उपदेश

विषय ८ : पवित्र आत्मा

[8-9] (इफिसियों २:१४-२२) यीशु के बपतिस्मा का सुसमाचार जिसने हमें शुध्ध बनाया है

(इफिसियों २:१४-२२)
“क्योंकि वही हमारा मेल है जिसने दोनों को एक कर लिया और अलग करनेवाली दीवार को जो बीच में थी ढा दिया, और अपने शरीर में बैर अर्थात् वह व्यवस्था जिसकी आज्ञाएँ विधियों की रीति पर थीं, मिटा दिया कि दोनों से अपने में एक नया मनुष्य उत्पन्न कर के मेल करा दे, और क्रूस पर बैर को नाश करके इसके द्वारा दोनों को एक देह बनाकर परमेश्‍वर से मिलाए। उसने आकर तुम्हें जो दूर थे और उन्हें जो निकट थे, दोनों को मेलमिलाप का सुसमाचार सुनाया। क्योंकि उसी के द्वारा हम दोनों की एक आत्मा में पिता के पास पहुँच होती है। इसलिये तुम अब विदेशी और मुसाफिर नहीं रहे, परन्तु पवित्र लोगों के संगी स्वदेशी और परमेश्‍वर के घराने के हो गए। और प्रेरितों और भविष्यद्वक्‍ताओं की नींव पर, जिसके कोने का पत्थर मसीह यीशु स्वयं ही है, बनाए गए हो। जिसमें सारी रचना एक साथ मिलकर प्रभु में एक पवित्र मन्दिर बनती जाती है, जिसमें तुम भी आत्मा के द्वारा परमेश्‍वर का निवास-स्थान होने के लिये एक साथ बनाए जाते हो”।
 
