उपदेश

विषय ११ : मिलापवाला तम्बू

[11-2] (यशायाह ५२:१३-५३:९) हमारा प्रभु जिसने हमारे लिए दुःख सहा

(यशायाह ५२:१३-५३:९) 
“देखो, मेरा दास बुद्धि से काम करेगा, वह ऊँचा, महान् और अति महान् हो जाएगा। जैसे बहुत से लोग उसे देखकर चकित हुए (क्योंकि उसका रूप यहाँ तक बिगड़ा हुआ था कि मनुष्य का सा न जान पड़ता था और उसकी सुन्दरता भी आदमियों की सी न रह गई थी), वैसे ही वह बहुत सी जातियों को पवित्र करेगा और उसको देखकर राजा शान्त रहेंगे, क्योंकि वे ऐसी बात देखेंगे जिसका वर्णन उनके सुनने में भी नहीं आया, और ऐसी बात उनकी समझ में आएगी जो उन्होंने अभी तक सुनी भी न थी। जो समाचार हमें दिया गया, उसका किसने विश्‍वास किया? और यहोवा का भुजबल किस पर प्रगट हुआ? क्योंकि वह उसके सामने अँकुर के समान, और ऐसी जड़ के समान उगा जो निर्जल भूमि में फूट निकले; उसकी न तो कुछ सुन्दरता थी कि हम उसको देखते, और न उसका रूप ही हमें ऐसा दिखाई पड़ा कि हम उसको चाहते। वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दु:खी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और हम ने उसका मूल्य न जाना। निश्‍चय उसने हमारे रोगों को सह लिया और हमारे ही दु:खों को उठा लिया; तौभी हम ने उसे परमेश्‍वर का मारा–कूटा और दुर्दशा में पड़ा हुआ समझा। परन्तु वह हमारे ही अपराधों के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया; हमारी ही शान्ति के लिये उस पर ताड़ना पड़ी, कि उसके कोड़े खाने से हम लोग चंगे हो जाएँ हम तो सब के सब भेड़ों के समान भटक गए थे; हम में से हर एक ने अपना अपना मार्ग लिया; और यहोवा ने हम सभों के अधर्म का बोझ उसी पर लाद दिया। वह सताया गया, तौभी वह सहता रहा और अपना मुँह न खोला; जिस प्रकार भेड़ वध होने के समय और भेड़ी ऊन कतरने के समय चुपचाप शान्त रहती है, वैसे ही उसने भी अपना मुँह न खोला। अत्याचार करके और दोष लगाकर वे उसे ले गए; उस समय के लोगों में से किसने इस पर ध्यान दिया कि वह जीवतों के बीच में से उठा लिया गया? मेरे ही लोगों के अपराधों के कारण उस पर मार पड़ी। उसकी कब्र भी दुष्‍टों के संग ठहराई गई, और मृत्यु के समय वह धनवान का संगी हुआ, यद्यपि उसने किसी प्रकार का उपद्रव न किया था और उसके मुँह से कभी छल की बात नहीं निकली थी”।
 
 
अब सुसमाचार पूरी दुनिया में फ़ैल रहा है
 
यह युग अन्त की ओर आगे बढ़ रहा है। राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था तक, सब कुछ अन्त की ओर जा रहा है। विशेष रूप से, युध्ध की हवा बड़ी तेजी से फ़ैल रही है, क्योंकि महाशक्तियाँ अभी भी दुनिया के बाकी हिस्सों में अपना प्रभाव बढाने की कोशिश कराती है। मेरे घर के पास में ही, उत्तर कोरिया ने हाल ही में यह घोषित किया की, वे परमाणु हथियार बना रहे है, जिससे अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में खलबली मच गई है। संकट-ग्रस्त दुनिया के ऐसे समय में, मैं केवल यह आशा कर सकता हूं कि इन विवादों में शामिल हर कोई अपने सभी मुद्दों को बुद्धिमत्ता के साथ सुलझाएगा, मूर्खता में नहीं, और एक-दूसरे के साथ मिलेगा ताकि सभी एक साथ समृद्ध हो सकें।
हमें हर रोज प्रार्थना करनी चाहिए, ताकि परमेश्वर हमें सुसमाचार फैलाने का ओर अधिक समय दे सके। ऐसा नहीं है की मैं मरने से डरता हूं। ऐसा इसलिए है क्योंकि अभी भी ऐसे देश हैं जहाँ अभी तक सच्चे सुसमाचार का प्रचार नहीं किया गया है, और ऐसे देश भी हैं जहाँ वास्तविक सुसमाचार अब बढ़नेवाला है। मेरी इच्छा मूल सुसमाचार को और अधिक फैलाना जारी रखना है, जब तक यह पुरे तौर पर फ़ैल ना जाए, क्योंकि सुसमाचार के लिए अभी भी और अधिक प्रचार करने की आवश्यकता है।
बेशक, परमेश्वर अच्छे के लिए सभी चीजों को एक साथ जोड़ता है, लेकिन मुझे जो चिंता है, वह यह है कि इंसान इतना मूर्ख हो सकता है। वास्तव में ऐसे लोग हैं जो दूसरों के जीवन में खतरा पैदा करते हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का कोई पता नहीं है कि वे कब और कैसे खुद अपनी मौत का सामना करेंगे; उनमें से कुछ तो दूसरो को मारने की कोशिश कर रहे हैं।
मैं विश्वास करता हूँ की निश्चित रूप से परमेश्वर दुनिया के सारे अगुवों के दिलों में राज करेगा। और मैं यह भी विश्वास करता हूँ की वो हमें शांति देगा।
इस युग में, इस्राएल के लोग अभी भी वायदा किए गए मसीहा का इंतजार कर रहे है। उन्हें समझना चाहिए की उनका मसीहा ओर कोई नहीं लेकिन यीशु है। उन्हें यीशु को मसीहा के रूप में पहचानना चाहिए जिसका वे इंतजार कर रहे थे, और उस पर ऐसा विश्वास करना चाहिए। बहुत ही जल्द, हमारे प्रभु को प्रसन्न करनेवाला सुसमाचार इस्राएल में, ओर साथ ही साथ दुसरे देशो में प्रवेश करेगा जहाँ पर अभी तक सुसमाचार के लिए द्वार नहीं खुले है। वास्तव में, सुसमाचार बड़ी अच्छी तरह पूरी दुनिया में फ़ैल रहा है की वह इस अन्त के समय में पूरी रीति से बढ़ रहा है।
मुझे कहा गया था की बांग्लादेश की एक धर्मविज्ञान के विद्यालय में विद्यार्थियों के लिए दीक्षा पाने के लिए यह आवश्यक था की वे अंग्रेजी में प्रकाशित किताब को पढ़े। पहली बार इस पानी और आत्मा के सुसमाचार को समझने से, अचंबित होने से पहले ही इस विद्यालय के छात्र अपने पापों की माफ़ी पा सकेंगे।
वैसे ही, मैं सबसे पहले यह आशा करता हूँ की जगत के सारे धर्म विज्ञानियों को पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास करके पापों की माफ़ी पानी चाहिए। और हम जिन्होंने उन लोगों से पहले पापों की माफ़ी पाई है उन्हें इस बारे में निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए। केवल हमें प्रार्थना ही नहीं करनी है, लेकिन हमें विश्वास से हमारे जीवन को जीना भी है।
 
