उपदेश

विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 1-5] ( रोमियों १:१८-२५ ) वे जो सत्य को अधर्म से दबाए रखते है

( रोमियों १:१८-२५ )
“परमेश्‍वर का क्रोध तो उन लोगों की सब अभक्‍ति और अधर्म पर स्वर्ग से प्रगट होता है, जो सत्य को अधर्म से दबाए रखते हैं। इसलिये कि परमेश्‍वर के विषय का ज्ञान उनके मनों में प्रगट है, क्योंकि परमेश्‍वर ने उन पर प्रगट किया है। उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्‍वरत्व, जगत की सृष्‍टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरुत्तर हैं। इस कारण कि परमेश्‍वर को जानने पर भी उन्होंने परमेश्‍वर के योग्य बड़ाई और धन्यवाद न किया, परन्तु व्यर्थ विचार करने लगे, यहाँ तक कि उन का निर्बुद्धि मन अन्धेरा हो गया। वे अपने आप को बुद्धिमान जताकर मूर्ख बन गए, और अविनाशी परमेश्‍वर की महिमा को नाशवान् मनुष्य, और पक्षियों, और चौपायों, और रेंगनेवाले जन्तुओं की मूरत की समानता में बदल डाला। इस कारण परमेश्‍वर ने उन्हें उनके मन की अभिलाषाओं के अनुसार अशुद्धता के लिये छोड़ दिया कि वे आपस में अपने शरीरों का अनादर करें। क्योंकि उन्होंने परमेश्‍वर की सच्‍चाई को बदलकर झूठ बना डाला, और सृष्‍टि की उपासना और सेवा की, न कि उस सृजनहार की जो सदा धन्य है! आमीन।”
 

परमेश्वर का क्रोध किन पर प्रगट होता है?

हम देख सकते हैं कि प्रेरित पौलुस ने उसी सुसमाचार का प्रचार किया जिस सुसमाचार का हम प्रचार करते हैं। परमेश्वर का क्रोध किस पर प्रकट होता है? परमेश्वर का न्याय उन पापियों पर प्रकट होता है जो सत्य को अधार्मिकता में दबाते हैं, अर्थात् उनके लिए जो पाप करते हैं और अपने स्वयं के विचारों से सत्य को रोकते हैं।
प्रेरित पौलुस स्पष्ट रूप से कहता है कि परमेश्वर का क्रोध सबसे पहले उन लोगों पर प्रगट होता है, जो सत्य को अधार्मिकता से रोकते हैं। उनका न्याय परमेश्वर करेगा। परमेश्वर का क्रोध कैसा होगा? परमेश्वर का क्रोध उनकी देह और आत्माओं को नरक में डाल देगा।
हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि केवल देह का न्याय किया जाएगा क्योंकि मनुष्यों के पास आत्माएं भी होती हैं। इसलिए, परमेश्वर मांस और आत्मा दोनों का न्याय करेगा। ऐसे लोग हैं जो अपने सांसारिक विचारों से परमेश्वर के सत्य को रोक देते हैं। ऐसे लोग हैं जो धर्मियों के विरुद्ध हैं, जिनके अन्दर पाप हैं। परमेश्वर का क्रोध और उसका न्याय उन लोगों पर प्रगट होता है जिनके मन कठोर हैं, जो परमेश्वर से नहीं डरते।
प्रेरित पौलुस रोमियों १:१७ में कहता है, “विश्वास से धर्मी जन जीवित रहेगा।” उसने यह भी कहा है की परमेश्वर का न्याय और क्रोध उन लोगों पर आएगा जो अपने पापों से सत्य को रोकते है।
 

अविश्वासी लोग परमेश्वर के क्रोध तले है

परमेश्वर ने व्यापक रूप से जगत को उद्धार का सत्य दिया है। परमेश्वर का सत्य और प्रेम पृथ्वी पर व्यापक है। इसलिए, परमेश्वर के सत्य और प्रेम को अनदेखा करने का कोई बहाना नहीं है। परमेश्वर उन सब लोगों का न्याय करेगा जो सत्य के सुसमाचार में विश्वास नहीं करते और जो इसके विरुद्ध हैं।
आइए उन लोगों के बारे में सोचें जिन्हें सच्चे सुसमाचार का प्रेम प्राप्त नहीं किया है। हम देखते हैं कि परमेश्वर ने क्या बनाया है; अर्थात् पानी, घास, पेड़, आकाश, पक्षी, आदि। ये चीजें बिना परमेश्वर की रचना से कैसे अस्तित्व में आ सकती हैं? बाइबल कहती है, “क्योंकि हर एक घर का कोई न कोई बनानेवाला होता है, पर जिसने सब कुछ बनाया वह परमेश्वर है” (इब्रानियों ३:४)। क्या परमेश्वर और सत्य के वचन पर विश्वास न करना उनकी गलती नहीं है? 
इसलिए, यह उन लोगों के लिए परमेश्वर के द्वारा न्याय प्राप्त करना उचित है जो पाप की माफ़ी के अनुग्रह पर विश्वास नहीं करते हैं। वे विकासवाद के सिद्धांत पर जोर देते हैं। वे इस बात पर कायम हैं कि ब्रह्मांड स्वाभाविक रूप से स्वयं विकसित हुआ है। वे यह भी कहते हैं कि लगभग १५ अरब वर्ष पहले सबसे पहले बिग बैंग नामक एक विस्फोट हुआ था, और उसके बाद, एक निश्चित जीव उत्पन्न हुआ। वे कहते हैं की, जीवन की यह मूल वास्तविकता बदल गई और यह मछलियों, जानवरों और अंत में मनुष्यों में विकसित हुई। यदि यह सिद्धांत सही होता, तो मनुष्यजाति अंत में एक या दो हजार वर्षों के बाद दूसरे जीवन रूप में बदल जाती।
“उसके अनदेखे गुण, अर्थात् उसकी सनातन सामर्थ्य और परमेश्‍वरत्व, जगत की सृष्‍टि के समय से उसके कामों के द्वारा देखने में आते हैं, यहाँ तक कि वे निरुत्तर हैं” (रोमियों १:२०)। लोग परमेश्वर को नकारते और अस्वीकार करते हैं, हालांकि वे प्रकृति के चमत्कारों और रहस्यों को देखने पर स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि परमेश्वर जीवित है। अविश्वासी लोग परमेश्वर के क्रोध के अधीन हैं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर की महिमा नहीं की या आभारी नहीं थे, इसलिए वे अपने विचारों में व्यर्थ हो गए। उनके मूढ़ हृदय पर अन्धेरा छा गया; बुद्धिमान होने का दावा करते हुए, वे मूर्ख बन गए और अविनाशी परमेश्वर की महिमा को नाशवान मनुष्यों, पक्षियों, चौपायों, और रेंगनेवाले जन्तुओं की मूर्तियों में बदल दिया। परमेश्वर का न्याय स्पष्ट रूप से उन लोगों की प्रतीक्षा कर रहा है। वे सब लोग जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है, वे परमेश्वर के न्याय के अधीन हैं, चाहे वे यीशु पर विश्वास करते हो या नहीं।
 