 
गरीबी के कारण गोद लिया हुआ बच्चा
 
किसने लोगों को परमेश्वर के
विमुख किया?
उसके पाप ने यह किया।

कोरियन युध्ध को समाप्त हुए आधी सदी बीत चुकी है। लेकिन उसने कोरियन लोगों के अन्दर गहरे घाँव छोड़े है। कोरियन युध्ध के परिणाम के बाद, कई जवान बच्चों को विदेशी देशों ने गोद लिया। यहाँ तक की संयुक्तराष्ट्र की सेना भी कोरिया आई और उस समय हमें बहुत मदद की, लेकिन जब सैनिक वापस चले गए तब कई बच्चे अनाथ बन गए।
संयुक्तराष्ट्र के कई सैनिक जिनकी पत्निया और बच्चे थे वे जब वापस गए तब अपने परिवार को यहाँ छोड़ गए। उनमे से कई बच्चे अपनी माँ के द्वारा अनाथ आश्रम में छोड़ दिए गए और बाद में गोद लेने के लिए विदेश में भेज दिए गए। वह वास्तव में अच्छा था की उन जवान बच्चों को पालन करने वाले माता पिता मिल गए और उनकी परवरिश अच्छे से हो पाई।
यह गोद लिए हुए बच्चे जब बड़े हुए यब उन्हें एहसास हुआ की वे अपने माता पिता और पडोशी से अलग दिखते है, और उन्हें मालूम पडा की वे कोरिया नाम के देश से गोद लिए हुए थे। ‘क्यों मेरे माता पिता ने मुझे छोड़ दिया? क्या वे मुझसे नफ़रत करते थे इसलिए मुझे इस देश में भेज दिया था?’ अपने जवान मन के साथ, यह बच्चे नहीं समझ पाए की क्या हुआ था।
अपने सच्चे माता पिता के प्रति जिज्ञासा और नफ़रत ने उन्हें उनसे मिलाने के लिए बेक़रार कर दिया था। ‘मैं सोचता हूँ की मेरे माता पिता कैसे दिखते है? वे मुझे कैसे छोड़ सकते है? क्या उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो मुझसे नफ़रत करते थे? नहीं, ऐसा करने के पीछे कोई वजह जरुर होगी’। उनको कई तरह की गलत फहमी होगी और कई बार वे नफ़रत को महसूस करते होंगे। और दूसरी ओर वे इसके बारे में ज्यादा सोचना नहीं चाहते। वे इसके बारे में जान पाते उसके पहले, वह बच्चे बड़े हो गए और अब जवान हो चुके है। उन्होंने शादी कर ली है, उनके बच्चे है और उन्होंने अपना परिवार बनाया है।
एक स्थानिक टीवी नेटवर्क के एक प्रोग्राम के द्वारा मुझे इन बच्चो में दिलचस्पी हुई। यह प्रोग्राम में, टीवी रिपोर्टर एक स्त्री का इन्टरव्यू ले रही थी जो जर्मनी में रहती थी ओर जिसे गोद लिया गया था। यह स्त्री उस समय अपने बीस साल की उम्र से गुजर रही थी और वह धर्मशास्त्र की पढ़ाई कर रही थी। पहले तो, वह स्त्री टीवी इन्टरव्यू से अपने आप को बचाती रही क्योंकि वह नहीं चाहती थी की लोग यह जाने की वह गोद की हुई है। रिपोर्टर ने उसे समझाया की उसका इन्टरव्यू विदेश के लोगों को बच्चे गोद लेने की जानकारी में मदद करेंगे। स्त्री मान गई।