 
यशायाह की भविष्यवाणी के तक़रीबन ७०० साल बाद मसीहा इस पृथ्वी पर आया
 
यशायाह एक भविष्यवक्ता था जो यीशु के जन्म के ७०० साल पहले इस पृथ्वी पर जी रहा था। क्योंकि वह मसीहा के बारे में बहुत सारी बातों को जानता था इसलिए उसने ७०० साल पहले मसीहा के बारे में भविष्यवाणी की थी, यशायाह ने उन सारी बातों की भविष्यवाणी की जैसे की मसीहा कैसे आएगा और कैसे वह अपना उद्धार का कार्य करेगा, ऐसा लगता है की मान्पो उसने मसीहा को अपनी आँखों से देखा हो। यशायाह ५२:१३ में और अध्याय ५३ और ५४ में, यशायाह निरंतर भविष्यवाणी कर रहा है, विस्तार में, मसीहा कैसे मनुष्यजाति को बचाएगा। यह अद्भुत है की उसने इतनी सटीक तरीके से भविष्यवाणी को किया की यीशु मसीह निसन्देह इस पृथ्वी पर आएगा, अपने बपतिस्मा के द्वारा सारे पापों को उठाएगा, क्रूस पर अपना लहू बहाएगा, और ऐसे सबको उद्धार देगा। यशायाह ने भविष्यवाणी की उसके ७०० साल बाद, वास्तव में यीशु मसीह इस पृथ्वी पर आए और जैसे यशायाह ने भविष्यवाणी की थी ठीक वैसे ही अपने कार्यों को परिपूर्ण किया।
यशायाह ने भविष्यवाणी करी थी की मसीहा आएगा और बुध्धि से कार्यों को करेगा। जैसे यशायाह ५२:१३ में भविष्यवाणी की गई है, “देखो मेरा दास बुध्धि से काम करेगा, वह ऊँचा, महान और अति महान हो जाएगा”। क्योंकि यीशु मसीह मनुष्य देह में इस पृथ्वी पर आया और वास्तव में अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सारे पापों को अपने ऊपर उठा लिया, इसलिए उसने क्रूस पर अपना जीवन दिया, और ऐसे मनुष्यजाति के सारे पापों के बदले में उसका न्याय हुआ। जैसे यशायाह ने भविष्यवाणी की थी, सबकुछ वैसे ही हुआ। यीशु मसीह के कारण, मनुष्यजाति के सारे पाप दूर हो गए, और वास्तव में उसका नाम ऊँचा, महान और अति महान हो गया, यह जो कुछ भी हुआ वह पहले भविष्यवाणी हुई थी उसके अनुसार हुआ। यशायाह ने मसीहा के बारे में जो भविष्यवाणी की थी वह वास्तव में सच हुई।
हालाँकि, जब हमारे प्रभु इस पृथ्वी पर आए, तब इस्राएल के लोगों ने उन्हें ठीक रीति से पहचाना नहीं। यहाँ तक की हमारे प्रभु इस पृथ्वी पर आए और वास्तव में उन इस्राएल के लोगों समेत जगत के सारे पापों को अपने अपर उठाया, क्रूस पर मरा, और मृत्यु में से फिर जीवित हुआ, लेकिन फिर भी इस्राएल के लोग ना तो मसीहा के बपतिस्मा पर विश्वास करते है और ना तो उसके लहू पर विश्वास करते है। वास्तव में, इस्राएल के लोग यह नहीं समझ पाए की मसीहा उनके देश में पैदा हो चुका है, और उसने अपने बपतिस्मा और क्रूस के द्वारा ना केवल इस्राएल के लोगों के पाप लेकिन समस्त मनुष्यजाति के पापों को उठाया है। वे लोग यह नहीं समझ पाए की यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र था, इस्राएल के लोगों का वास्तविक मसीहा। इस्राएल के लोगों को अब समझना चाहिए की यीशु ही मसीहा है जिसका वे सालो से इंतज़ार कर रहे है।
 
 
यीशु का दुःख सहन करना जगत के पापों को दूर करने के लिए था
 
जब यीशु इस पृथ्वी पर आए, तब उसने वास्तव में किसी भी वर्णन से परे यातनाए सही थी। जैसे यशायाह ५३ दिखाया गया है वैसे, मसीहा दुःख उठानेवाला मनुष्य जन पड़ता है। हमारे इतने सारे पाप उठाने के कारण, वह बहुत पीड़ित था – इतना ज्यादा की बाइबल हमें बताती है की हम भी छिप गई जैसे वह हमारे चहेरे थे।
लेकिन कुछ लोगों ने यीशु को मसीहा के तौर पर पहचाना। क्योंकि उसके युग के लोगों के द्वारा वह बहुत प्रताड़ित किया गया था, इसलिए कई लोग यीशु मसीह को उद्धारकर्ता के रूप में पहचानने से विफल हो गए। हमारा प्रभु वास्तव में मनुष्यजाति को जगत के पापो से बचाने की पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए इस पृथ्वी पर आए थे, और यह काम करने के लिए, उसे बहुत यातनाए सहनी पड़ी। उसके लिए खुद सृष्टि की हुई दुनिया में मनुष्य का रूप लेकर आना ही काफी नहीं था, जिसे उसने खुद अपनी समानता में बनाई थी, लेकिन यहाँ तक तिरस्कृत, उपहास, उत्पीडन, और जुल्म सहना पडा, इतना ज्यादा की पवित्रशास्त्र हमें बताता है की हमने उससे हमारे चहरे छिपा लिए, क्योंकि वो सहन करने से परे था। इस पृथ्वी पर मसीहा होने के बावजूद भी उसके साथ ऐसा व्यवहार किया गया की वह पागल था, उसकी नम्रता का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता। जब किसी को प्रताड़ित या अपमानित किया जाता है तो हम अपने चहेरे मोड़ लेते है, मसीहा को उसकी ही सृष्टि के सामने प्रताड़ित किया जा रहा था, और उस समय इस्राएल के लोगों ने अपने चहेरे फेर लिए।
जब यीशु इस पृथ्वी पर आया, तब वह कैसा दीखता था? जब मसीहा इस पृथ्वी पर आया, तब वह कोमल पौधे के जैसा था, जैसे की निर्लज भूमि से अंकुर फूटा हो। दुसरे शब्दों में, उनकी बहारी दिखावट में कहने के लिए ओर कुछ भी नहीं था। वास्तव में, जब हम हमारे प्रभु की तुलना खुद से करते है, तब यह मसीहा कम आकर्षक जान पड़ते है। हमारे मसीहा की बाहरी दिखावट इतनी सुन्दर नहीं थी।
जब मसीहा इस पृथ्वी पर आए, तब वे इतने खुबसूरत नहीं थे जितना हम सोचते है। लेकिन इस दिखावट की परवाह किए बिना, हमारे मसीहा के रूप में, उन्होंने बलिदान की पध्धति के मुताबित हमारे सारे पापों को अपने ऊपर उठाने के लिए उन्होंने यूहन्ना से अपने ऊपर हाथ रखवाए, वह क्रूस पर चढ़ाया गया और अपना लहू बहाया, मृत्यु से फिर से जीवित हुआ, और इस प्रकार हमें हमारे सारे पापों से बचाया। क्योंकि वास्तव में इस मसीहा ने बपतिस्मा के द्वारा हमारे सारे पापों को अपने ऊपर उठा लिया इसलिए उसे क्रूस पर चढ़ना पडा और हमारे लोए अपना लहू बहाया।
जैसे यशायाह ५३:३ में लिखा है, “वह तुच्छ जाना जाता और मनुष्यों का त्यागा हुआ था; वह दू:खी पुरुष था, रोग से उसकी जान पहिचान थी; और लोग उससे मुख फेर लेते थे। वह तुच्छ जाना गया, और हम ने उसका मूल्य न जाना”। क्योंकि हमारे मसीहा को इस जगत में आना था और अपने सिर पर हाथ रखवाकर और अपना लहू बहाकर जगत के पापों को दूर करना था, इसलिए उसे वास्तव में उसे इस्राएल के लोग और रोमन सैनिको से इस प्रकार प्रताड़ित होना पडा।
 
