Проповіді

विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 2-2] ( रोमियों २:१-१६ ) वे जो परमेश्वर के अनुग्रह को नकारते है

( रोमियों २:१-१६ )
“अत: हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है; क्योंकि जिस बात में तू दूसरे पर दोष लगाता है उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिये कि तू जो दोष लगाता है स्वयं ही वह काम करता है। हम जानते हैं कि ऐसे ऐसे काम करनेवालों पर परमेश्‍वर की ओर से ठीक–ठीक दण्ड की आज्ञा होती है। हे मनुष्य, तू जो ऐसे–ऐसे काम करनेवालों पर दोष लगाता है और आप वे ही काम करता है; क्या यह समझता है कि तू परमेश्‍वर की दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा? क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है? पर तू अपनी कठोरता और हठीले मन के कारण उसके क्रोध के दिन के लिये, जिसमें परमेश्‍वर का सच्‍चा न्याय प्रगट होगा, अपने लिये क्रोध कमा रहा है। वह हर एक को उसके कामों के अनुसार बदला देगा : जो सुकर्म में स्थिर रहकर महिमा, और आदर, और अमरता की खोज में हैं, उन्हें वह अनन्त जीवन देगा; पर जो विवादी हैं और सत्य को नहीं मानते, वरन् अधर्म को मानते हैं, उन पर क्रोध और कोप पड़ेगा। और क्लेश और संकट हर एक मनुष्य के प्राण पर जो बुरा करता है आएगा, पहले यहूदी पर फिर यूनानी पर; परन्तु महिमा और आदर और कल्याण हर एक को मिलेगा, जो भला करता है, पहले यहूदी को फिर यूनानी को। क्योंकि परमेश्‍वर किसी का पक्षपात नहीं करता। इसलिये जिन्होंने बिना व्यवस्था पाए पाप किया, वे बिना व्यवस्था के नष्‍ट भी होंगे; और जिन्होंने व्यवस्था पाकर पाप किया, उनका दण्ड व्यवस्था के अनुसार होगा; (क्योंकि परमेश्‍वर के यहाँ व्यवस्था के सुननेवाले धर्मी नहीं, पर व्यवस्था पर चलनेवाले धर्मी ठहराए जाएँगे। फिर जब अन्यजाति लोग जिनके पास व्यवस्था नहीं, स्वभाव ही से व्यवस्था की बातों पर चलते हैं, तो व्यवस्था उनके पास न होने पर भी वे अपने लिये आप ही व्यवस्था हैं। वे व्यवस्था की बातें अपने अपने हृदयों में लिखी हुई दिखाते हैं और उनके विवेक भी गवाही देते हैं, और उनके विचार परस्पर दोष लगाते या उन्हें निर्दोष ठहराते हैं;) जिस दिन परमेश्‍वर मेरे सुसमाचार के अनुसार यीशु मसीह के द्वारा मनुष्यों की गुप्‍त बातों का न्याय करेगा”।
 

विधि-सम्मत लोग हमेशा दुसरे लोगों पर दोष लगाते है, जब की वे खुद व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते
 