रिपोर्टर का एक प्रश्न यह था, “यदि आप अपने अपने सच्चे माता पिता से मिलते है तो आप क्या कहेंगे? आप किसके बारे में ज्यादा उत्सुक है?” स्त्री ने उत्तर दिया, “मैं यह नहीं समझ पा रही हूँ की उन्होंने मुझे क्यों गोद दे दिया। मैं पूछना चाहती हूँ की क्या वे मुझसे नफ़रत करते थे”। उसको जन्म देनेवाली माता ने यह इन्टरव्यू टीवी पर देखा, टीवी प्रसारण करनेवालों का संपर्क किया, और कहा की वह उसे मिलना चाहती है। इस तरह दोनों मिले।
माता जल्दी ही हवाई अड्डे पर आ गई थी और अपनी बेटी के आने का इंतेजार कर रही थी। जब वह जवान स्त्री बहार आई, तब उसकी माँ केवल वाही कड़ी रही और रोने लगी।
यह दोनों व्यक्ति कभी भी आमने सामने नहीं मिले थे। माँ ने अपनी बड़ी होगी बेटी को पहली बार टीवी में देखा था। भले ही वे दोनों अलग अलग भाषा बोलते थे, लेकिन वे अपने दिलों से बात कर रहे थे, और भावुकता से वे एक दुसरे से मिले। उन्होंने एक दुसरे के चहरे को छुआ और माँ ने जो किया था उसके लिए माफ़ी मांग रही थी। वह केवल रो सकती थी और जो कुछ भी उसने किया उसके बदले में माफ़ी मांग सकती थी।
माँ अपनी बेटी को घर लेकर आई और उन्होंने साथ में खाना खाया। निसन्देह, बेटी केवल जर्मन भाषा बोलती थी और माँ केवल कोरियन, इसलिए वे शाब्दिक रीति से बात चित नहीं कर पाए। लेकिन किसी तरह से माँ और बेटी ने एक दुसरे को समझा। उन्होंने बिना शब्द के कई बातें की, और उन्होंने हाथों के इशारे से, एक दुसरे के चहेरे को छूकर और आँखों से और हृदय से बात की।
जब वह जर्मनी वापस लौट रही थी, तब बेटी को पता चला की उसे जन्म देनेवाली माँ उससे प्यार कराती थी। जिस पत्रकार ने पहला इन्टरव्यू लिया था उसने उसके जाने से पहले फिर से एक बार और उनका इन्टरव्यू लिया। “मुझे यह पूछने की कोई जरुरत नहीं थी की क्यों मेरी माँ ने मुझे गोद दे दिया था। मेरी माँ आज भी गरीब है। इस देश के कई समृध्ध व्यक्ति इतने आमिर है की वे विदेशी कार चलाते है, लेकिन मेरी माँ आज भी गरीब है”। उसने आगे कहा, “भले ही मैंने मेरी माँ से वह प्रश्न नहीं पूछा और मुझे उससे कोई उत्तर नहीं मिला, मैंने देखा की उसने मुझे इस गरीबी से बचाने के लिए दूर भेजा। इसलिए मुझे उसे वह प्रश्न पूछने की जरुरत नहीं पड़ी, और अब सारा संदेह और नफ़रत चला गया है”।
 
