलिए हम परमेश्वर की स्तुति करते है। 
मैं इतना भाग्यशाली था की वास्तविक निराशाजनक अवस्था से बाहर निकल सका, लेकिन कुछ लोग अपना पूरा जीवन धर्मशास्त्र के अभ्यास में व्यतीत कर देते है और मौत के दिन तक उनको सत्य का एहसास नहीं होता। कुछ लोग दशकों तक या पीढ़ी से पीढ़ी तक विश्वास करते है, लेकिन कभी भी नया जन्म नहीं पा सकते। 
जब हमें एहसास होता है की हम कभी भी व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते तभी हम पापी बनने से रुक पाते है, फिर यीशु के सामने खड़े रह कर पानी और आत्मा का सुसमाचार सुनते है। जब हम यीशु को मिलते है, तब हम सारे न्याय और विनाश से मुक्त हो जाते है। हम सबसे बेकार पापी है, लेकिन हम धर्मी बन सकते है क्योंकि उसने पानी और लहू के द्वारा हमें बचाया है। 
यीशु ने हमसे कहा की हम उसकी इच्छा के मुताबिक़ नहीं जिए। उसने यह बात व्यवस्थापक को कही थी, लेकिन वो समझ नहीं पाया। इसलिए यीशु ने उसे समझाने के लिए एक कहानी सुनाई। 
 
विश्वास के जीवन से इंसान के गिरने
का कारण क्या है?
पाप

“एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए” (लूका १०:३०)। इस मनुष्य को डाकुओं ने पिटा था और अधमरा छोड़कर चले गए थे, इसी रीते से व्यवस्थापक ने पूरी जिंदगी सहन किया है इस वास्तविकता से जागृत करने के लिए यीशु ने इस दृष्टांत को कहा था। 
एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो जा रहा था, यरीहो सांसारिक दुनिया का प्रतिक है जब की यरूशलेम धार्मिक शहर, विश्वास का शहर, जो व्यवस्था की बड़ी बड़ी बाते करने वालो से भरा हुआ है उसका प्रतिक है। यह कहानी हमें कहती है की यदि हम केवल धार्मिक रीति से यीशु पे विश्वास करेंगे, तो हम नाश हो जाएंगे। 
“एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए”। यरूशलेम ज्यादा आबादी वाला बड़ा शहर था। वहाँ महायाजक, याजको, लेवी और धर्म के कई उत्कृष्ट पुरुषों का समूह था। वहाँ कई सारे ऐसे लोग थे जो व्यवस्था को जानते थे। वहां, उन्होंने व्यवस्था के मुताबिक़ जीने की कोशिश की, लेकिन आखिर में विफल हो गए और यरीहो की ओर आगे बढ़े। वह संसार में डूबते गए और डाकुओं के हाथ पड़ने से बच नहीं पाए। 
वह मनुष्य भी यरूशलेम से यरीहो के मार्ग पर डाकुओं के हाथ लगा और उसके कपड़े उतार लिए गए। ‘उसके कपड़े उतार लिए’ का मतलब है उसने अपनी धार्मिकता खो दी। हमारे लिए व्यवस्था के द्वारा और व्यवस्था के मुताबिक़ जीना असम्भव है। रोमियों ७:१९-२० में प्रेरित पौलुस कहता है, “क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ। अत: यदि मैं वही करता हूँ जिस की इच्छा नहीं करता, तो उसका करनेवाला मैं न रहा, परन्तु पाप जो मुझ में बसा हुआ है”। 
मेरी इच्छा यह है की मैं भले काम करूँ और उसके वचनों का पालन करूँ। क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरे बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती है (मरकुस ७:२१-२३)। 
क्योंकि वे हमारे दिल मैं है और कभी भी बाहर आते है, इसलिए हम वो करते है जो हमें नहीं करना चाहिए और हम वो नहीं करते जो हमें करना चाहिए। हम बुराइयों को अपने हृदय में दोहराते रहते है। शैतान को जो करना है, वह हमें पाप के लिए एक छोटी सी प्रेरणा देना है। 
 