 
यीशु के उत्पीडन के बारे में तक़रीबन ७०० साल पहले भविष्यवाणी की गई थी
 
मसीह के जन्म के ७०० साल पहले ही यशायाह भविष्यवक्ता के द्वारा भविष्यवाणी की गई थी की मसीहा वास्तव में इस पृथ्वी पर आएगा, क्रूस पर अपना लहू बहाएगा, और मृत्यु से फिर से सजीवन होगा। जैसे यशायाह भविष्यवक्ता ने आनेवाले मसीहा के बारे में भविष्यवाणी की थी, ठीक वैसे ही यीशु मसीह इस पृथ्वी पर आए। अर्थात्, मसीहा ने कुँवारी के द्वारा चरनी में जन्म लिया, यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बपतिस्मा लेकर जगत के सारे पाप अपने ऊपर उठाए, क्रूस पर चढ़े जहाँ उसने हमारे उद्धार के लिए अपना लहू बहाया और मर गए, और तीसरे दिन मृत्यु में से जीवित हुए।
जैसे प्रायश्चित के दिन (लैव्यव्यवस्था १६) बलिदान के सिर पर हाथ रखा जाता था और उसका लहू बहाया जाता था, और साल भर के पापों का प्रायश्चित होता था, वास्तव में यीशु ने भी यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के द्वारा बपतिस्मा लेकर हमारे सारे पापों को अपने ऊपर उठाया और अपना लहू बहाया और क्रूस पर मरा, यह सब भविष्यवाणी के मुताबिक़ हुआ। अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सारे पापों को उठाने के बाद, यीशु ने अपने सार्वजनिक जीवन के तिन साल तक दुःख सहा। यीशु मसीहा को क्रूस पर चढ़ाया इसका कारण यह था की उसने यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बपतिस्मा लेने के द्वारा जगत के सारे पापों को अपने ऊपर उठाया था, और इसी लिए उसको तिरस्कृत किया गया, ताड़ना हुई, और प्रत्येक व्यक्ति से वह प्रताड़ित हुआ।
वास्तव में, लोगों ने केवल यीशु ही मसीहा है यह बात का नकार नहीं किया लेकिन कुछ यहूदी और रोमनों ने यीशु को वर्णन से परे प्रताड़ित भी किया। उनके द्वारा वह बहुत की ज्यादा घृणित हुआ और नकारा गया।
वास्तव में यीशु ने यरदन नदी में यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले से बपतिस्मा लेकर एक ही बार में मनुष्यजाति के सारे पापों को अपने ऊपर उठाया, और उसके बाद क्रूस पर अपना लहू बहाया। मसीहा ने अपने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए यूहन्ना से बपतिस्मा लिया और क्रूस पर अपना लहू बहाया। उसे क्रूस पर नगा किया गया, और उसके ऊपर थूंका गया। उसके आसपास खड़े सारे लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया, और उसे ताना दिया, “यदि सच में परमेश्वर का पुत्र है, तो निचे उतर और अपने आप को बचा ले!”
जब यीशु ने अपने बपतिस्मा के साथ सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की, तब उसे मनुष्यजाति के द्वारा कई सारे दुःख का सामना करना पडा। हालाँकि युशु मसीह ने मनुष्यजाति के भलाई के लिए जगत के पापों को अपने कंधो पर उठाया था, उस समय के लोग, इस बात को नहीं समझ पाए, और जो उनका मसीहा बनके आया था उसकी घृणा की, निरंतर उसका सताव किया, उसे बहुत दुःख दिया, उसकी निंदा की और उसका अपमान किया। वास्तव में, यीशु मसीह को इतना तिरस्कृत किया गया की पवित्रशास्त्र हमें बता है की जब वह इस पृथ्वी पर था पर तब उसके साथ एक कीड़े की तरह व्यवहार किया गया था।
वास्तव में, आपको अंदाजा नहीं है की फरीसियों ने यीशु को कितना तिरस्कृत किया था। यह फरीसि यीशु को अकेला नहीं छोड़ सकते थे, जो उनके नेतृत्व और लोकप्रियता के लिए खतरे के समान दिखता था। इसलिए उन्होंने मसीहा को तिरस्कृत किया, हमेशा उसके अन्दर दोष ढूँढने का प्रयास करते थे, और हर बार उनकी योजनाएं विफल होने पर उस पर व्यक्तिगत आरोप लगाने में संकोच नहीं करते थे। मसीहा को घृणा और बुराई से भरे हर प्रकार के अपमान और निंदा के योग्य माना जाता था। इस प्रकार यशायाह ने भविष्यवाणी की थी की कैसे मसीहा पर अत्याचार किया जाएगा। इसलिए आनेवाले मसीहा के ७०० साल पहले यशायाह भविष्यवक्ता की भविष्यवाणी से हम यह पुष्टि कर सकते है की, इस दुनिया में यीशु के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा।
 
 
क्या लोगों ने मसीहा पर विश्वास किया था जो पानी और आत्मा से आया था?
 
हालाँकि, इस अत्याचार के बावजूद भी, यीशु मसीहा खामोश रहे और अपना कार्य पूरा किया। अब इस्राएल के लोगों को और पूरी दुनिया के सारे लोगों को यह जानना चाहिए और मानना चाहिए की यह मसीहा यीशु है। इस्राएल के लोगों के और दुनिया के सारे लोगों के पापों को दूर करने के लिए, मसीहा को हाथ रखने के रूप में बपतिस्मा लेना पडा, क्रूस पर चढ़ना पडा, और इन सारे अत्याचारों को सहना पडा – और ऐसा करने से, उसने अपनी सेवा में सारे विश्वासियों को उनके पापों से बचाया, और इन विश्वासियों के विश्वास को सम्पूर्ण तौर पर मंजूरी दी। मसीहा नम्रता से इस पृथ्वी पर आया इस तथ्य के बावजूद, और सारे लोगों के पापों को मिटाने के लिए उसने बपतिस्मा लिया, क्रूस पर मरा, और फिर से जीवित हुआ इस तथ्य के बावजूद भी उस पर विश्वास करनेवालों की संख्या बहुत थोड़ी है। हमें जीवन जीने के लिए, हमें यह विश्वास करना चाहिए की वास्तव में वाही हमारा सच्चा उद्धारकर्ता और मसीहा है, वह केवल इस्राएल के लोगों का ही मसीहा नहीं है, लेकिन समग्र मनुष्यजाति का उद्धारकर्ता है।
यीशु ने वास्तव में अपने बपतिस्मा के द्वारा हमारे सारे पापों को खुद पर उठाया और हमारा खुद का दुःख, हमारे रोग, और हमारे श्राप उसने ले लिए फिर भी कुछ लोग सोचते है, “उसने ऐसा कौना पाप किया था की उसे इतना ज्यादा अत्याचार सहना पडा?” लेकिन वास्तव में यीशु पापरहित परमेश्वर का बेटा था। हमारे सारे पाप उठाने के द्वारा, मसीहा ने हमारी जगह बहुत दुःख उठाया, सारे शाप, दुःख, और हमारे पाप के अत्याचार अत्याचार सहे। हालाँकि इस पृथ्वी पर आने से ३३ साल के उसके जीवन में उसने अत्याचार का सामना किया, और हमें हमारे सारे पापों से बचाया।
इसके बाद, भविष्यवक्ता यशायाह के द्वारा बोले गए परमेश्वर के वचन से, क्या उस समय के लोगों ने यीशु पर मसीहा के रूप में विश्वास किया, जो पानी और आत्मा से आया था? हम जो पानी और आत्मा के सुसमाचार का प्रचार करते है उस पर कौन विश्वास करता है? यहाँ तक की अभी, बहुत सारे ऐसे लोग है जो यीशु पर विश्वास करने का दावा करते है फिर भी उन्हें इस पानी और आत्मा के सुसमाचार में कोई रूचि नहीं है।
यहाँ, मुख्य भाग में, यशायाह भविष्यवक्ता अब भविष्यवाणी करता है की परमेश्वर का पुत्र इस पृथ्वी पर आएगा, बुध्धि से कार्य करेगा, हमारे सारे पापों को उठाएगा, उसका न्याय होगा, और ऐसे वह हमें बचाएगा। लेकिन उसके द्वारा परिपूर्ण किए गए सत्य को बहुत ही थोड़े लोगों ने स्वीकार किया है। हालाँकि, मुझे यकीन है की अब से, दुनिया भर के सारे लोग यीशु को मसीहा के रूप में जानेंगे और उसे ऊँचा उठाएंगे। क्या अब आपको पता चला की इस्राएल के लोगों के पाप के कारण, आपके और मेरे पापों के कारण, और समग्र मनुष्यजाति के पापों के कारण यीशु को अत्याचार सहना पडा? यशायाह भविष्यवक्ता, जो चाहता है की आप इसे जाने और विश्वास करे, इसलिए उसने इस तरह मसीहा की सेवकाई की भविष्यवाणी की।
 