परमेश्वर ने अविश्वासियों को अशुध्धता के लिए छोड़ दिया

“इस कारण परमेश्‍वर ने उन्हें उनके मन की अभिलाषाओं के अनुसार अशुद्धता के लिये छोड़ दिया कि वे आपस में अपने शरीरों का अनादर करें। क्योंकि उन्होंने परमेश्‍वर की सच्‍चाई को बदलकर झूठ बना डाला, और सृष्‍टि की उपासना और सेवा की, न कि उस सृजनहार की जो सदा धन्य है! आमीन। इसलिये परमेश्‍वर ने उन्हें नीच कामनाओं के वश में छोड़ दिया; यहाँ तक कि उनकी स्त्रियों ने भी स्वाभाविक व्यवहार को उससे जो स्वभाव के विरुद्ध है, बदल डाला। वैसे ही पुरुष भी स्त्रियों के साथ स्वाभाविक व्यवहार छोड़कर आपस में कामातुर होकर जलने लगे, और पुरुषों ने पुरुषों के साथ निर्लज्ज काम करके अपने भ्रम का ठीक फल पाया” (रोमियों १:२४-२७)।
यह भाग क्या कहना चाहता है? परमेश्वर उन मनुष्यों को छोड़ देता है जो अपनी तरह से पाप करने के लिए सृष्टि की उपासना करते है और उनकी सेवा करते है। वह उन्हें शेतान को सोंप देता है। परमेश्वर शेतान को जो वो चाहे वह करने की अनुमति देता है। इसलिए, हमें परमेश्वर पर विश्वास करना चाहिए और उद्धार प्राप्त करना चाहिए। “यहाँ तक कि उनकी स्त्रियों ने भी स्वाभाविक व्यवहार को उससे जो स्वभाव के विरुद्ध है, बदल डाला। वैसे ही पुरुष भी स्त्रियों के साथ स्वाभाविक व्यवहार छोड़कर आपस में कामातुर होकर जलने लगे।” यही परमेश्वर का नकार करना है और यही एड्स का कारण है।
परमेश्वर ने प्राकृतिक उपयोग दिया। पुरुष को स्त्री के साथ रहना चाहिए। हालाँकि, यह तथ्य कि पुरुषों का पुरुषों के साथ संबंध है और महिलाओं के साथ महिलाओं के संबंध हैं, यह दर्शाता है कि वे उस प्राकृतिक उपयोग से इनकार करते हैं जो परमेश्वर ने दिया है। रोमियों की पुस्तक लगभग १९०० वर्ष पूर्व लिखी गई थी। प्रेरित पौलुस ने भविष्यवाणी की थी कि जो लोग अपने लिंग के प्राकृतिक उपयोग को छोड़ देते हैं, वे अपने यौन विकार के लिए दंड का सामना करेंगे। परमेश्वर का वचन इन दिनों वास्तविकता में सच हुआ है। हम जानते हैं कि एड्स विशेष रूप से समलैंगिकों में प्रचलित है। 
उनके लिए अपने यौन पापों के लिए दंड का भुगतान करना पूरी तरह से पर्याप्त है। परमेश्वर का क्रोध उन पुरुषों पर प्रकट होता है जो अपनी कामुकता के प्राकृतिक उपयोगों को बदल देते हैं। वे एड्स की सजा पाने के पात्र हैं। यह रोग निश्चित रूप से परमेश्वर पर अविश्वास के कारण होता है। परमेश्वर अविश्वासियों को एक निंदनीय मन देता है। दूसरे शब्दों में, यह निश्चित रूप से परमेश्वर का शाप है।
 
 
वे परमेश्वर की धार्मिकता के विरोधी है

जो मनुष्य परमेश्वर को अपने मन में स्मरण नहीं रखता वो निम्नलिखित प्रकार का है। “इसलिये वे सब प्रकार के अधर्म, और दुष्‍टता, और लोभ, और बैरभाव से भर गए; और डाह, और हत्या, और झगड़े, और छल, और ईर्ष्या से भरपूर हो गए, और चुगलखोर, बदनाम करनेवाले, परमेश्‍वर से घृणा करनेवाले, दूसरों का अनादर करनेवाले, अभिमानी, डींगमार, बुरी–बुरी बातों के बनानेवाले, माता पिता की आज्ञा न माननेवाले, निर्बुद्धि, विश्‍वासघाती, मयारहित और निर्दय हो गए। वे तो परमेश्‍वर की यह विधि जानते हैं कि ऐसे ऐसे काम करनेवाले मृत्यु के दण्ड के योग्य हैं, तौभी न केवल आप ही ऐसे काम करते हैं वरन् करनेवालों से प्रसन्न भी होते हैं” (रोमियों १:२९-३२)।
'ऐसे काम करने वाले' उसी बुराई को करने वालों के साथ क्या करते हैं? वे उनका स्वीकार करते हैं। जो लोग परमेश्वर के विरुद्ध हैं, वे उन धर्मियों के साथ क्या करते हैं जो परमेश्वर के वचन का पालन करते हैं? वे धर्मियों को यह कहते हुए सताते हैं, “तू विधर्मी है।” यीशु में विश्वास करने के बाद धर्मी लोगों को धार्मिकता के लिए सताया जाता है। वे धन्य हैं। 
लोग उन लोगों के प्रति सहानुभूति रखते हैं जो देह के द्वारा भटक जाते हैं। हालाँकि, यह कहना अजीब है, हम देखते हैं कि वे विरोध करते हैं और दूसरों को यीशु पर विश्वास करने और पाप की माफ़ी के द्वारा धर्मी बनने से रोकते हैं। यह पाप के दास के रूप में जीने जैसा है क्योंकि वे न तो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और न ही सत्य के वचन का पालन करते हैं।
इसलिए, अविश्वासी और शैतान कहते हैं कि हमें न तो पूरी तरह से पवित्र बनना चाहिए और न ही पाप की सम्पूर्ण माफ़ी प्राप्त करनी चाहिए, हालांकि वे हमें यीशु मसीह पर विश्वास करने की अनुमति देते हैं। अविश्वासी और आज्ञा न माननेवाले सोचते हैं और कहते हैं कि उन्हें स्वर्ग जाने के लिए यीशु पर विश्वास करना चाहिए फिर भले ही उनके दिलों में पाप क्यों न हों। इसलिए जब वे पापी होने के बावजूद भी यीशु पर विश्वास करते है तब उन्हें अच्छा लगता हैं। जो व्यक्ति मसीही होने के बावजूद भी परमेश्वर को नहीं जानता और उस पर विश्वास नहीं करता वह अपने ज्ञान में परमेश्वर को प्राप्त नहीं करता और उसका विरोध करता है। वे परमेश्वर की धार्मिकता का विरोध करते हैं। वे शैतान और सब पापों की भी पूजा करते हैं। वे, जिनका नया जन्म नहीं हुआ है वे यीशु पर विश्वास करने के बावजूद भी ऐसे ही हैं। बहुत से नाममात्र के मसीही हैं जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है। जो लोग अपने हृदय में पापों के साथ यीशु पर विश्वास करते हैं, वे परमेश्वर के सत्य के वचन का पालन नहीं करते हैं और नया जन्म पाए हुए मसीहियों का विरोध करते हैं जिन्होंने पाप की माफ़ी प्राप्त कर ली है और यीशु मसीह के सत्य में विश्वास करके पवित्र हो गए हैं।
 

जिन्होंने नया जन्म नहीं पाया वे नया जन्म पाए हुए लोगों का विरोध करते है

प्रेरित पौलुस बाइबल में कहता है कि परमेश्वर का क्रोध उन लोगों पर प्रगट होता है जो सत्य को अधर्म से दबाते हैं। वह यह भी कहता है कि परमेश्वर का न्याय सब भ्रष्ट और अधर्म पर स्वर्ग से प्रगट होता है। सब कुछ सत्य के अनुसार किया जाता है। सच तो यह है कि प्रभु ने हमारे सभी पापों को मिटा दिया है। परमेश्वर का न्याय उन लोगों पर प्रकट होता है जो सत्य के विरुद्ध हैं और इसे रोकते हैं। हम परमेश्वर के वचन के माध्यम से सीखते हैं कि नया जन्म प्राप्त न करनेवाले सब विश्वासी परमेश्वर के द्वारा न्याय प्राप्त करेंगे। परमेश्वर उन लोगों का न्याय करेगा जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है, भले ही वे यीशु पर विश्वास क्यों न करते हो।
वे विश्वासी जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है वे द्वेष से भरे हृदय के साथ नया जन्म प्राप्त किए हुए लोगों की निंदा करना पसंद करते हैं। परमेश्वर उन्हें नरक में भगा देते हैं। वे द्वेष से भरे हुए हैं और एक दूसरे से कानाफूसी करते हैं। जो पापी उन धर्मी के विरुद्ध आपसमें फुसफुसाते हैं जिनके पास पाप की माफ़ी है, उनका न्याय किया जाएगा। क्या आप मेरे कहने के मतलब को समझते है? हमें उनके साथ सहानुभूति रखनी चाहिए। वे अपने पापों के साथ परमेश्वर का विरोध करते हैं और नहीं जानते कि वे उसके खिलाफ में हैं, और फुसफुसाते है, "उनके लिए पाप न करना अजीब है। यह अजीब लगता है।" 
परमेश्वर का न्याय उन पर प्रगट होता है जो अपनी बुराइयों को लेकर परमेश्वर के विरुद्ध हैं। ऐसा करने वालों को खुशी मिलती है। वे कानाफूसी करने वालों और निंदा करने वालों को सही मानते हैं। मसीही जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है वे एक-दूसरे से कानाफूसी करते हैं और धर्मी की निंदा करते हैं। वे धर्मी की निंदा और घृणा करते हैं, अपने आप पर घमण्ड करते हैं, और एक साथ बुरी बातों की साजिश रचते हैं। क्या आप जानते हैं कि वे बुरी बातें की योजना कैसे बनाते हैं? वे एक दूसरे के साथ मिलकर बुरे काम करते हैं। वे अच्छे नारों के साथ धर्मियों का विरोध करते हैं जैसे "आओ यीशु पर अच्छी तरह से विश्वास करें। आइए सही प्रकार का विश्वास करें। आइए जगत की ज्योति बनें।” वे खुद को एकजुट करके ऐसे पाप करते हैं, क्योंकि अकेले पाप करने में मजा नहीं आता।
इसलिए, परमेश्वर भजन संहिता २:४ में कहता है, “वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हंसेगा; प्रभु उन्हें ठट्ठों में उड़ाएगा,” क्योंकि पृथ्वी के राजा परमेश्वर के विरुद्ध हैं। 'ओह! यह अजीब है। मुझे कभी भी कुछ नहीं होगा, चाहे मेरे खिलाफ आपकी चुनौती कुछ भी क्यों न हो। तुम लोग मुझे न्याय करने के लिए रिश्वत देते हो।' परमेश्वर न्याय के समय की प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि यह बहुत हास्यास्पद है। 
 