 
लोग अपने हृदय में पाप की वजह से परमेश्वर से विमुख हो गए थे
 
क्यों हम परमेश्वर से अलग हो गए, और क्यों हम उसके करीब नहीं जा सकते? जिस स्त्री को गोद लिया गया था उसने सिखा की उसकी माँ ने उसे गरीबी से बचाने के लिए उसे दूर भेज दिया था। क्या यह परमेश्वर के साथ भी सच है? परमेश्वर ने हमें अपनी समानता में बनाया है। हमें उससे कौन अलग कर सकता है? उत्तर यह है की शैतान ने मनुष्य को पाप करने के लिए उकसाया, और पाप ने उसे परमेश्वर से अलग कर दिया।
आदि में, परमेश्वर ने मनुष्य को अपनी समानता में बनाया था और वह अपनी सृष्टि से बहुत प्रेम करता था। मनुष्य को परमेश्वर के प्यार के उद्देश्य से बनाया गया था और सारी सृष्टि में वह सबसे श्रेष्ठ था। हालाँकि, निचे गिरे गए दूत जिसका नाम शैतान है उसने मनुष्य को परमेश्वर से अलग करने के लिए कार्य किया। शैतान ने मनुष्य को परमेश्वर का वचन न मानने के लिए उकसाया, और उसे अच्छा और बूरा जाननेवाले पेड़ का फल खिलाया।
ऐसे मनुष्य अपने पाप की वजह से परमेश्वर से दूर हो गया। मनुष्य परमेश्वर के प्रति अनाज्ञाकारी रहा। मनुष्य ने अनन्त जीवन देनेवाले पेड़ का फल नहीं खाया, जिसे खाने के लिए परमेश्वर ने अनुमति दी थी, लेकिन उसने भला बुरा जाननेवाले पेड़ का फल खाया और आज्ञा को तोड़ा। उसका परिणाम यह था की मनुष्य परमेश्वर से अलग हो गया।
पहले परमेश्वर के प्रेम का हकदार मनुष्य घमंड की वजह से परमेश्वर से अलग हो गया। उसके हृदय में पाप होने की वजह से, मनुष्य धीरे धीरे परमेश्वर से विमुख हो गया। उसके बाद, मनुष्य लम्बे समय तक परमेश्वर से अलग रहा और सिकायत करने लगा, “क्यों परमेश्वर ने हमें बनाने के बाद हमें छोड़ दिया? क्यों उसने हमें कमज़ोर बनाके नरक में भेज दिया? उससे अच्छा तो यह होता की उसने हमें बनाया ही न होता”। हम जन्म से पहले कई प्रश्नों, साथ ही साथ उत्सुकता, संदेह और नफ़रत को लेकर जी रहे है।
जब मैंने गोद ली हुई स्त्री को टीवी प्रोग्राम में देखा, तब मुझे समझ में आया की जैसे उसका अपनी सच्ची माँ के साथ रिश्ता था वैसा ही रिश्ता मनुष्य का परमेश्वर के साथ है। कोई आपत्ति, गलत फहमी, श्राप और किसी भी प्रकार का पाप किसी भी परिस्थिति में मनुष्य को परमेश्वर से अलग नहीं कर सकता। मैं यह भी समझ पाया की भले ही परमेश्वर और मनुष्य के बिच का रिश्ता प्रेम पर निर्भर है तो भी गलत फहमी होने की संभावना है।
जैस माँ ने नफ़रत की वजह से बेटी को दूर नहीं भेजा था, वैसे ही परमेश्वर ने नफ़रत के कारण नहीं लेकिन पाप के कारण अपने आप को मनुष्य से अलग किया। परमेश्वर के पास मनुष्य को नफ़रत करने की कोई वजह नहीं है और मनुष्य के पास परमेश्वर को नफ़रत करने की कोई वजह नहीं है। हम एक दुसरे से प्रेम करते है। मनुष्य परमेश्वर से अलग रहता है उसका कारण यह है की वह शैतान की चाल के सामने झुक कर पापी बन गया।
 