 
हर एक मनुष्यों के हृदय में पाप है 
 
क्या हम व्यवस्था के मुताबिक़ 
जी सकते है?
नहीं

मरकुस ७ में लिखा है, “ऐसी कोई वस्तु नहीं जो मनुष्य में बाहर से समाकर उसे अशुध्द करें; परन्तु जो वस्तुएँ मनुष्य के भीतर से निकलती हैं, वे ही उसे अशुध्द कराती है”।
यीशु हमें कहता है की मनुष्य के हृदय में बुरे बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, हत्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता है। 
हम सबने अपने मन में खून किया है। ऐसा कोई भी नहीं है जिसने खून न किया हो। माँ अपने बच्चो पर चिल्लाती है, “नहीं। ऐसा मत करो। मैंने तुमसे कहा था ऐसा मत करना, धिक्कार है तुम्हें। मैंने तुम्हें बार बार कहा है की ऐसा मत करो। अगर तुमने दूसरी बार ऐसा किया तो मैं तुम्हें मार डालूंगी। मैंने कहा की ऐसा मत कर”। वह हत्या है। शायद आपने अपने मन में ही विचारविहीन शब्दों से अपने बच्चो को मार दिया होगा। 
हमारे बच्चे जीवित होने चाहिए क्योंकि वो इतनी आसानी से हमारे पास से भाग जाते है; लेकिन हमने अपना सारा गुस्सा उन पर उंडेल दिया होता, तो शायद हमने उनको मार दिया होता। कभी कभी हम खुद को डराते है। “अरे, मेरे परमेश्वर! मिने ऐसा क्यों किया?” हम अपने बच्चों को मारने के बाद चोटों को देखते हैं और सोचते हैं कि हम ऐसा करने के लिए पागल हो गए होंगे। हम उस तरह से बर्ताव करते है क्यों की हमारे मन में हत्या है। 
इसीलिए, ‘मैं वही करता हूं जो मुझे नहीं करना चाहिए’ अर्थात् की हम दुष्ट काम करते है क्योंकि हम दुष्ट है। हमें पाप करने के लुभाना शैतान के लिए बहुत ही आसान है। 
हम देखते है की एक इंसान जिसने छूटकारा नहीं पाया है वह १० साल तक झोपड़ी में बैठा रहता है, दीवार की और अपने मुहँ को करके सुंगचोल, कोरिया के महान साधु की तरह ध्यान में बैठता है। दीवार की और अपना मुँह करके बैठा है वो ठीक है, लेकिन किसी ना किसी को तो उसके लिए भोजन लाना पड़ेगा और उसका मल साफ़ करना पड़ेगा। 
उसे किसी न किसी से संपर्क तो करना होगा। अगर वो पुरुष है तो कोई समस्या नहीं होगी, लेकिन चलिए मान लेते है की वह एक सुन्दर महिला थी। अगर गलती से भी उसकी और देख लिया तो, अबतक उसने जो ध्यान किया है वो व्यर्थ हो जाएगा। वह सोच सकता है, “मुझे व्यभिचार नहीं करना चाहिए; मेरे दिल में यह है, लेकिन मुझे इसे दूर करना चाहिए। मुझे उसे बहार निकलना होगा। नहीं! मेरे मन में से बहार निकल जाओ!” 
जिस पल वह उसे देखता है उसी पल उसका संकल्प लुप्त हो जाता है। महिला के जाने के बाद, वह अपने मन में झांकेगा। पांच साल की उसकी तपस्या का कोई मतलब नहीं रहा, सब कुछ व्यर्थ हो गया। 
एक व्यकिति की धार्मिकता छीन लेना शैतान के लिए बहुत ही आसन है। शैतान को केवल उसे थोडा धक्का देना होता है। जब इंसान छूटकारा पाए बिना पाप न करने का प्रयास करता है, तब वह उलटा ज्यादा पाप में गिर जाता है। वह व्यक्ति हर रविवार को दशमांश देता होगा, ४० दिनों का उपवास करता होगा, १०० दिनों तक भोर की प्रार्थना करता होगा...आदि। लेकिन शैतान उसके जीवन में ज्यादातर अच्छी चीजो की लालच देकर उसें धोखा देता है। 
“मैं आपको कंपनी में एक महत्वपूर्ण पद देना चाहूंगा, लेकिन आप एक ईसाई हैं और आप रविवार को काम नहीं कर सकते, क्या आप कर सकते हैं? वह सचमुच बड़ा पद है। शायद आप तिन रविवार काम करके महीने में केवल एक बार ही कलीसिया में जा सकते है। फिर, आप इस तरह की उच्च प्रतिष्ठा का आनंद लेंगे और अच्छी तनख्वाह पाएंगे। इसके बारे में क्या ख़्याल है?" इस पर, शायद १०० में से १०० लोगों को खरीदा जा सकता है।
यदि वह काम नहीं करता है, तो शैतान उन लोगों पर एक और चाल चलाता है जो आसानी से महिलाओं के लिए वासना में फंस जाते हैं। शैतान उनके सामने एक महिला को रखेगा और वो सिर से लेके पैर तक उसके प्यार में डूब जाएगा, परमेश्वर को तुरंत ही भूल जाएगा। इसी रीति से मनुष्य की धार्मिकता छीन ली जाती है। 
यदि हम व्यवस्था के मुताबिक़ जीवन जीने की कोशिश करेंगे, तो अंत में हमारे पास पाप के घाव, पीड़ा और आत्मिक गरीबी होगी; हम सारी धार्मिकता खो देंगे। “एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए”
इसका मतलब है की भले ही हम पवित्र परमेश्वर की इच्छा के द्वारा जीवन जी कर यरूशलेम में रहने की कोशिश करे, लेकिन हम अपनी कमजोरी के कारण बार बार ठोकर खाएंगे और अंत में बरबाद हो जाएंगे।
आप शायद अभी भी परमेश्वर के आगे पछतावे की प्रार्थना करते होंगे। “प्रभु, मैंने पाप किया है। कृपया करके मुझे माफ़ करे; मैं उसे दुबारा कभी नहीं करूंगा। मैं आपको वचन देता हूं की सचमुच यह आखरी बार था। मैं भीख मांगता हूं और बिनती करता हूं केवल एकबार मुझे माफ़ कर दीजिए”। 
लेकिन ये लम्बा नहीं चलता। लोग इस संसार में पाप किए बिना नहीं रह सकते। वह केवल कुछ समय के लिए उसे टाल सकते है, लेकिन पाप ना करना असंभव है। इसलिए, हम बार बार पाप करते रहते है। “प्रभु, कृपया करके मुझे माफ़ कर दीजिए”। यदि यह चलता रहा, तो वह कलीसिया और उनके धार्मिक जीवनों से दूर चले जाएंगे। वो अपने पापो की वजह से परमेश्वर से दूर हो जाएंगे और आखिर मैं नरक में उनका अंत होगा। 
यरीहो की ओर यात्रा करने का मतलब है सांसारिक बातो में पड़ना; संसार से नजदीक आना और यरूशलेम से दूर जाना। शुरुआत में, यरूशलेम नजदीक होता है; लेकिन जैसा की पाप और पछतावे का चक्र दोहराया जाता है, तब हम अपने आप को यरीहो के शहर में खड़ा पाते है; संसार में पूरी तरह डूबे हुए। 
 