 
मसीहा निर्लज भूमि में फूटी जड़ के समान था
 
इस तरह यशायाह भविष्यवक्ता ने मसीहा के आने के बारे में भविष्यवाणी की थी, की जब वह इस पृथ्वी पर आएगा, तो वह दयापूर्ण रीति से आएगा। यशायाह ने कहा की मसीहा, “उसके सामने अँकुर के समान, और एसी जड़ के समान उगा जो निर्लज भूमि में फूट निकले” (यशायाह ५३:२)। जब यीशु मसीह मनुष्य की देह में इस पृथ्वी पर आए, तब वह ऐसा नहीं था की लोगों को वह आकषर्क लगे। वह आर्नोल्ड स्वार्जनेगर या सिल्वेस्टर स्टेलोन की तरह बलवान, ऊँचा और मजबूत व्यक्ति नहीं था। वास्तव में, वह इतना कमज़ोर था की यदि हम उसकी तरफ देखते, तो हमें उस पर दया आती, तरस अता और उससे सहानुभूति होती। फिर भी, उसके वचन दो धारी तलवार के समान चोखे थे।
यीशु मसीह केवल दिखने में ही गरीब नहीं था, लेकिन वह आर्थिक तौर पर भी गरीब था। यूसुफ, उसका मानावित पिता, साधारण बढई था। एक ऐसा परिवार जिसकी जरुरत एक बढई के द्वारा पूरी होती थी, इसलिए वे भरपूरी का जीवन नहीं जी पाते थे। केवल कड़ी महेनत करने से बढई को कुछ मिलता है।
मसीहा इस पृथ्वी पर आने के बाद स्कूल में नहीं गया था। और इसलिए फरीसि उसका मज़ाक उडाना चाहते थे, लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए, क्योंकि इससे यह प्रगट होता की यीशु मसीहा वास्तव में परमेश्वर का पुत्र है। यहाँ तक की यीशु ने कभी भी गमलीएल की स्कूल में कदम भी नहीं रखा था, जो उस समय की बड़ी लोकप्रिय यहूदी स्कूल थी, जहाँ व्यवस्था का महान विद्वान गमलीएल व्यवस्था को सिखाता था। इस स्कूल में, विद्यार्थी व्यवस्था के महान शिक्षक से सिख सकते थे, केवल जगत के ज्ञान में ही वे प्रशिक्षित नहीं होते थे लेकिन व्यवस्था में भी होते थे। लेकिन यीशु ऐसी स्कूल में प्रशिक्षित नहीं हुए थे। ऐसा कोई प्रमाण नहीं है की वह किसी भी प्रकार की स्कूल में गया था। इसके बावजूद भी, पुराने नियम के बारे में ऐसी कोई भी बात नहीं थी जो मसीहा नहीं जानता था, यहाँ तक की वह दुसरे लोगों से ज्यादा ग्यानी था और उसके पास महान विश्वास था। उसने जो कहा था उसमे कुछ भी विसंगत या परमेश्वर की व्यवस्था के बहार का कुछ भी नहीं था।
 
 
क्यों मसीहा को इतना उत्पीडन, अपमान, और तिरस्कृत सहना पडा?
 