 
परमेश्वर ने यीशु के द्वारा हमें ग्रहण किया
 
“पर अब मसीह यीशु में तुम जो पहले दूर थे, मसीह के लहू के द्वारा निकट हो गए हो। क्योंकि वही हमारा मेल है जिसने दोनों को एक कर लिया और अलग करनेवाली दीवार को जो बीच में थी ढा दिया, और अपने शरीर में बैर अर्थात् वह व्यवस्था जिसकी आज्ञाएँ विधियों की रीति पर थीं, मिटा दिया कि दोनों से अपने में एक नया मनुष्य उत्पन्न कर के मेल करा दे” (इफिसियों २:१३-१५)। प्रभु ने व्यवस्था की आज्ञा को पूरा करने के लिए यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लिया था और जगत के सारे पापों को उठा लिया था। फिर उसने मनुष्य को उसके पापों से बचाने के लिए और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने के लिए क्रूस पर अपना लाहो बहाया। परमेश्वर अब उनको ग्रहण करता है जो उसके द्वारा साफ़ किया गया है।
क्या आपने कभी बिना पानी की दुनिया की कल्पना की है? थोड़े समय पहले, मैंने इंचोन शहर में बाइबल की सभा में हिस्सा लिया था, जो कोरिया के बड़े बंदरो में से एक था जहाँ थोड़े दिनों तक नालों में पानी नहीं आया और मैंने सोचा की, ‘लोग पानी के बगैर नहीं जी सकते’।
यदि परमेश्वर एक महीने के लिए इस दुनिया को बिना पानी की करदे, तो शहरों में बदबू, गंदकी और अत्यधिक प्यास की वजह से जीना असम्भव हो जाएगा। हमें पानी की अहमियत समझनी चाहिए, जो परमेश्वर ने हमें दिया है। जैसे पानी मनुष्य के लिए आवश्यक है, वैसे ही यर्दन नदी में यूहन्ना के द्वारा यीशु ने जो बपतिस्मा लिया वह भी उतना ही आवश्यक है।
यदि यीशु यूहन्ना से बपतिस्मा लेने इस दुनिया में नहीं आते, तो यीशु में विश्वास करने वाले पापों की माफ़ी कैसे प्राप्त करते? जैसे मनुष्य पानी के बगैर नहीं जी सकता, वैसे ही यदि यीशु ने यूहन्ना से बपतिस्मा नहीं लिया होता तो इस जगत में सारे लोग अपने पापों की वजह से मर गए होते।
हालाँकि, यीशु के बपतिस्मा ने हमारे सारे पापों को ले लिया है, अब हम अपने ज्ञान में आश्वस्त हो सकते है की हमारे हृदय को शुध्ध किया गया है और हमें उद्धार का आशीष मिला है। इसके अलावा, उसका बपतिस्मा हमारे लिए पवित्र आत्मा का अंतर्निवास पाने के लिए बहुत ही आवश्यक है।
यीशु के एक चेले, पतरस ने कहा, “उसी पानी का दृष्टांत भी, अर्थात बपतिस्मा, यीशु मसीह के जी उठाने के द्वारा, अब तुम्हें बचाता है” (१ पतरस ३:२१)। पतरस का कथन कहता है की यीशु ने हमें हमारे पापों से बचाने के लिए यूहन्ना से बपतिस्मा लिया और क्रूस पर अपना लहू बहाया। यीशु का बपतिस्मा, जो जगत के सारे पापों को साफ़ करता है, वह सच्चा सुसमाचार है।
आइए अब निर्गमन ३०:१७-२१ में पीतल की हौदी के विषय में एक परिच्छेद को देखते है, “यहोवा ने मूसा से कहा, “धोने के लिये पीतल की एक हौदी, और उसका पाया भी पीतल का बनाना। उसे मिलापवाले तम्बू और वेदी के बीच में रखकर उसमें जल भर देना; और उसमें हारून और उसके पुत्र अपने अपने हाथ पाँव धोया करें। जब जब वे मिलापवाले तम्बू में प्रवेश करें तब तब वे हाथ पाँव जल से धोएँ, नहीं तो मर जाएँगे; और जब जब वे वेदी के पास सेवा टहल करने, अर्थात् यहोवा के लिये हव्य जलाने को आएँ तब तब वे हाथ पाँव धोएँ, न हो कि मर जाएँ। यह हारून और उसके पीढ़ी पीढ़ी के वंश के लिये सदा की विधि ठहरे”।
मिलापवाले तम्बू में पीतल की हौदी थी, जो मिलापवाले तम्बू और वेदी के बिच में थी, जिसमे धोने के लिए पानी भरा हुआ था। यदि यह हौदी मिलापवाले तम्बू में नहीं होती, तो याजक बलिदान चढाते समय कितने गंदे हुए होते।
लोगों के लिए हरदिन बलिदान चढ़ाने वाले और बलि के ऊपर अपने हाथों को रखनेवाले याजक के ऊपर लहू और गंदकी के कितने धब्बे लगते होते? यदि मिलापवाले तम्बू में हौदी नहीं होती, तो याजक बहित ही गंदे हो जाते।
इसी लिए परमेश्वर ने उनके लिए हौदी बनाई ताकि वे परमेश्वर के पास साफ़ हाथ लेकर जा सके। पापी पापबलि के सिर पर अपने हाथों को रखने के द्वारा अपने पाप बलि के ऊपर डालता था, और उनके बदले याजक परमेश्वर के सामने बलिदान चढाते। परमेश्वर ने पीतल की हौदी तैयार की ताकि याजक पवित्र स्थान में प्रवेश करने के लिए अपने आप को पानी से साफ़ कर सके, नहीं तो वे मारे जाते। यहाँ तक की याजक पशु के लाहो के धब्बो के साथ पवित्र स्थान में प्रवेश नहीं कर सकता था। इसी लिए याजक लोगों के लिए बलिदान चढ़ने के बाद परमेश्वर के नजदीक जाने के लिए सारी गंदकी को हौदी के पानी से साफ़ करता था।
 