जो लोग धर्मियों का न्याय करते है उनका न्याय परमेश्वर के द्वारा होगा

जो परमेश्वर के सत्य के विरुद्ध हैं और जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है, वे पाप करते हैं। जो लोग नया जन्म प्राप्त करते हैं उनमें भी देह में द्वेष और अपूर्णता होती है। हालाँकि, वात्सव में यह मूल रूप से अलग है। हम परमेश्वर और सत्य में विश्वास करते हैं। हमने परमेश्वर के द्वारा पापों की माफ़ी प्राप्त की है। हालाँकि, वे परमेश्वर पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं करते हैं। ये लोग 'परमेश्‍वर की धार्मिकता और सच्चाई' के विरुद्ध हैं। “अत: हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है; क्योंकि जिस बात में तू दूसरे पर दोष लगाता है उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिये कि तू जो दोष लगाता है स्वयं ही वह काम करता है” (रोमियों २:१)।
प्रेरित पौलुस यहूदियों और मसीहियों से बात करता है जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है और केवल व्यवस्था में फसे हुए है। वे दूसरों का न्याय करते हुए कहते हैं, "खून मत करो, व्यभिचार मत करो, चोरी मत करो, और केवल परमेश्वर की सेवा करो", जबकि वे स्वयं व्यवस्था का पालन नहीं करते हैं। केवल परमेश्वर ही न्याय करता है, और केवल उसकी संतान, जिन्होंने नया जन्म प्राप्त किया है वे परमेश्वर के वचन के अनुसार न्याय कर सकते हैं।
इस प्रकार के लोगों का न्याय इसलिए किया जाना चाहिए क्योंकि वे धर्मी का मनमाने ढंग से न्याय करते हैं। परमेश्वर उन सबका न्याय करेगा जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है, अर्थात् यहूदी और विधिवादी-मसीही। परमेश्वर का क्रोध उन लोगों पर प्रकट होता है जो व्यवस्था का पालन करते हुए धार्मिक जीवन जीते हैं, जबकि उन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया है, और उन पर जी विश्वास करते है की यदि वे परमेश्वर की आज्ञा नहीं मानते हैं तो वे नरक में जाएंगे और यदि वे ऐसा करते हैं तो वे स्वर्ग जाएंगे। विश्वास का जन वो है जो यीशु मसीह में विश्वास करने के बाद धर्मी बन जाता है। हमें पहचान करनेवाला बनना चाहिए। जो लोग परमेश्वर पर  विश्वास कर सकते हैं और नया जन्म प्राप्त किए बिना पवित्र जीवन जी सकते हैं, वे धर्मी को अपने मापदंड के अनुसार न्याय करते हैं।
हालाँकि, परमेश्वर निश्चित रूप से उनका न्याय करेगा। वे नहीं जानते कि वे अपने मापदंड के अनुसार खुद का न्याय कर रहे हैं। ओह, आप लोग जो पाप की माफ़ी प्राप्त किए बिना, गलत विश्वासों के साथ, परमेश्वर के सत्य की कृपा प्राप्त किए बिना धर्मी का न्याय करते हो, क्या आप सोचते हो कि आप परमेश्वर के न्याय से बच सकते हो? इन लोगों का न्याय परमेश्वर के द्वारा किया जाएगा।
 

परमेश्वर का न्याय धर्मी है

“हम जानते है की ऐसे काम करनेवालों पर परमेश्वर की ओर से ठीक-ठीक दण्ड की आज्ञा होती है” (रोमियों २:२)। हमें यकीन है कि परमेश्वर का न्याय उन लोगों पर सत्य के अनुसार है जो यीशु पर विश्वास करने के बावजूद भी नया जन्म प्राप्त किए हुए नहीं है और दूसरों का न्याय करते है। हमें पता होना चाहिए कि परमेश्वर इन लोगों को नरक में भेजता है और वह अपनी सच्चाई के अनुसार उनका न्याय करता है।
परमेश्वर पापियों को नरक में भेजता है क्योंकि उसकी सच्चाई सही है, और क्योंकि परमेश्वर का न्याय सही है। कोई व्यक्ति नरक में जाएगा या नहीं यह बात पूर्वनिर्धारण के सिध्धांत पर निर्भर नहीं करता है जो यह प्रचार करता है की, 'परमेश्वर कुछ लोगों से प्रेम करता है, परन्तु दूसरों से बिना शर्त नफरत करता है।' परमेश्वर ने जगत की उत्पत्ति से पहले यीशु मसीह में सब लोगों को चुना है (इफिसियों १:४)।
जो कोई भी यह विश्वास करता है कि यीशु मसीह ने उसके सारे पापों को मिटा दिया है, उसे पापों की माफ़ी प्राप्त होती है। परमेश्वर ने इसे पूर्वनिर्धारित किया है। इसलिए, वे सब लोग जो यीशु पर विश्वास करते है फिर भी जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया वे नरक में जाएंगे। वे परमेश्वर के न्याय के अनुसार नरक में जाएंगे और यही सत्य है।
परमेश्वर का न्याय जो पापियों को नरक में डालता है वह सही है। क्यों? क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के महान प्रेम को अस्वीकार कर दिया और न तो परमेश्वर का उद्धार प्राप्त किया और न ही उस पर विश्वास किया। सत्य के अनुसार, उनके लिए यह उचित है कि वे उन लोगों को नरक में डाले जिन्होंने नया जन्म प्राप्त नहीं किया।
कुछ लोग कहेंगे, "परमेश्वर ने मुझे सुसमाचार का प्रचार क्यों नहीं किया?" उसने ऐसा नहीं किया? परमेश्वर ने आपको कई बार सुसमाचार का प्रचार किया। अपनी आंखें खोलकर उद्धार प्राप्त करने का प्रयास करें। कुछ कलीसिया हैं जो इस जगत में सच्चे सुसमाचार का प्रचार करती हैं। हालाँकि, यदि आप वास्तव में इसकी खोज करते हैं तो आप सच्चाई से मिल सकते हैं। मेरे मामले में, मैंने वास्तव में इसे खोजने की कोशिश की! जब मेरा नया जन्म नहीं हुआ था तब, एक उपदेश का प्रचार करने के बाद, मैंने प्रार्थना की, "हे प्रभु। मैं परमेश्वर के सामने एक पापी हूं, भले ही मैंने ऐसे लोगों को आपके वचन का प्रचार किया है। मैंने लोगों से जो कहा, वह वही था जो मैं खुद से कह रहा था। मैं पापी हूँ। कृपया मुझसे मिलें। कृपया मुझे बचाइए।" 
मुझे नहीं पता कि मैंने सच्चाई को खोजने की कितनी कोशिश की है। परमेश्वर उनसे मिलना चाहते है जो उसे खोजते है। परमेश्वर उन लोगों को भी छुड़ाना चाहता है जिन्होंने उसे नहीं खोजा। "जे मेरी प्रजा न थी, उन्हें मैं अपनी प्रजा कहूंगा; और जो प्रिय न थी, उसे प्रिय कहूंगा" (रोमियों ९:२५)। परमेश्वर कहता हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है जो हमें बचाने के लिए इस जगत में आया। जिन लोगों ने बड़ी लगन से परमेश्वर को खोजा है, वे अवश्य ही उनसे मिलेंगे। कुछ अन्य लोगों ने परमेश्वर की खोज नहीं की है, लेकिन जब सुसमाचार प्रचारक उनके पास आते हैं और सुसमाचार का प्रचार करते हैं, तब वे भी प्रभु से मिलने का अवसर प्राप्त करते हैं। कुछ लोगों को सुसमाचार में दिलचस्पी होगी, लेकिन अन्य लोगों को नहीं। जो लोग नरक में जाएंगे वे वहीं समाप्त हो जाएंगे क्योंकि उन्होंने सुसमाचार का नकार किया है।
जो लोग नरक में जाने के योग्य हैं, उनके लिए परमेश्वर के सत्य के अनुसार नरक में जाना उचित है। जो लोग स्वर्ग के राज्य में जाने के योग्य हैं, वे सही समझ के अनुसार यीशु पर विश्वास करके उस तक पहुँचते हैं, भले ही उनके पास कोई उत्कृष्ट पराक्रम न हों। यह परमेश्वर के सही निर्णय के द्वारा होता है।
परमेश्वर कुछ लोगों के प्रति अपने पक्षपात के कारण एक व्यक्ति को नर्क में और दूसरे को स्वर्ग के राज्य में यादृच्छिक रूप से नहीं भेजता है। परन्तु इसके बजाय, वह सत्य में सही निर्णय के अनुसार न्याय करता है। इसलिए हमें सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए। हे मनुष्य, तू जो ऐसे–ऐसे काम करनेवालों पर दोष लगाता है और आप वे ही काम करता है; क्या यह समझता है कि तू परमेश्‍वर की दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा? क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?” (रोमियों २:३-४)।
 