इस्राएल के लोगों के लिए सच्छा मसीहा बनने के लिए, और उन्हें उनके सारे पापों से बचाने के लिए और उन्हें परमेश्वर के लोग बनाने के लिए, हमारा मसीहा इस पृथ्वी पर आया और अपनी इच्छा से उनके सारे दुःख, अपमान, ताने, और तिरस्कार को सहा। इस्राएल के लोगों के लिए मसीहा ने वास्तव में जो दुःख सहा था वह बलिदान मांगनेवाला और कठोर था। मसीहा ने हमारे लिए जो अत्याचार सहा वह इतना ज्यादा दुःख दाई था की हमने उससे अपने चहरे छिपा लिए। क्योंकि यीशु ही मसीहा था जोई हमें हमारे पाप और न्याय से बचानेवाला था, इसलिए उसने वास्तव में सारे लोगों के सामने वर्णन से परे दुःख को सहन कर हमें हमारे पापों से बचाया। इसतरह यीशु ने इस संसार में अत्याचार सहा।
क्योंकि यीशु मसीहा ने इतना ज्यादा अत्याचार सहा, की उन दिनों में लोग उसकी तरफ देख भी नहीं पाए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए की यीशु आपके और मेरे मसीहा के रूप में आए, लेकिन वास्तव में, वह मसीहा के किरदार और कार्य को पूरा कराने के लिए पूरी मनुष्यजाति के मसीहा के रूप में आए थे, उसने बड़े अत्याचार को सहा, और ऐसा करने के द्वारा उसने हमें हमारे पाप और पापों के दोष से बचाया।
मसीहा को क्रूस पर लटकाया गया, फिर भी लोगों ने उसका मजाक उडाना बंद नहीं किया: “तू क्यों वहाँ से निचे नहीं उतरता? यदि तू सच में परमेश्वर का बीटा है, तो क्रूस से निचे उतर। तू कैसे परमेश्वर का बेटा हो सकता है? यदि तू सच में इस परमेश्वर का बेटा है, तो निचे उतर और तेरे बगल में जो चोर लटक रहा है उसे बचा; उससे अच्छा यह होगा की निचे उतर और अपने आप को बचा!” उन्होंने निरंतर उसका मजाक उड़ाया: “अरे, क्यों ना तू इस पत्थर को रोटी बनादे? यदि टू परमेश्वर का बेटा है, तो हमें प्रमाण दे! हमें प्रमाण दे ता की हम विश्वास कर पाए। यदि तू वो भी नहीं कर सकता, तो तू कैसा मसीहा है? कितना दयनीय!”
लोगों ने इस तरह मसीहा का अपमान किया, उसकी निंदा की, और उसका मज़ाक उड़ाया। उन्होंने उसके सारे वस्त्र उतार दिए, उसके मुँह पर थप्पड़ मारा, और उसके ऊपर थूंके। मसीहा ने ऐसा मज़ाक, तिरस्कार, और अपमान सहा जो पहले कभी नहीं देखा गया था, और फिर कभी दिखा भी नहीं। उसे क्रूस पर चढ़ाए जाने की सज़ा भी दी गई, ऐसी सज़ा जो उस समय केवल बहुत घिनौने अपराधियों को दी जाती थी। हमारे मसीहा को सैनिक के द्वारा कोड़े से मारा गया, उसके हाथ और पैर दोनों पर किले ठोकी गई, और उसके शरीर में जितना भी लहू था सारा बहाया गया।
यीशु ने सच में यह सारे तिरस्कार, दर्द और उत्पीडन को सहा था जिससे वह हमारे लिए मसीहा के तौर पर अपनी सेवा को परिपूर्ण कर सके। क्रूस पर चढ़ने के द्वारा, उसने हमारे सारे पाप, हमारे सारे श्राप, और हमारे पाप की सज़ा को ले लिया। उसने हमारी जगह सारे अत्याचारों को सहा जो आपको और मुझे सहने थे, और यहाँ तक की उसने हमारे लिए अपना जीवन भी दिया। यह मसीहा अब उन लोगों का उद्धारकर्ता बन चुका है जो विश्वास करते है की यीशु ही हमारा उद्धारकर्ता है। वह अपनी इच्छा से हमारा मसीहा बना। वह अपने पिता की इच्छा से इस पृथ्वी पर आया, और हमारे खातिर क्रूस पर उसने हमारे पापों को और सजा को अपने ऊपर उठा लिया, और फिर से मृत्यु से जीवित हुआ – केवल हमें बचने के लिए!
मेरे भाइयों और बहनों, क्या आपको लगता है की इन सारे अनजान लोगों के सामने इतने सारे दुःख और तिरस्कार को सहन करना यीशु के लिए आसान था? यदि हम उसकी जगह पर होते, यदि हमें इन निंदा का सामना करना पड़ता, नंगा होना पड़ता, अपमान सहना पड़ता, यातना सहनी पड़ती, क्रूस पर लटकना पड़ता, केवल हमारे परिवार या पति या पत्नी, या रिश्तेदारों के सामने नहीं, लेकिन हमारे सारे दुश्मनों के सामने, तो मरने से पहले हम पागल हो जाते! मसीहा को क्रूस पर लटकाया गया, ताकि सब उसे तिरस्कृत होते हुए देख सके, यह सब किसी कोने में नहीं, लेकिन सबके सामने हुआ, ताकि हर कोई उसकी तरफ अपनी ऊँगली उठा सके और उस पर थूंक सके।
मसीहा के क्रूस पर चढ़ाए जाने से पहले उसने इस से भी ज्यादा दुःख, तकलीफ, और मुसीबतों को सहा। यीशु को क्रूस पर किल मारने से पहले, लोगों ने यह सुनिश्चित किया था की वह इन सारी यातनाओं से होकर गुजरे। उसे लोगों की भीड़ के सामने लाया गया और उनके सामने उसका न्याय किया गया, उस पर थूंका गया, और महायाजक के सेवक के द्वारा उसके मूँह पर थप्पड़ भी मारा गया। उस पर थूंका गया! लोगों ने उसके मूँह पर थप्पड़ मारा, उसे कोड़े मारे गए, और उस पर पथराव किया गया! मसीहा ने किसी ओर के लिए नहीं लेकिन केवल हमारे लिए इस सारी यातनाओं को सहा।
पवित्रशास्त्र हमसे कहता है की इस तरह हमारे लिए उस पर जुल्म किए गए, “वह हमारे ही अपराधो के कारण घायल किया गया, वह हमारे अधर्म के कामों के कारण कुचला गया” (यशायाह ५३:५)। मसीहा इन तकलीफों से गुजरा ताकि वह इस्राएल के लोगों के साथ सब को उनके पाप और पाप के दोष से छुड़ा सके। इस मसीहा ने बपतिस्मा लेने के द्वारा जगत के पापों को और पाप की सजा को दूर किया, और अपने ही लोगों से, रोमन सैनिको से, और दुसरे कई देशों के लोगों से अत्याचार सहन करने के द्वारा मसीहा के तौर पर अपनी सेवकाई को परिपूर्ण किया।
परमेश्वर ने भविष्यवाणी की थी की मसीहा के खिलाफ खड़े होनेवाले लोगों को उनके पापों से मसीहा बचाएगा – वास्तव में, मनुष्यजाति के द्वारा किए गए सारे पापों से – और जैसे भविष्यवाणी हुई थी, वैसे ही यीशु इस पृथ्वी पर मसीहा बनके आया, वास्तव में इन सारे अत्याचारों को सहा, और अपना कीमती लहू बहाने के द्वारा आपको और मुझे अपने पाप और उसके दोष से बचाया।
मसीहा पर विश्वास करने के द्वारा हम अपने पाप और दोष से बचे है वह बलिदान की कीमत चुकाए बिना नहीं हुआ है। यह इसलिए क्योंकि यीशु मसीह इस पृथ्वी पर आए और इन सारे उत्पीडन को सहा ताकि हम पापरहित बन सके, हमारे पूरे दिल से विश्वास करने के द्वारा, हमने उद्धार की भेंट और पापों की माफ़ी पाई है, और परमेश्वर की संतान बने है। हमारे मसीहा के कारण हम आनंदित व्यक्ति बने है।
हमें आनन्द देने के लिए और अपनी आशीष देने के लिए मसीहा का धन्यवाद करना चाहिए। मसीहा ने हमें जो उद्धार दिया है वह केवल हमारे विश्वास से आया है, उसने खुद ही परमेश्वर पिता के सामने अपना कीमती बलिदान दिया है। हमें यह विश्वास करना चाहिए की परमेश्वर ने खुद इन अत्याचारों को सहन कर के हमें बचाया है, और हमें इसके लिए उसका धन्यवाद देना चाहिए।
 