 
यीशु के बपतिस्मा ने जगत के सारे पापों को धो दिया
 
यरदन नदी में योहान्ना के द्वारा यीशु के बपतिस्मा से, जगत के सारे पाप उसके ऊपर स्थानांतरित हो गए थे। और पानी में पूरी तरह से डूबकी लगाना उसके मृत्यु को दर्शाता है और पानी से बहार आना उसके पुनरुत्थान को दर्शाता है। दुसरे शब्दों में, जगत के सारे पापों को लेने के लिए यीशु ने योहान्ना से बपतिस्मा लिया, पापों की कीमत चुकाई और क्रूस पर मर गया। उसकी मृत्यु हमारे पापों की कीमत चुकाने के लिए थी और उसका पुनरुत्थान हमें अनन्त जीवन देता है।
यदि हम विश्वास नहीं करते की यीशु ने अपने बपतिस्मा के द्वारा हमारे सारे पापों को उठा लिया है, तो हमारे हृदय पापों से भर जाते। इस मामले में, हम कैसे परमेश्वर के नजदीक जा सकते है? पापों की माफ़ी का सुसमाचार संस्था का कोई सिध्धांत नहीं लेकिन परमेश्वर का सत्य है।
हम संपुर्ण ज्ञान के बगैर हमारे विश्वास की अगुवाई नहीं कर सकते, दुसरे शब्दों में, यदि हम इस बात की परवाह नहीं करते की यीशु ने यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लिया है तो हम संसार को जित नहीं पाएंगे। जैसे सारे जिव को जीने के लिए पानी की जरुरत पड़ती है, वैसे ही हमें विश्वास से जीने के लिए और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए पापों की माफ़ी और यीशु के बपतिस्मा का पानी जरुरी है। हमें हमारे पापों से बचाने के लिए यीशु को बपतिस्मा लेना पडा, क्रूस पर मरना पडा और पुमरित्थित होना पडा। यह पानी और आत्मा का सुसमाचार है, जिस पर हमें अपने पूरे हृदय से विश्वास करना है।
भले ही यीशु को मरने के लिए क्रूस पर चढ़ाया गया था, लेकिन उसने सजा पाने के जैसा कुछ भी नहीं किया था। वह हमारे पापों को धोने के लिए इस जगत में आया, ३० साल की उम्र में बपतिस्मा लिया, और ३३ साल की उम्र में क्रूस पर मरने के द्वारा हमारा उद्धारकर्ता बना। परमेश्वर मनुष्यजाति को अपनी संतान बनाना चाहते है, भले ही फिर हम बहुत दुर्बल और पापी क्यों न हो। इसी लिए यीशु ने बपतिस्मा लिया था। परमेश्वर ने हमें एक ही समय में पापों की माफ़ी और पवित्र आत्मा का उपहार दिया।
बाइबल कहती है की जब तक कोई पानी और आत्मा से न जन्मे, तब तक वह न तो परमेश्वर के राज्य को देख सकता है और न तो उसमे प्रवेश कर सकता है (यूहन्ना ३:३-५)। आपको जानना होगा और विश्वास करना होगा की हमारे सारे पापों को धोने के लिए यीशु ने बपतिस्मा लिया। यदि कोई नया जन्म पाया हुआ मसीही है, लेकिन यदि वह इस बात को नहीं जानता की यीशु ने जगत के सारे पापों को उठाने के लिए बपतिस्मा लिया था, तो उसका हृदय जल्द ही मैला हो जाएगा। क्योंकि हम शारीरिक प्राणी है, इसलिए हम हरदिन के जीवन में पाप के वजह से मैले हो जाए ये सम्भव है। इसी लिए हमें हमेशा विश्वास से जीना चाहिए, और यीशु के बपतिस्मा, उसके लहू, और उसके पुनरुत्थान पर मनन करना चाहिए। यह विश्वास जब तक हम स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करते तब तक हमें उठाए रखता है।
यीशु के पास हमारे पापों के लिए बपतिस्मा लेने और मरने के अलावा ओर कोई विकल्प नहीं था, इसलिए हमें विश्वास करना चाहिए की ऐसा करने से उसने हमें उद्धार दिया है।
हम प्रभु का धन्यवाद करते है, जिसने हमें पानी और आत्मा का सुसमाचार दिया है। परमेश्वर ने हमें सबसे बड़े उपहार के रूप में अपना एकलौता बीटा दे दिया जिसने अपने बपतिस्मा और लहू के द्वारा हमें हमारे सारे पापों से बचाया है।
हम परमेश्वर के नजदीक नहीं जा सकते और उससे दूर होकर जीने के लिए मजबूर है उसके पीछे का करण है की हमारे हृदय में पाप है। जगत के सारे पापों को उठाने के लिए यीशु ने यूहन्ना से बपतिस्मा लिया और मनुष्य और परमेश्वर को अलग करने वाली दीवार को तोड़ने के लिए क्रोस पर अपनी जान दी। उसके बपतिस्मा और लहू की वजह से मनुष्य और परमेश्वर के बिच का रिश्ता पुन:स्थापित हुआ। उपहार के लिए हम उसका धन्यवाद करते है। बच्चों के प्रति शारीरिक माता पिता का प्यार महान होता है, लेकिन परमेश्वर का प्रेम जिससे यीशु ने हम पापियों बचाया है उसके आगे उसकी कोई तुलना नहीं है।
यीशु का बपतिस्मा और लहू दोनों महत्वपूर्ण है। यदि दुनिया में पानी नहीं होता, तो क्या कोई जीवित रह पाता? यीशु के बपतिस्मा के बगैर, कोई भी अपने हृदय में बिना पापों के नहीं रहेता। यदि यीशु ने बपतिस्मा नहीं लिया होता, और यदि उसने क्रूस पर अपनी जान नहीं दी होती, तो किसी ने भी पापों की क्षमा नहीं प्राप्त की होती। सौभाग्यवश, यीशु ने बपतिस्मा लेकर हमारे आख़री बलिदान चढ़ाया है। भले ही हमारे अन्दर अभाव और अविश्वसनीयता है, फिर भी हम उसके बपतिस्मा उअर क्रूस पर उसके लहू पर विश्वास करके पवित्र आत्मा पा सकते है।
जो लोग यीशु के बपतिस्मा और क्रोस पर उसकी मृत्यु पर विश्वास करते है वे परमेश्वर के ज्यादा नजदीक जा सकते है, प्रार्थना कर सकते है और उसकी स्तुति कर सकते है। अब हम प्रभु की स्तुति और आराधना कर सकते है क्योंकि हम उसकी संतान बन चुके है। यह परमेश्वर का अनुग्रह और आशीष है। यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उ