यीशु ने पहले ही अपने प्रेम के द्वारा जगत के सारे पापों को दूर कर दिया है

प्रेरित पौलुस उन पापियों, यहूदियों, और विधिवादी-मसीहीयों से कहता है, जो न तो यीशु का प्रेम प्राप्त करते हैं और न ही नया जन्म प्राप्त करते हैं, कि उनका न्याय किया जाएगा। उनका नर्क में जाना तय है। लेकिन सुसमाचार क्या है? रोमियों २:४ में, परमेश्वर कहता है, क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?” परमेश्वर का प्रेम सभी लोगों को सटीक रूप से प्रकट हुआ है और न्यायसंगत रूप से प्रबल हुआ है। 
कोई भी परमेश्वर के उद्धार की कृपा से अछूता नहीं है। यीशु ने जगत के सारे पापों को मिटा दिया है। यीशु ने हमें पूरी तरह से पवित्र किया है। जब भी हम पापों की माफ़ी के लिए प्रार्थना करते है तब क्या वह केवल हमारे मूल पापों को मिटाता है और हमारे दैनिक पापों के लिए हमें माफ़ करता है? नहीं। प्रभु ने पहले ही जगत के सारे पापों को हमेशा के लिए मिटा दिया है। फिर भी, जो लोग परमेश्वर के विरुद्ध हैं, वे उसकी भलाई और प्रेम की उपेक्षा करते हैं। “यीशु ने हमें कैसे बचाया? यदि में निरंतर पाप करता हूँ तो मैं कैसे कह सकता हूँ की, 'मेरे अन्दर कोई पाप नहीं है'? ये बकवास है। मेरे निरंतर पाप करने पर भी परमेश्वर मेरे सारे पापों को कैसे मिटा सकता है, भले ही फिर वह उद्धारकर्ता और प्रभु परमेश्वर हैं? 
लोग देह के अनुसार ऐसा सोचते हैं, फिर भी परमेश्वर ने अपने प्रेम से जगत के सारे पापों को मिटा दिया है। प्रभु इस जगत में आए और हमारे सारे पापों को पूरी तरह से मिटा दिया। प्रभु मनुष्यों की अपूर्णताओं और दुर्बलताओं को जानता है (देह बार-बार पाप करता है)। इसलिए, उसने अपने बपतिस्मा से और क्रूस पर अपना लहू बहाकर जगत के सारे पापों को हमेशा के लिए मिटा दिया है। प्रभु देह की दुर्बलताओं को अच्छी तरह जानता है। "मैंने तुम्हें बचाया है क्योंकि मैं जानता था कि तुम मरते दम तक बार-बार पाप करोगे।"
प्रभु ने जगत के पापों को धो दिया है। प्रभु ने हमें छुड़ाकर हम सब को स्वीकार किया है। प्रभु ने पापियों के लिए पाप की मजदूरी चुकाई है और उन्हें अपनी सामर्थ और धार्मिकता से पवित्र किया (यीशु को यरदन नदी में यूहन्ना बप्तिस्मा देनेवाले से बप्तिस्मा दिया गया था)। प्रभु ने अपने जीवन (लहू) के द्वारा हमारे पापों की मजदूरी चुकाकर, हमें आशीष दिया, अपनी संतान बनने की अनुमति दी और हमें स्वर्ग के राज्य में जाने के लिए सक्षम बनाया। प्रभु ने पापियों को अपनी धर्मी संतान बनाया।
 

अविश्वासियों को पश्च्याताप करना चाहिए और अपने हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ने चाहिए
 
“क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?” परमेश्वर उन लोगों को दण्ड देते हैं जो परमेश्वर की कृपा, सहनशीलता और धीरजरुपी धन को तुच्छ जानता है और नरक में जाते है। यह निश्चित है कि यीशु मसीह ने जगत के सब पापों को धो दिया, और यह कि सुसमाचार पूरी दुनिया में फैल गया। परन्तु लोग फिर भी नरक में जाते हैं क्योंकि वे इसमें विश्वास नहीं करते। यीशु ने हमें नरक में जाने से रोकने के लिए हमारे सब पापों को धोकर हमें बचाया, भले ही फिर हम उसकी कृपा, सहनशीलता और धीरजरुपी धन को तुच्छ जानकर नरक में जाना चाहते थे। 
इसलिए हमें उद्धार पाने के लिए यीशु मसीह के पानी और लहू पर विश्वास करना चाहिए। विश्वास करो, और उद्धार प्राप्त करो। जो परमेश्वर के प्रेम और उद्धार को तुच्छ समझते हैं वे नरक में जाएंगे। नरक एक ऐसा स्थान है जिसे परमेश्वर ने उन लोगों के लिए तैयार किया है जो उसके उद्धार के अनुग्रह और उसकी भलाई के धन को तुच्छ समझते हैं। अविश्वासियों ने पहले ही नरक के अपने टिकट खरीद लिए हैं। जो लोग नरक में जाने के लिए नियत हैं, उन्हें पश्चाताप करना चाहिए और अपने हृदयों को प्रभु की ओर मोड़ना चाहिए। जब तक आपको सच्चे सुसमाचार पर विश्वास न हो तब तक आपको स्वर्ग के राज्य को भी अलविदा कहना चाहिए।
 