 
सुन, इस्राएल, वापस मुड़ और यीशु मसीह पर विश्वास कर
 
इस्राएल के लोगों को अब पश्चाताप करना चाहिए और यीशु मसीहा पर उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करना चाहिए। इस समय तक, इस्राएल के लोगोने यह नहीं पहचाना है की उनका मसीहा आ चुका है। जैसे भविष्यवक्ता यशायाह द्वारा भविष्यवाणी की गई थी की मसीहा, परमेश्वर का सेवक, इस पृथ्वी पर आएगा, और जैसे इस भविष्यवाणी ने हमें कहा था की मसीहा इस पृथ्वी पर आ रहा है, अपने बपतिस्मा के द्वारा मनुष्यजाति के सारे पापों को अपने ऊपर लेने के द्वारा हमें बचाया और क्रूस पर चढ़ने के द्वारा, यीशु मसीहा ने वास्तव में अपने उद्धार के कार्य को परिपूर्ण किया। अब इस्राएल के लोगों को वापस मुड़ना चाहिए, और इस सत्य को जानना चाहिए और विश्वास करना चाहिए। यीशु को क्रूस पर चढ़ने के द्वारा उनके लोगों ने जो पाप किया था वह कबूल करना चाहिए। और उन्हें अपने अप को पहिचानना चाहिए की वे जन्म से ही पापों का ढेर है, और अब इस मसीहा पर विश्वास करने के द्वारा उनको अपने सारे पाप और पाप के दोष से बचना चाहिए।
अब कोई दूसरा मसीहा नहीं है। क्योंकि यीशु खुद मसीहा के बनके आया था इसलिए दूसरा कोई मसीहा नहीं है। कैसे कोई दूसरा मसीहा हो सकता है? कैसे कोई दूसरा उद्धारकर्ता हो सकता है? जब इस्राएल के लोग इससे भी ज्यादा परेशानी से गुजरते है, तब क्या वे ऐसी आशा रखते है की सुपरमेन जैसा कोई होलीवुड का हीरो आएगा और उनका मसीहा बनेगा?
अबसे, इस्राएल के लोगों को यीशु को अपना मसीहा मानना चाहिए। उन्हें विश्वास करना चाहिए की यीशु ही उनका मसीहा है। उनका मसीहा २,००० साल पहले ही इस पृथ्वी पर आ चुका है, और उनके पाप उठाने के लिए और उन्हें अब्राहम की सच्ची संतान बनाने के लिए, जैसे उनको खतना करवाना पड़ता था वैसे ही उसने बपतिस्मा लिया, और वह क्रूस पर चढ़ा, ताकि वे सब लोग आत्मिक खतना पा सके। यूहन्ना से बपतिस्मा लेने के द्वारा, क्रूस उठाने और अपना लहू बहाने के द्वारा, और मृत्यु में से जीवित होने के द्वारा मसीहा इस्राएल के लोगों का सच्चा उद्धारकर्ता बना।
मसीहा पर विश्वास करने के लिए इस्राएल के लोगों को पश्चाताप करना चाहिए। अब उन्हें यीशु पर अपने उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करना चाहिए। अब जो परिपूर्ण होना बाकी है वह यह है की इस्राएल के लोग यीशु पर उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करे। उन्हें पहचानना चाहिए की यशायाह के द्वारा जिस मसीहा के बारे में भविष्यवाणी हुई थी वह यीशु मसीह है। उन्हें पहचानना चाहिए और विश्वास करना चाहिए की जिसके बारे में भविष्यवाणी हुई थी वह और कोई नहीं लेकिन यीशु खुद है। पुराने नियम की सारी भविष्यवाणी यीशु मसीहा के द्वारा परिपूर्ण हुई, उनमे से छोटी से छोटी बात भी नहीं छूटी है।मुख्य भाग में, यह भी कहा गया है की वह बहुत सी जातियों को पवित्र करेगा।
यशायाह ५२:१४-१५ में लिखा है, “जैसे बहुत से लोग उसे देखकर चकित हुए (क्योंकि उसका रूप यहाँ तक बिगड़ा हुआ था कि मनुष्य का सा न जान पड़ता था और उसकी सुन्दरता भी आदमियों की सी न रह गई थी), वैसे ही वह बहुत सी जातियों को पवित्र करेगा और उसको देखकर राजा शान्त रहेंगे, क्योंकि वे ऐसी बात देखेंगे जिसका वर्णन उनके सुनने में भी नहीं आया, और ऐसी बात उनकी समझ में आएगी जो उन्होंने अभी तक सुनी भी न थी”। 
इस पृथ्वी पर आने के बाद, यीशु मसीह ने इतने कष्टों का सामना किया की इस दुनिया के किसी भी अपराधी ने नहीं किए होंगे, उसे मृत्यु दण्ड दिया गया गया। उसने इस दिनिया के किसी भी अपराधी से ज्यादा दुःख और कष्ट उठाकर अपने आप को बलिदान किया, ताकि वह समग्र मनुष्यजाति को अपने लोग बना सके। वह अपने लोगों को बचाता है जिन्होंने उस पर विश्वास करने के द्वारा पापों की माफ़ी पाई है। इसतरह उसने उन्हें बचाया।
लोग उद्धार की अद्भुत खबर को सुनेंगे, जो उन्होंने न तो पहले सुनी थी और न तो देखी थी। जिन्होंने अभी तक यह नहीं सुना है की मसीहा यीशु मसीह था वे लोग निसन्देह इसे सुनेंगे और अन्त में इस पर विश्वास भी करेंगे।
 