कौन उद्धार पा सकता है?
वह जो खुद की धार्मिकता स्थापित 
करना छोड़ देते है

उस मनुष्य को यरूशलेम के मार्ग पर कौन मिला? उसे डाकू मिले। जो इंसान व्यवस्था को जानता भी नहीं और व्यवस्था के मुताबिक़ जीवन नहीं जीता वह आवारा कुत्ते के समान है। वह पीता है, कही भी सो जाता है और कही भी पेशाब कर लेता है। यह कुत्ता दुसरे दिन फिरसे उठेगा और फिरसे पिएगा। आवारा कुत्ता अपना मल भी खायेगा। इसलिए ऐसे इंसान को कुत्ता कहा जाता है। वह जानता है की शराब नहीं पीना है, फिरभी पीता है और अगली सुबह पछतावा करता है, इस प्रक्रिया को बार बार दोहराता है। 
वह उस मनुष्य के समान है जिसको यरीहो के रास्ते डाकू मिले थे, उसे घायल और अधमरा करके छोड़ दिया जाता है। इसका मतलब है की उसके दिल में केवल पाप है। यह है मनुष्य। 
यरूशलेम में व्यवस्था के द्वारा जीवन जीने का प्रयास करते समय लोग यीशु पर विश्वास करते है, लेकिन उनके हृदय में केवल पाप रह जाता है। उनके पास अपना धार्मिक जीवन दिखाने के लिए केवल अपने घाव बचे है। जिनके हृदय में पाप है उनको अंत में नरक में फेंक दिया जाएगा। वह ये जानते है, लेकिन क्या करना है ये नहीं जानते। क्या आप और मैं इसी रीति से धार्मिक शहर में नहीं रहे? हां। हम सब वहाँ पर एक जैसे ही थे। 
व्यवस्थापक जिसे परमेश्वर के व्यवस्था की गलतफहमी थी वह अपने जीवन भर संघर्ष करेगा, और घायल होकर नरक में उसका अंत होगा। वह हम में से एक है, आप और मैं। 
केवल यीशु ही हमें बचा सकता है। हमारे आसपास बहुत सरे बुध्धिमान लोग है और वह लगातार जो जानते है उसकी बड़ी बड़ी बाते करते है। वह परमेश्वर की व्यवस्था के मुताबिक़ जीवन जीने का नाटक करते है और खुद के साथ ईमानदार नहीं है। वह किसी भी बात को स्पस्ट रूप से नहीं कह सकते, लेकिन हंमेशा वफादार दिखने के लिए अपने बाहरी दिखावे को संवारने में तुले रहते है। 
उनमें यरीहो जाने वाले पापी भी है, जिनको डाकुओं के द्वारा पिटा गया और अधमरा करके छोड़ दिया गया। हमें जानना चाहिए की परमेश्वर के आगे हम कितने कमजोर है। 
हमें उनके आगे अंगीकार करना चाहिए, “प्रभु, यदि तू मुझे नहीं बचाएगा तो मैं नरक में जाउंगा। कृपया करके मुझे बचा ले। तू जहा चाहता है मैं वहाँ जाऊँगा, फिर चाहे आँधी हो या तूफ़ान, अगर में केवल सच्चा सुसमाचार सुन सकू। अगर तू मुझे अकेला छोड़ देगा, तो मैं नरक में जाऊँगा। मैं भीख माँगता हूँ मूझे बचा ले”। 
जो लोग जानते है की वो नरक की ओर जा रहे है और अपनी धार्मिकता के पीछे चलने का प्रयास बंद कर देते है, और परमेश्वर के ऊपर निर्भर है, उनको बचाया जा सकता है। हम कभी भी खुद की कोशिशो से नहीं बच सकते।
हमें समझना ही चाहिए की हम डाकुओं के हाथों में पड़े उस मनुष्य के जैसे है।