लोग नरक में जाते है क्योंकि वे परमेश्वर के प्रेम का नकार करते है

“पर तू अपनी कठोरता और हठीले मन के कारण उसके क्रोध के दिन के लिए, जिसमें परमेश्वर का सच्चा न्याय प्रगट होगा, अपने लिए क्रोध कमा रहा है” (रोमियों २:५)। जिन लोगों के मन हठीले है और जो लोग पस्तावा नहीं करते वे नरक में जाएंगे। कुछ लोग नरक में जाते है क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के महान प्रेम का नकार किया है। वे पापी जिन्होंने हठीले मन से सत्य का नकार किया है और खुद के विचारों के अनुसार जिए है वे अपने पापों की कीमत के कारण नरक में जाएंगे। जो लोग परमेश्वर के प्रेम को प्राप्त करने से नकार करते है और पवित्रता को प्राप्त करने के लिए पस्तावे की प्रार्थना करते है वे नरक में जाएंगे। प्रकाशितवाक्य के दिन और परमेश्वर की धार्मिकता के न्याय तक परमेश्वर के क्रोध को इकठ्ठा करना प्रभु के प्रेम को नकार ने की वजह से है। 
छुटकारे की अपनी योजना में, परमेश्वर ने पापियों को बचाने और उन्हें धर्मी बनाने का फैसला किया, इससे पहले कि शैतान हमें पाप में भ्रष्ट कर दे। परमेश्वर ने हमें बचाने और पवित्र करने के लिए अपने पुत्र को भेजा। हालांकि, पापियों ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने परमेश्वर के प्रेम को ठुकराकर उसके क्रोध को पूरी तरह से भड़का दिया है और क्रोध के दिन और उसके धर्मी न्याय के प्रकाशितवाक्य के दिन उनका न्याय किया जाएगा। परमेश्वर का धर्मी न्याय उन लोगों को नरक में भेजना है जिनके हृदय में पाप हैं।
क्यों? क्योंकि परमेश्वर ने संसार के सब पापों को साफ़ कर दिया और जगत में सब को विश्वास के द्वारा बचा लिया। अविश्वासियों को अवश्य ही नर्क में जाना होगा। वे नरक में जाने के लिए हठीले और स्वेच्छापूर्ण हैं, इसलिए वे अंत में अपनी मूर्खता पर पछताएंगे। यदि पापी परमेश्वर के महान प्रेम को स्वीकार नहीं करते हैं तो वे नरक में जाएंगे।
लोग सोचते हैं कि परमेश्वर अनुचित है क्योंकि वह अपने अधिकार के अनुसार कुछ लोगों को नरक में और कुछ को स्वर्ग के राज्य में यादृच्छिक रूप से भेजता है। हालाँकि, यह सच नहीं है। परमेश्वर ने उन लोगों के लिए नरक का निर्माण किया जो उसके प्रेम और सच्चाई को नकारने के लिए बहुत जिद्दी हैं ताकि उनके वहाँ जाने के लिए पर्याप्त जगह हो।
बाइबल कहती है कि नरक एक झील है जो आग और गंधक से जलती है। जो लोग पाप करना पसंद करते हैं उनके लिए वहाँ मटमैले कीड़े मकोड़े हैं। वे रो सकते हैं, "नहीं, नहीं। मुझे इस जगह से नफरत है।" लेकिन परमेश्वर कहते है, "मैंने तुम्हारे सारे पाप धो दिए थे, लेकिन तुमने कहा था कि यदि तुम्हारे पास पाप है तो कोई फरक नहीं पड़ता। इसलिए, मैं आपको उपहार के रूप में, आपके दोस्तों के रूप में कीड़े देता हूं, क्योंकि आपको पाप की माफ़ी पसंद नहीं थी।” "नहीं, मुझे इससे नफरत है, प्रभु।" 
"आपको इससे नफ़रत थी फिर भी आपने इसकी मांग की थी। मैं धार्मिकता का प्रभु हूँ। मैंने आपको वह दिया जो तुम चाहते थे। मैं उन सब लोगों को नरक देता हूँ जो अपने हृदय में पाप रखना चाहते हैं।” यह परमेश्वर का सही न्याय है। इस संसार में रहते हुए मनुष्य पाप करते हैं, फिर भी उन्हें परमेश्वर के उद्धार के सुसमाचार की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए जिसने संसार के सभी पापों को धो दिया है।
लोग नरक में जाते हैं क्योंकि वे कठोर हृदय वाले होते हैं। हमें परमेश्वर के सामने जिद्दी नहीं होना चाहिए। हमें विश्वास करना चाहिए कि उसने पहले ही दुनिया के सभी पापों को धो दिया। भले ही वह दिखाई न दे लेकिन आपको विश्वास करना चाहिए।
 

परमेश्वर हमसे कहता है की उसने पहले ही हमें प्रेम किया है

परमेश्वर हमें बताता है कि वह पहले से ही हम से प्रेम करता है। "मैंने पहले ही तुम्हारे सारे पाप धो दिए हैं।" आपको इस तथ्य पर विश्वास करना चाहिए। जब परमेश्वर कहता है कि उसने आकाश और पृथ्वी को बनाया, तो हमें उस पर विश्वास करना चाहिए क्योंकि परमेश्वर का वचन सत्य है। विश्वास की शुरुआत परमेश्वर के वचन में विश्वास करने से होती है। लोग किसी चीज पर तभी विश्वास करते हैं जब वे उसे अपने छोटे दिमाग से समझते हैं और जब वे समझ नहीं पाते हैं तो उस पर विश्वास नहीं करते हैं। अविश्‍वासी जो यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने सभी पापियों को उनके पापों से बचाया, वे नरक में जाएंगे। ये वही हैं जो नरक में जाने का मन बना लेते हैं।
एक प्रमुख मसीही था जिन्होंने एक बार सार्वजनिक रूप से घोषित किया था की, "मैं परमेश्वर के सामने स्वीकार करता हूं कि मैं मरते समय तक पापी हूं।" वह मर गया और निश्चित रूप से नरक में गया। उसने परमेश्वर से कहा, "मैंने घोषणा की थी कि मैं परमेश्वर के सामने पापी हूं और उसके सामने कभी भी धर्मी नहीं बन सकता।" वह अपनी मृत्यु के समय तक पापी बना रहा। उसने अपनी अंतिम सांस तक परमेश्वर के प्रेम और सच्चाई को अस्वीकार किया। तब प्रभु ने कहा, “तू अपने विश्वास के प्रति कितना विश्वासयोग्य है! तुम्हारे लिए अपने विश्वास के अनुसार नरक में जाना उचित है। मैं तुम्हें नरक में भेजता हूं क्योंकि पापी कभी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते।"
 

यदि मैंने विश्वास किया होता,

वह व्यक्ति जिसने कहा की, "मैं घोषणा करता हूं कि मैं मरने तक पापी हूं," वह नरक में गया। परमेश्वर भी इन लोगों की मदद नहीं कर सकते। उन्होंने न केवल घोषित किया है कि वे पापी हैं, लेकिन यदि वे परसों नरक में जाते हैं, तो वे उन विश्वासियों को जो उन पर विश्वास करते है उन को भी यही सिखाते है की, “मरते दम तक हम पापी है और परमेश्वर के सामने खड़े रहने तक भी हम पापी ही रहेंगे।" इसलिए, कई विश्वासी भी उसी धार्मिक मार्ग का अनुसरण करते हैं। परमेश्वर ने कहा कि पापी नरक में जाएंगे। हालाँकि, अनगिनत मसीही आज के ईसाई धर्म में इस शिक्षा का पालन करते हैं। परमेश्वर ने कहा कि वे पापी नरक की लपटों में अपने दाँत पीसते हुए, सदा के लिए पछताएंगे, और कहेंगे, “यदि मैंने विश्वास किया होता; यदि मैंने केवल इस पर विश्वास किया होता।”
"यदि मैं इस तथ्य पर विश्वास करता कि यीशु ने मेरे सारे पापों को धो दिया और मेरे अपने विचारों को त्याग दिया होता, तो मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर चुका होता!" “यदि मैंने विश्वास किया होता; यदि मैंने केवल इस पर विश्वास किया होता।” नरक में इस तरह की बातें करने वाले बहुत से लोग होंगे। वे कहेंगे, "यदि मैंने विश्वास किया होता, यदि मुझे सत्य मिल जाता, तो मैं उसका पुत्र होता। मैं इतना जिद्दी क्यों था..."
हम धर्मी उस समय परमेश्वर से पूछेंगे, “हे प्रभु, कृपया हमें दिखाएँ कि पापी अब क्या कर रहे हैं। उन्होंने हमें, धर्मी लोगों को सताया था।” "नहीं, मेरे बच्चों, यह तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है, क्योंकि उनके बीच अपने परिचितों को देखकर तुम्हारा दिल दुखेगा। क्या आप वाकई उन लोगों को पीड़ित देखना चाहते हैं जिन्हें आप जानते हैं?" "कृपया हमें केवल एक बार दिखाएं!" प्रभु किसी दिन हमें यह दिखा सकते हैं क्योंकि वह बहुत उदार हैं। तो चलिए मान लेते हैं कि हम इसे देखते हैं। बहुत सारी चीखें सुनाई देगी जैसे: "यदि मैंने विश्वास किया होता, यदि मैंने विश्वास किया होता।" तब हमें आश्चर्य होगा, "यह शोर क्या है? क्या वे गाना गा रहे हैं?" "ध्यान से सुनें कि वे गा रहे हैं या पछता रहे हैं।" उस लौ में पुरुष और महिलाएं कोरस में गा रहे थे और पछतावा कर रहे थे, "यदि मैंने विश्वास किया होता।"
जिद्दी लोग नरक में जाएंगे यदि वे सही तरीके से जिद्दी न हों। हमें वास्तव में सत्य को दृढ़ता से धारण करने की आवश्यकता है। मनुष्य को अनिर्णय नहीं होना चाहिए। जब हमें दृढ बने रहना है तो हमें दृढ बने रहना चाहिए। हम सभी को सही तरीके से दृढ बने रहना है और जरूरत पड़ने पर हमें अपनी दृढ़ता को तोड़ना है।
 