 
यीशु मसीहा है, जो एक बार आया था और फिर से आनेवाला है
 
आज, हम अन्त के समय के बहुत ही नजदीक है। यह मृत्यु और क्लेश का युग है। हालाँकि, जो लोग मसीहा पर विश्वास करते है, वास्तव में उन्हें मौत का डर नहीं है। उसके विपरीत, वे अपने मृत्यु के बाद के स्वर्ग के आनन्द और उनके पुनरुत्थान का इंतजार कर रहे है। दुनिया में अन्धकार छा रहा है उसका मतलब यह नहीं है की हम, धर्मी लोग, भी उसकी चपेट में आ जाएंगे। जब यह सुसमाचार पूरी रीति से फ़ैल जाएगा तब मसीहा का दूसरा आगमन होगा।
यीशु, हमारा मसीहा, इस दुनिया में बलिदान के अर्पण के लिए परमेश्वर का मेम्ना बनके आया, और उसके शरीर को यूहन्ना के द्वारा बपतिस्मा दिया गया, और क्रूस पर वह मर गया। भेड़ अपने काटनेवाले के सामने होती है वैसे ही, यीशु मसीहा ने हमारे पापों को उठा लिया, क्रूस पर हमारे पाप का न्याय उठाने के करण बहुत दुःख सहा, तिन दिनों के अन्दर वह मृत्यु से जीवित हुआ, और इसतरह उस पर विश्वास करनेवालों के लिए वह सम्पूर्ण उद्धारकर्ता बना।
उस समय केवल थोड़े लोग ही जानते है की यीशु ही मसीहा थे। वहाँ केवल थोड़े ही लोग थे जो जानते थे की २,००० साल पहले इस पृथ्वी पर जन्म लेने के द्वारा, अपने बपतिस्मा के बाद तिन साल सुसमाचार की गवाही देने के द्वारा, क्रूस पर मरने के द्वारा, और मृत्यु से जीवित होने के द्वारा यीशु हमारा मसीहा बना।थोड़े लोग, जो परमेश्वर पर विश्वास करते थे, उन्होंने गवाही दी की हमारा प्रभु सच्चा मसीहा है जिसने अपना सारा कार्य परिपूर्ण किया।
वे परमेश्वर के सेवक दुनिया भर में खबर फैला रहे है की मसीहा ने इस पृथ्वी पर आने के द्वारा और अत्याचार सहन करने के द्वारा हमें हमारे पापों से बचाया है। वास्तव में, खुद परमेश्वर ही मुद्रण तकनीक को अनुमति देने के द्वारा, दुनिया के इतिहास को आगे बढ़ाकर, और इस सुसमाचार को निडरता से प्रचार करनेवाली जाति बनाकर पानी और आत्मा के सुसमाचार को फैला रहे है।
“यीशु ही मसीहा है। यीशु ही मसीहा है। यीशु ही मसीहा है! यदि आप यीशु पर अपने उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करते है, तो आप बचाए जाएंगे। यीशु परमेश्वर का बेटा है। यीशु सृष्टिकर्ता है जिसने पूरे ब्रह्मांड को बनाया है। वह परमेश्वर है। वह मसीहा हमारा उद्धारकर्ता है”। परमेश्वर के सेवक लोगों को प्रचार करते रहे की यीशु ही मसीहा है, और उसके बपतिस्मा, क्रूस पर उसकी मौत, और उसके पुनरुत्थान के बारे में भी।
इस्राएल के कुछ युवकों को समझ में आया था की २,००० साल पहले, यीशु नामक जवान व्यक्ति इस पृथ्वी पर आया था, और जब वह ३० साल का हुआ, तब उसने यूहन्ना के द्वारा बपतिस्मा लेने के द्वारा मनुष्यजातीं के पापों को उठा लिया। उस समय, केवल यीशु के चेले ही जानते थे की वह मसीहा है, और उनके ज्ञान को केवल कुछ लोगों को ही बाँटा गया था जो सच में परमेश्वर का भय मानते थे – बाकि सब लोग इस सत्य से बेखबर थे। सब मिलाकर, इस्राएल देश में केवल ५०० संत थे (१ कुरिन्थियों १५:६) जो जानते थे की मसीहा जगत के पापों को क्रूस तक लेकर गया, जिस पर उसकी मौत हुई, और वह मृत्यु में से जीवित हुआ। बाकी किसी को कुछ पता नहीं था।
यीशु के मृत्यु और पुनरुत्थान के पचासवे दिन, पवित्र आत्मा वास्तव में उसके चेलों के ऊपर उतरा। जब मसीहा के चेलें उपरी कोतरी में प्रार्थना कर रहे थे, तब वास्तव में पवित्र आत्मा उनके ऊपर उतरा, वे अन्य अन्य भाषा में बोलने लगे, और उन्होंने गवाही दी की यीशु ही मसीहा है। उसके बाद, उसके चेलें, मौत से डरे बिना, साहस से गवाही देने लगे, “यीशु ही मसीहा है। मसीहा हमारा उद्धारकर्ता है। पुनरुत्थित यीशु हमारा मसीहा है”। इसलिए कई लोग इस समय विश्वास में आए।
यीशु मसीहा के द्वारा, वास्तव में परमेश्वर ने आप को और मुझे हमारे सारे पाप और पाप के दोष से बचाया है। क्योंकि उसने हमें हमारे पाप और न्याय से बचने के लिए इतनी यातना सही इसलिए हमें उस पर विश्वास करना चाहिए; जो लोग विश्वास नहीं करते उन्हें पश्चाताप करना चाहिए, वापिस मुड़ना चाहिए और विश्वास भी करना चाहिए; और हमें विश्वास से इस सत्य का प्रसार करना चाहिए।
वास्तव में, इस्राएल के लोग, अब भयभीत होकर तनाव में है। इसलिए उन्हें मिलापवाले तम्बू के इस वचन को सुनना चाहिए जो परमेश्वर ने उन्हें कहे है। हम भी अब अन्त के समय में प्रवेश कर रहे है। मिलापवाले तम्बू की बलिदान पध्धति में प्रगट हुआ पानी और आत्मा का सुसमाचार निश्चित रूप से इस्राएल के लोगों तक पहुचेगा। वे लोग भी विश्वास करेंगे की यीशु ही मसीहा है जिसके बारे में परमेश्वर ने उनसे बात की थी।
परमेश्वर ने पहले से ही इस्राएल के लोगों को बलिदान की पध्धति के बारे में कहा था, और उन्होंने इस पर विश्वास किया था। वास्तव में, वे लोग अभी भी मिलापवाले तम्बू के बलिदान की पध्धति के मुताबिक़ परमेश्वर को बलिदान चढ़ाना चाहते थे। इस्राएल के लोगों के बिच में, अभी भी कुछ रुढ़िवादी थे जो जंगल में रहते थे। अब भी, यह लोग जंगल में रहते है और इस तरह अनुदान देते है। दुसरे शब्दों में, वे ऐसा अनुदान देते है जो पहले मिलापवाले तम्बू में चढ़ाया जा चुका है। शायद वे हारून के वंशज है। उनके परिवार की परंपरा का पालन करने के लिए, वे शहरों के बजाए जंगल में रहते है। हालाँकि वे इस्राएली है, वे लोग निर्जन गोत्र की तरह जीवन जी रहे है, साधारण लोगों से अलग होकर। इन लोगों को भी, हमें मिलाओवाले तम्बू का सुसमाचार प्रचार करना चाहिए की मसीहा आ चुका है और हमें हमारे विश्वास के अनुसार बचाया है।
हमें बचाने हमारे मसीहा के तौर पर इस पृथ्वी पर आने के लिए, अत्याचार सहन करने के लिए, और हमारी जगह न्याय उठाकर हमें हमारे पाप और पाप के दोष से बचाने के लिए हमें यीशु का धन्यवाद करना चाहिए।
 
 
क्योंकि प्रेम मृत्यु के तुल्य सामर्थी है, और ईर्ष्या कब्र के समान निर्दयी है”
 
वास्तव में हम हमारे सारे पाप और पाप के न्याय से अनायास नहीं बच गए है, जैसे की कोई अचानक चिठ्ठी आ जाति है। हमारा उद्धार कोई श्रृंखला का संदेश नहीं है जो हमें कहता है की यदि तुम इसे २० लोगों को नहीं भेजोगे तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा। ना ही हमारे पाप की माफ़ी का उद्धार विज्ञापन पत्रिकाएँ जैसा है जिसमे लिखा होता है की एक के बदले में दो पिज़ा, जहाँ हम केवल फोन करके अपने पेट को भर सकते है।
वास्तव में, हमारा उद्धार परमेश्वर ने अपने बेटे को भेजा उसके द्वारा, हमारे सारे पाप उसके ऊपर डालने के द्वारा, और हमारे इन सारे पापों की वजह से उसे दुःख और उत्पीडन देने के द्वारा आता है। इसी लिए आपको और मुझे पूरे दिल से उस पर विश्वास करना चाहिए और उसका धन्यवाद करना चाहिए। हमारा उद्धार कैसे आया है यह जानते हुए, कैसे कोई उसे फटे हुए जूतों की तरह फेंक सकता है, किसी टूटी हुई बेकार चीज को अटारी पर रख सकता है, या किसी ओर की चीज है वैसे उसे नज़र अंदाज कर सकता है?
क्या आप में कोई ऐसा है जिसने परमेश्वर की कलीसिया में जाने के बावजूद भी पाप की माफ़ी नहीं पाई है? क्या कोई ऐसा है जिसने अभी भी पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास नहीं किया है? यदि ऐसे लोग है तो उन्हें देर होने से पहले पश्चाताप करना चाहिए और मसीहा पर विश्वास करना चाहिए। यदि आप खोए हुए है, और पता नहीं है की कौन से रास्ते पर जाना है, तो केवल अपने पूरे हृदय से सच्चाई के वचनों पर विश्वास करे। जो लोग विश्वास नहीं करते वे परमेश्वर के बेटे के इस प्रेम का अस्वीकार करते है, ऐसा प्रेम जिससे उसने केवल उनके खातिर सारे दुःख को सहन करके उन्हें बचाया था।
जो लोग उसके प्रेम के मूल्य को हलके में ले रहे है और उसका अस्वीकार करते है वे शापित होंगे। पवित्रशास्त्र हमें कहता है, “क्योंकि प्रेम मृत्यु के तुल्य समर्थि है, और ईर्ष्या कब्र के समान निर्दयी है” (श्रेष्ठगीत ८:६)। परमेश्वर का प्रेम इतना मजबूत और महान है की उसका तिरस्कार करनेवाले लोगों पर वह बहुत कड़ी सज़ा लेकर आता है। दुसरे शब्दों में, यह हमसे कहता है, की यदि कोई पापमय जीवन जीते मर जाए, तो वह नरक में कब्र की तरह निर्दयी पीड़ा को सहन करेगा। ईर्ष्या कब्र के समान निर्दयी है। जब मसीहा ने आपसे इतना प्रेम किया, की उसने बपतिस्मा लिया, और हर प्रकार की यातनाए सही, केवल आपको बचने के लिए, यदि आप इस प्रेम पर विश्वास नहीं करते और इसका अस्वीकार करते है, तो आप निश्चित रूप से इस निर्दयी पीड़ा को सहन करेंगे। यह ओर कुछ नहीं लेकिन नरक है।
परमेश्वर हमसे कहता है, “और जैसे मनुष्यों के लिए एक बार मरना और उसके बाद न्याय होना नियुक्त है” (इब्रानियों ९:२७)। जब हम मरते है, तब हमारे शरीर का अन्त होता है, लेकिन परमेश्वर के सामने यह हमारा अन्त नहीं है। जिन्होंने परमेश्वर के प्रेम का अस्वीकार किया है उन लोगों पर क्रूरता लाने के लिए, परमेश्वर ने उन्हें हमेशा जीवित रखा है वे कभी नहीं मरेंगे, और वह उन लोगों पर निर्दयता से पीड़ा देगा। दुसरे शब्दों में, वह उन्हें निरंतर जलती आग में डालेगा, और हमेशा निरंतर उन्हें इस पीड़ा में रखेगा। यह निर्दयी पीड़ा और कुछ नहीं है लेकिन परमेश्वर का निर्दयी क्रोध है। क्या आप को ऐसा लगता है की परमेश्वर कभी भी ऐसा नहीं करेगा? याद रखे की परमेश्वर के लिए कुछ भी असंभव नहीं है!
हमारे लिए परमेश्वर का महान अत्यधिक प्रेम है की, उसने हमारे लिए सारे दुःख सहे, हमें हमारे सारे शापों, हमारे सारे पापों से, और हमारे दोष से हमें बचाया। आपकी सारी समस्याओं को अगर कोई सुलझा सकता है तो वह है मसीहा का प्रेम। वास्तव में, मसीहा के प्रेम से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। मसीहा पर विश्वास किए बगैर, हम परमेश्वर का प्रेम नहीं पा सकते। यह प्रेम हमें केवल यही परमेश्वर के द्वारा दिया गया है, जो हमारा मसीहा बना, और यह उसका पिता है जिसने उसे हमारे पास भेजा। सर्वसामर्थी त्रिएक परमेश्वर ने हमें इस रीति से प्रेम किया, और हमें हमारे पाप और दोष से बचाया। इसलिए हमें मसीहा पर विश्वास करना चाहिए, उसका धन्यवाद करना चाहिए, उसे महिमा देनी चाहिए, और हमें मसीहा पर हमारे विश्वास से संतुष्ट रहना चाहिए।
कितने शुक्रगुजार है की मसीहा ने हमें पानी और आत्मा का सुसमाचार दिया है? यदि कोई नहीं जानता है की कितना मूल्यवान है यह प्रेम, इस संसार में इसे किसी भी चीज से बदला नहीं जा सकता, तो वह इंसान निश्चय ही मूर्ख है। कितना भयानक दुःख और यातनाए थी जिससे हमारा प्रभु गुजरा था? क्योंकि हम उसके प्रेम के लिए धन्यवादित है, इसलिए हम अयोग्य होने के बावजूद भी, जो लोग मूर्ख है उन तक यह प्रेम का प्रसार करने के लिए हमारी बची हुई शक्ति को समर्पित करते है।
परमेश्वर का यह काम करने के लिए, हमें भी मुसीबते और दुःख का सामना करना होगा। हम केवल अपने खुद की सफलता के पीछे नहीं जा सकते। यदि वास्तव में हम उसके बलिदान के प्रेम के पाकर उद्धार पाए है और उसे ग्रहण किया है, तो हम इस प्रेम को दुसरे लोगों के साथ भी बाटेंगे। जैसे यीशु मसीह ने शरीर को प्रेम करके नहीं, लेकिन अपने सच्चे प्रेम से सारे दुःख को सहन करके हमारे पापों को दूर किया है, वैसे हमें भी विश्वास से, अपनी इच्छा से मुसीबतों का सामना करके, अत्याचार, द्वेष, दुःख और तिरस्कार को सहन करके उसके कार्यों को करना है, ताकि दुसरे लोग भी उनके पापों की माफ़ी को पा सके। हमें प्रेम के नाम पर इअसे द्वेष को सहन करना चाहिए। यदि आपने और मैंने सच में पाप की माफ़ी पाई है, तो मैं विश्वास करता हूँ की ऐसा प्रेम हमारे दिल में है।
और नया जन्म पाए हुए, जो बख़ूबी जानते है की वे पहले क्या थे और यीशु का प्रेम कितना महान और मजबूत है, वे फलो को लाते है। बचाए गए लोग वे पेड़ है जो उद्धार का फल देते है, “क्योंकि पेड़ अपने फल ही से पहचाना जाता है” (मत्ती १२:३३)। आपने उद्धार पाया उससे पहले, आप पूरी तरह अपने पापों में डूबे हुए थे, इसलिए यदि आप को नरक में भेजा जाए तो भी आप उसकी शिकायत नहीं कर सकते। फिर भी आप विश्वास करते है की परमेश्वर मनुष्य की देह में इस पृथ्वी पर आकर और आपके लिए दुःख उठाकर आपका उद्धारकर्ता बना, और आपकी जगह दुःख उठाकर उसने आपको आपके दुःख और न्याय से बचाया है। ऐसा विश्वास करने के द्वारा, आपने उद्धार पाया है। यदि वास्तव में आपने ऐसा प्रेम पाया है, तो फिर आपके और मेरे पास दूसरो के लिए जीनेवाला हृदय होना चाहिए।
यदि किसी के पास ऐसा हृदय नहीं है तो, उसने पाप की माफ़ी नहीं पाई है। सटीक तौर पर, यह व्यक्ति केवल ढोंग कर रहा है की उसने पाप की माफ़ी पाई है।
जैसे की मसीह ने सारे दुःख सहे है और हमें हमारे सारे पाप और न्याय से बचाया है क्योंकि उसने हमें प्रेम किया, यदि वास्तव में हम इस प्रेम पर विश्वास करके बच गए है, तो यह प्रेम हमारे हृदय में भी पाया जाता है। क्यों? क्योंकि अब मसीह हमारे हृदय में रहता है। जैसे उसने हमारे खातिर जुल्म सहा, वैसे हमें भी दूसरों के लिए जीने की और उनके लिए दुःख उठा ने की इच्छा रखनी चाहिए। क्योंकि हमारे बिच जिन्होंने पाप की माफ़ी पाई है अब उनके हृदय में कोई पाप नहीं बचा है, हमारे हृदय पूरी रीति से बदल चुके है और यीशु मसीह के हृदय की तरह बन गए है।
मैं यीशु मसीह का धन्यवाद करता हूँ क्योंकि वह इस पृथ्वी पर आए, बपतिस्मा लिया और क्रूस पर अपना लहू बहाया, हमारे लिए इतना सारा दुःख उठाया, और हमारा मसीहा बने जिसने हमें हर प्रकार के पापों से छुडाया।