परमेश्वर हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा

परमेश्वर “वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा : जो सुकर्म में स्थिर रहकर महिमा, और आदर, और अमरता की खोज में हैं, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा” (रोमियों २:६-७)। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति को उसके कामों के अनुसार बदला देता है और उसका न्याय करता है। 'देता है' का अर्थ है 'कर्म के अनुसार बदला।' किस तरह का व्यक्ति महिमा, सम्मान और अमरता की तलाश में अच्छा करते रहने के लिए धैर्य का उपयोग करता है? वह वो है जो यीशु के सम्पूर्ण उद्धार पर विश्वास करता है। 
संसार में बहुत से लोग हैं, परन्तु परमेश्वर केवल उन्हें ही अनन्त जीवन देता है जो धार्मिकता के लिए धीरज धरते हैं और उसकी सच्चाई पर विश्वास करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि दूसरे लोग क्या कहते हैं। परमेश्वर उन लोगों को अनन्त राज्य की महिमा देता है जो धर्मी बनना चाहते हैं और हमेशा के लिए सुखी जीवन जीना चाहते हैं। वे भलाई करना जारी रखते हैं और महिमा, सम्मान और अमरता की तलाश करते हैं; परमेश्वर की संतान बनना चाहते हैं। वे धीरज धरेंगे और परमेश्वर की धार्मिकता का अनुसरण करने के लिए भलाई करते रहेंगे। परमेश्वर उन लोगों को अनन्त जीवन देता है। परमेश्वर उन्हें अनन्तकाल तक जीने की अनुमति देता है और उन्हें अपनी सन्तान बनाता है। परमेश्वर के पुत्र उसके राज्य में देवता हैं।
“पर जो विवादी हैं और सत्य को नहीं मानते, वरन् अधर्म को मानते हैं, उन पर क्रोध और कोप पड़ेगा” (रोमियों २:८)। "पर जो" उन लोगों के समूह को संदर्भित करता है जो धन्य के विपरीत हैं। परमेश्वर का रोष और क्रोध उन लोगों को दिया जाता है जो उसकी धार्मिकता की अवज्ञा करते हैं, विवादास्पद हैं और सत्य का पालन नहीं करते हैं। परमेश्वर उन्हें नरक में भेजता है। जो लोग नया जन्म प्राप्त नहीं करते हैं और सत्य का पालन नहीं करते हैं वे एक समूह के रूप में विवादास्पद और सत्य के खिलाफ हैं।
जो लोग नया जन्म प्राप्त नहीं करते हैं वे विवादास्पद होते हैं और बदला लेना पसंद करते हैं। पूरे कोरियाई इतिहास में, हमारे पूर्वजों ने बदला लिया और राजनीतिक समस्याओं में एक-दूसरे से संघर्ष किया। शासक समूह का निर्णय इस तथ्य के आधार पर किया जाएगा कि कौन राजा बना। जब ली परिवार में से एक राजा बना, तो ली परिवार के पुरुषों को उच्च सामाजिक पदों पर रखा गया, जबकि अन्य को निष्कासित या सताया गया। लेकिन जब सिंहासन किम परिवार को मिला, तो सब कुछ पूरी तरह से बदल गया। लोगों ने केवल कुछ हासिल करने के लिए नहीं लेकिन अपने फायदे के लिए बदला लिया। 
वर्तमान मसीही धर्म इसी के समान है। वे संप्रदाय और पंथ की स्थापना करते है। किस लिए? एक समूह के रूप में सत्य की अवज्ञा करने के लिए। हालाँकि यीशु ने जगत के पापों को धो दिया है फिर भी वे एकमत से कहते हैं कि वे पापी है। वे धर्मी और उध्दार पाए हुए का दिखावा करते हैं, लेकिन सत्य का पालन नहीं करते हैं। वे धर्मी को विधर्मियों के रूप में यह कहते हुए सताते है कि उनके पास पाप करने का अधिकार है। प्रभु कहते हैं कि पापी जो धर्मी से विवाद करते हैं, वे गलत हैं और उन सभी को नरक में जाना चाहिए।
जो लोग सत्य और परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे प्रभु के वचन का पालन करते हैं। हम, धर्मी विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का न्याय सत्य के अनुसार है।
 

क्या मसीही संस्थाए हमें स्वर्ग के राज्य में भेज सकती है?

सांप्रदायिक संस्थाए हमें स्वर्ग के राज्य में नहीं पहुँचा सकते। मेरी पत्नी ने अपनी सास को क्रोधित करने के लिए उकसाया जब उसने उससे कहा, "एक धार्मिक देह आपको स्वर्ग के राज्य में नहीं भेज सकता है।" सच कहूं तो मुझे नहीं पता कि मेरी मां को अब भी इस बात पर गुस्सा क्यों आया। क्या आपको लगता है कि एक धार्मिक देह आपको स्वर्ग के राज्य में भेज सकता है? हम परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के द्वारा व्यक्तिगत रूप से बच जाते हैं और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करते हैं। क्या प्रेस्बिटेरियन कलीसिया की धार्मिक संस्था आपको स्वर्ग के राज्य में भेज सकते हैं? क्या बैपटिस्ट कलीसिया की एक संप्रदाय संस्था आपको भेज सकती है? क्या पवित्र कलीसिया कर सकती हैं? क्या सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट कलीसिया कर सकती है? नहीं। हम स्वर्ग के राज्य में तभी प्रवेश कर सकते हैं जब हम उस पाप की माफ़ी पर विश्वास करते हैं जिसे यीशु ने हमारे लिए तैयार किया था।
 

हमें परमेश्वर की कलीसिया में जुड़ कर रहना है

प्रेरित पौलुस ने सारे मसीहीयों में से स्पष्ट रूप से नरक में जानेवाले पापियों को स्वर्ग में प्रवेश करनेवाले धर्मी लोगों से अलग कर दिया। सुसमाचार सबके लिए समान है, यहूदियों के लिए और यूनानियों के लिए एक समान। यहाँ यूनानी अन्यजातियों को दर्शाते हैं और यहूदी इस्राएलियों को दर्शाते हैं। परमेश्वर लोगों के बाहरी रूप को नहीं देखता है। परमेश्वर एक ऐसे व्यक्ति की तलाश करता है जो अपने हृदय से परमेश्वर के वचन पर विश्वास करता हो। क्या आप विश्वास करते हैं कि यीशु ही परमेश्वर है? क्या आप विश्वास करते हैं कि यीशु हमारा उद्धारकर्ता है? हम स्वर्ग के राज्य में तभी जा सकते हैं जब हमें विश्वास हो कि यीशु ने अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को दूर कर दिया। हमें इस पर विश्वास करना है और इसे धोखा नहीं देना है। हमारे भीतर पवित्र आत्मा हमें हमारे विश्वासों के साथ विश्वासघात करने से रोकता है और जब हम संकट में होते है तब हमारे दुश्मनों को हराने में हमारी मदद करता है। हमें सावधान रहना होगा। 
बाइबल में, चार प्रकार की भूमि का एक दृष्टान्त है, लेकिन कुछ भूमि उन लोगों को दर्शाती है जिन्हें बचाया नहीं जा सकता। उस भूमि में बोए गए बीज उगते ही मर जाते हैं। ऐसी घटना मृत बीज होने जैसी ही है। उसका परिणाम भी वह है, मृत्यु। तो, क्या हम अपने आप हमारे विश्वासों का पालन कर सकते हैं? नहीं, हम अपने विश्वासों का पालन तभी कर सकते है जब प्रभु हमें सच्ची दाखलता में रहते हुए किसी भी परेशानी और हर आत्मिक बीमारी को चंगा करने की सामर्थ देते हैं।
परमेश्वर की कलीसिया दाखलता है। जब तक हम परमेश्वर की कलीसिया में बने रहते हैं, प्रभु हमें आशीष, चंगाई, सांत्वना और सताव सहने का विश्वास देता है। लेकिन यदि हम दाखलता में नहीं बने रहते तो हमारा क्या होगा? हम जल्द ही मर जाते है। धर्मी लोगों के हृदय शैतान के हमलों को सहन नहीं कर सकते हैं और अन्त में यदि वे कलीसिया के साथ एक नहीं होते है तो बीमार हो सकते हैं, हालांकि उनके पास कई क्षमताएं और शक्तियां हो सकती हैं। क्या आप देख रहे हे? वे धीरे-धीरे गिरते हैं और अधिक से अधिक बेकार हो जाते हैं। बाइबल कहती है, “तुम पृथ्वी के नमक हो; परन्तु यदि नमक का स्वाद बिगड़ जाए, तो वह फिर किस वस्तु से नमकीन किया जाएगा? फिर वह किसी काम का नहीं, केवल इसके कि बाहर फेंका जाए और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाए” (मत्ती ५:१३)।
यदि वे कलीसिया से अलग रहते हैं तो धर्मी भी व्यर्थ हैं। जब वे कलीसिया से जुड़े रहते है तब वे अपनी ज्योति चमका सकते हैं औरआशीष पाते है। लेकिन जब वे कलीसिया से अलग रहते हैं तो वे नष्ट हो जाते हैं और जब वे कलीसिया से अलग होते है तब वे जगत पर जय नहीं पा सकते। आप कब तक अपनी खुद की मान्यताओं को कायम रख सकते हैं? आप कब तक परमेश्वर की कलीसिया से अलग खड़े रह सकते हैं? यहाँ तक की परमेश्वर के सेवक भी जय नहीं पा सकते। हालाँकि, यदि हम दाखलता में बने रहें, तो हमारा घराना उद्धार पाएगा, और हमारे द्वारा बहुत से लोग पाप से माफ़ी पा सकते हैं। शारीरिक इच्छा पूरी करने के बाद लूत कहाँ गया? वह सदोम गया। वह वहां अच्छी तरह से रहता था। उसका परिणाम क्या हुआ? वह बरबाद हो गया। बाइबल कहती है कि लूत के सभी वंशज नष्ट हो गए। मोआबी और अम्मोनी लूत की बेटियों में से उत्पन्न हुए।
जो वंश परमेश्वर के विरुद्ध थे, वे एक धर्मी व्यक्ति लूत से क्यों पैदा हुए थे? ऐसा इसलिए था क्योंकि वह कलीसिया से जुदा हो गया था। किसी भी कठिन समय में मैं निराश नहीं होता उसका कारण यह है कि परमेश्वर ने अपनी कलीसिया की स्थापना की। परमेश्वर उस कलीसिया को आशीष देता हैं जहां धर्मी एक साथ इकट्ठा होते हैं और हर एक संत के लिए कलीसिया का चरवाहा और प्रभु बन जाता है। यह उनका वादा और आश्वासन है।
“इसलिये जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नष्‍ट भी होंगे; और जिन्होंने व्यवस्था पाकर पाप किया, उनका दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा; (क्योंकि परमेश्‍वर के यहाँ व्यवस्था के सुननेवाले धर्मी नहीं, पर व्यवस्था पर चलनेवाले धर्मी ठहराए जाएँगे। फिर जब अन्यजाति लोग जिनके पास व्यवस्था नहीं, स्वभाव ही से व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उनके पास न होने पर भी वे अपने लिये आप ही व्यवस्था हैं। वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखाते हैं और उनके विवेक भी गवाही देते हैं, और उनके विचार परस्पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं;)” (रोमियों २:१२-१५)
एक व्यक्ति जो कलीसिया नहीं जाता है वह इन दिनों व्यवस्था नहीं जानता है। तब उसका विवेक व्यवस्था बन जाती है क्योंकि वह व्यवस्था को नहीं जानता है। वह बुराई करता है, हालांकि वह जानता है कि यह उसके विवेक में सही है या गलत। फिर, यह एक पाप है और उसे पाप से बचने के लिए प्रभु की तलाश करनी चाहिए। परमेश्वर उसी से मिलता है जो वास्तव में उसे खोजना चाहता है।
हमें परमेश्वर के सामने उसकी दया की तलाश करनी चाहिए और उस पर विश्वास करना चाहिए। हमें अपने अभिमान को त्यागते हुए उस पर विश्वास करना चाहिए। हमें विश्वास से जीना चाहिए। हमें परमेश्वर की कलीसिया को नहीं छोड़ना चाहिए; हमें कलीसिया में खोजना, विश्वास करना और उसका पालन करना चाहिए। जब हम कलीसिया में रहते हैं तो परमेश्वर हमें बहार नहीं करता है, भले ही फिर हम अशक्त और कमजोर हो।
 

यहूदियों के पाप

अब प्रेरित पौलुस यहूदियों को स्वर्ग के राज्य में जाने वालों से अलग करने के बाद पूरे पैमाने पर सुसमाचार का प्रचार करना शुरू करता हैं। 
“यदि तू यहूदी कहलाता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और परमेश्‍वर के विषय में घमण्ड करता है, और उसकी इच्छा जानता और व्यवस्था की शिक्षा पाकर उत्तम उत्तम बातों को प्रिय जानता है; और अपने पर भरोसा रखता है कि मैं अंधों का अगुवा, और अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, और बुद्धिहीनों का सिखानेवाला, और बालकों का उपदेशक हूँ; और ज्ञान, और सत्य का नमूना, जो व्यवस्था में है, मुझे मिला है। अत: क्या तू जो दूसरों को सिखाता है, अपने आप को नहीं सिखाता? क्या तू जो चोरी न करने का उपदेश देता है, आप ही चोरी करता है? तू जो कहता है, “व्यभिचार न करना,” क्या आप ही व्यभिचार करता है? तू जो मूरतों से घृणा करता है, क्या आप ही मन्दिरों को लूटता है?” (रोमियों २:१७-२२)। 
हमें निम्नलिखित बातों को जानना चाहिए। परमेश्वर ने मूल रूप से यहूदियों से बात की थी, इसलिए उनके पास परमेश्वर का वचन और बलिदान प्रणाली थी। उसने यहूदियों के माध्यम से मसीहा का वादा किया और अपने यहूदी सेवकों के माध्यम से अपनी योजना दिखाई। तो, मूसा और सभी भविष्यद्वक्ता यहूदी थे। हालाँकि, यहूदियों ने सोचा कि वे समझ गए हैं कि परमेश्वर को क्या प्रसन्न करेगा और उसकी व्यवस्था क्या थी, परमेश्वर के वचन को ध्यान से पढ़ना और याद करना। फिर भी, प्रेरित पौलुस ने कहा, “यदि तू यहूदी कहलाता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और परमेश्‍वर के विषय में घमण्ड करता है।" यहूदियों का उद्धार नहीं हुआ था, हालांकि उन्होंने परमेश्वर पर घमंड किया और बलिदानों की सेवा विश्वासयोग्यता से की। जो लोग यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में पूरी तरह से विश्वास नहीं करते हैं, वे अविश्वासियों के समान हैं। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने न तो परमेश्वर के उस वादे पर विश्वास किया कि वह उन्हें बलिदान प्रणाली के रूप में बचाएगा, और न ही यीशु, उद्धारकर्ता पर विश्वास किया। 
यहूदी नरक में जाएंगे क्योंकि वे यीशु, उद्धारकर्ता में विश्वास नहीं करते हैं। भेड़ों के सिर पर बार-बार हाथ रखना उनके लिए बेकार था। वे वास्तव में विश्वास नहीं करते थे कि पुराने नियम के अंत में, मलाकी के समय में 'पर हाथ रखने' का अर्थ 'पापों को पारित करना' था। उन्होंने दाऊद के समय तक इस पर भली-भांति विश्वास किया था, परन्तु सुलैमान के समय से ही उनका विश्वास डगमगाने लगा था। विभाजित राज्य के युग के दौरान, उन्होंने मंदिर में औपचारिक बलिदान की सेवा करते हुए बाल और अशेर जैसे अन्य देवताओं की आराधना की। औपचारिक बलिदानों की सेवा करना परमेश्वर पर विश्वास न करने के समान है। जब हम उसके वचन पर विश्वास करते हैं और उसका पालन करते हैं तो परमेश्वर संतुष्ट होता है।
तम्बू की बलि प्रणाली में, एक व्यक्ति के पाप बलि के जानवर के सिर पर तब डाल दिए जाते थे जब वह उस पर हाथ रखता था। लेकिन वे इस पर विश्वास नहीं करते थे, अन्य लोगों को सिखाते थे, हालांकि वे जानते थे कि क्या गलत है और क्या सही। यह यहूदियों का पाप था। परमेश्वर के वचन की सच्चाई में विश्वास नहीं करना, उसके वचन पत्रों में जानना, और अन्य लोगों को वचन का प्रचार करना यहूदियों का पाप था। 
यह परमेश्वर पर विश्वास न करने जैसा ही है। यह घातक पाप है। “यदि तू यहूदी कहलाता है, और व्यवस्था पर भरोसा रखता है, और परमेश्‍वर के विषय में घमण्ड करता है, और उसकी इच्छा जानता और व्यवस्था की शिक्षा पाकर उत्तम उत्तम बातों को प्रिय जानता है; और अपने पर भरोसा रखता है कि मैं अंधों का अगुवा, और अंधकार में पड़े हुओं की ज्योति, और बुद्धिहीनों का सिखानेवाला, और बालकों का उपदेशक हूँ; और ज्ञान, और सत्य का नमूना, जो व्यवस्था में है, मुझे मिला है।” पौलुस ने यहूदियों को अविश्वास के पापों को बताया।
 

हृदय में पाप के साथ यीशु पर विश्वास करना परमेश्वर को अशुध्द करना है

हम आज के अधिकांश मसीहीयों पर यहूदियों की वही गलती लागू कर सकते हैं। यहूदी वही हैं जो यह नहीं मानते कि यीशु ने उनके सब पापों को मिटाकर उन्हें पवित्र किया है। “तू जो व्यवस्था के विषय में घमण्ड करता है, क्या व्यवस्था न मानकर परमेश्‍वर का अनादर करता है? “क्योंकि तुम्हारे कारण अन्यजातियों में परमेश्‍वर के नाम की निन्दा की जाती है,” जैसा लिखा भी है” (रोमियों २:२३-२४)। यदि हम यीशु पर गलत तरीके से विश्वास करते हैं तो यह परमेश्वर के नाम को अपवित्र करना है। यदि हम यीशु ने जो किया उस पर ठीक ठीक विश्वास नहीं करते और यदि हम नया जन्म प्राप्त नहीं करते तो यह परमेश्वर के नाम को अपवित्र करना है।
नया जन्म प्राप्त किए बिना यीशु पर विश्वास करना परमेश्वर के नाम को अपवित्र करना है। “यदि तू व्यवस्था पर चले तो खतने से लाभ तो है, परन्तु यदि तू व्यवस्था को न माने तो तेरा खतना बिन खतना की दशा ठहरा। इसलिये यदि खतनारहित मनुष्य व्यवस्था की विधियों को माना करे, तो क्या उसकी बिन खतना की दशा खतने के बराबर न गिनी जाएगी? और जो मनुष्य शारीरिक रूप से बिन खतना रहा, यदि वह व्यवस्था को पूरा करे, तो क्या तुझे जो लेख पाने और खतना किए जाने पर भी व्यवस्था को माना नहीं करता है, दोषी न ठहराएगा? क्योंकि यहूदी वह नहीं जो प्रगट में यहूदी है; और न वह खतना है जो प्रगट में है और देह में है। पर यहूदी वही है जो मन में है; और खतना वही है जो हृदय का और आत्मा में है, न कि लेख का : ऐसे की प्रशंसा मनुष्यों की ओर से नहीं, परन्तु परमेश्‍वर की ओर से होती है” (रोमियों २:२५-२९)। हमें अपने हृदय से यीशु के वचन का स्वीकार करना चाहिए।
 

पहले क्या आया, ख़तना या व्यवस्था?

कौन पहले आया, खतना या व्यवस्था? परमेश्वर ने इस्राएल को सबसे पहले क्या दिया? ख़तना। परमेश्वर ने इब्राहीम को खतना कराने के लिए कहा। इब्राहीम ९९ साल का था फिर भी उसका कोई वैध पुत्र नहीं था। हालाँकि, जब इब्राहीम ७५ साल का था तब परमेश्वर ने उसे एक पुत्र देने का वादा किया था। परमेश्वर ने इब्राहीम से कहा, "बाहर आओ, मैं तुम्हें उतने वंशज दूंगा जितने आकाश के तारे हैं।" इब्राहीम ने परमेश्वर के वचन में विश्वास किया और २५ वर्षों तक प्रतीक्षा की। २५ साल बाद आखिरकार वादा पूरा हुआ। इसलिए, जब वह १०० साल का था तब उसे उसका पुत्र दिया गया था। उसने २५ साल इंतजार किया, भले ही वह थोड़ा निराश था और उसने इंतजार करते हुए कई गलतियां कीं। परमेश्वर ने उसे और उसके पुत्रों को प्रतिज्ञा का देश, कनान देने का भी वादा किया, जिसका आत्मिक अर्थ है स्वर्ग का राज्य। 
स्वर्ग के राज्य का वादा करने के बाद, परमेश्वर ने इब्राहीम और उसके घर के पुरुषों में से प्रत्येक पुरुष को खतना करने के लिए कहा। परमेश्वर ने कहा कि खतना परमेश्वर और उनके बीच वाचा का चिन्ह होना चाहिए। इसलिए, इब्राहीम ने अपने लिंग की आगे की चमड़ी का खतना किया। उसके घर के सभी पुरुषों ने यह विधि की। खतना उस विश्वास के समान है जिसके द्वारा हम विश्वास करते हैं और सत्य का सुसमाचार प्राप्त करते हैं। 
 

इस्राएल ने हृदय का ख़तना करवाने से नकार किया

हालाँकि, इस्राएल ने इब्राहीम की सन्तान होने का घमण्ड किया और खतना किया, अन्यजातियों से घमण्ड से पूछा, "क्या तुम्हारा खतना हुआ है?" हमें हृदय का ख़तना करना चाहिए। जब हम यह वचन प्राप्त करते हैं कि यीशु ने जगत के पापों को मिटा दिया और अपने हृदय से उस पर विश्वास करते है तब हम बचते है।
इजरायल से ज्यादा किसी अन्य देश पर आक्रमण नहीं किया गया है। वे लगभग दो हजार वर्षों तक बेघर लोगों की तरह गहरे शोक में थे। परमेश्वर ने इस्राएल को कुचल दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने विश्वास नहीं किया था।
भले ही परमेश्वर इस्राएल से प्रेम करता था और चाहता था की वे विश्वास करे की परमेश्वर ने उनके सारे पाप धो दिए है फिर भी उन्होंने परमेश्वर के नाम को अपवित्र किया क्योंकि उन्होंने विश्वास नहीं किया। वह इस्राएल के चरवाहे के रूप में उनके शत्रुओं को हराना चाहता था और उन्हें आशीष, प्रेम और महिमा देना चाहता था। 
यदि लोग अपने हृदय से परमेश्वर पर विश्वास करे और पापों की माफ़ी प्राप्त करे तो परमेश्वर ने सभी लोगों को महिमा देने और उन्हें अपनी संतान बनाने का वादा किया है। इस्राएल के उदाहरण के द्वारा, परमेश्वर संसार के सभी लोगों को चेतावनी देता है कि यदि वे उसके वचन का स्वीकार नहीं करते हैं, तो वह उन्हें नरक में भेज देगा। 
परमेश्वर ने वादा किया है कि जो कोई भी उसके सत्य के सुसमाचार पर विश्वास करता है, वह वे सब आशीषें प्राप्त कर सकता है जिनका यीशु ने वादा किया था, भले ही फिर वह कर्मों में अपर्याप्त हो। परमेश्वर के न्याय से बचने का एकमात्र तरीका सुसमाचार में विश्वास करना है। इस पर विश्वास करें, और तब आप बच जाएंगे और नरक से बचने में सक्षम होंगे। 
मैं चाहता हूँ की प्रभु की कृपा सब आत्माओं पर बनी रहे।