आइए हम व्यवस्था के बारे में बात करे। प्रेरित पौलुस ने व्यवस्था पर आधार रखनेवाले यहूदियों को कहा, “अंत: हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है; क्योंकि जिस बात में तू दुसरे पर दोष लगाता है उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिए की तू जो दोष लगाता है स्वयं ही वह काम करता है। हे मनुष्य, तू जो ऐसे ऐसे काम करनेवालों पर दोष लगाता है और आप वे ही काम करता है; क्या यह समझता है की तू परमेश्वर की दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा?”  (रोमियों २:१,३) विधि-सम्मत लोग सोचते है की वे ठीक रीति से परमेश्वर का आदर करते है। इस प्रकार के लोग अपने हृदय से परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, लेकिन अपने गलत घमंड के द्वारा विश्वास करते है जो उनके खुद के कर्मो पर आधारित है। ऐसे लोगों को दूसरों का न्याय करना अच्छा लगता है और वे इस कार्य में कुशल है। हालाँकि, जब वे परमेश्वर के वचन से दूसरों का न्याय करते है, तब उन्हें पता नहीं चलता है की वे भी ठीक उन लोगों की तरह ही है जिनकी टिका हो रही है आर वे भी ऐसी ही गलती कर रहे है। 
उदाहरण के तौर पर, वे सब्त के दिन को पवित्र नहीं मानते, हालाँकि वे परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार दूसरों को ऐसा करने के लिए कहते है। वे लोगों को व्यवस्था को मानने और उसका पालन करने के लिए कहते है, लेकिन वे खुद इसका पालन नहीं करते। प्रेरित पौलुस ने इस प्रकार के लोगों को कहा है की, “हे मनुष्य, तू जो ऐसे ऐसे काम करनेवालों पर दोष लगाता है और आप वे ही काम करता है; क्या यह समझता है की तू पर्मेश्वर की दण्ड की आज्ञा से बच जाएगा?”  (रोमियों २:३)।
विधि-सम्मत लोग परमेश्वर के आगे उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते है। व्यवस्था हमें कभी नहीं बचा सकती, इसलिए यदि हमारा धार्मिक जीवन व्यवस्था पर आधारित है तो परमेश्वर हमारा न्याय करेगा। विधि-सम्मत जीवन परमेश्वर के क्रोध का कारण बनता है। जिन लोगों ने उद्धार नहीं पाया है, वे व्यवस्था पर विश्वास रखते हैं। वे दूसरों को व्यवस्था के अनुसार कुछ खास तरीकों से जीने के लिए कहते हैं, लेकिन उन्हें इन दिनों ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए। 
बहुत समय पहले हमारे देश में ज्यादातर मसीही ऐसे ही हुआ करते थे। विधि-सम्मत सेवक उन महिलाओं को फटकार लगाते थे, जिनके बाल खुले होते थे और कहते थे कि उन्हें नर्क में भेज दिया जाएगा। यदि हम उन सेवकों के निर्देश के अधीन होते जो इस तरह से कलीसिया के सदस्यों को व्यवस्था के कामों के साथ सिखाते थे, तो हम निश्चित रूप से मानते कि जिन लोगों के बाल खुले होते वे स्वतः ही नरक में जाते हैं। यह कुछ ऐसा था जो लगभग १५-२० साल पहले ही हुआ था। अगर कोई महिला लिपस्टिक का इस्तेमाल करती है, तो इसका मतलब है कि उसे ऐसे सेवकों के निर्देश के तहत नरक में भेजा जाएगा। 
ये लोग विधि-सम्मत थे। वे शारीरिक रूप से परमेश्वर के सामने पवित्र प्रतीत हुए; लोगों को लिपस्टिक का उपयोग न करने या बालों को खुला न रखना, हमेशा धीरे से चलने और किसी भी सामान को न खरीदने और न बेचने की शिक्षा देते। इन विधि-सम्मत लोगों ने विश्वासियों को बताया कि परमेश्वर के वचनों के दृष्टिकोण में कौन सी बातें सही थीं और कौनसी गलत, जबकि वे स्वयं पाखंडी थे।
 

यहूदी ऐसे ही थे

यहूदी ऐसे ही थे। उन्होंने व्यवस्था के साथ अन्यजातियों का न्याय करते हुए कहा, "वे परमेश्वर को नहीं जानते और मूर्तियों की आराधना करते हैं। वे नरक के लिए नियोजित हैं और क्रूर लोग हैं।” हालाँकि, वे खुद इस जगत की भौतिक वस्तुओं के साथ-साथ अन्यजातियों के देवताओं को भी परमेश्वर से अधिक प्रेम करते थे।
“अंत: हे दोष लगानेवाले, तू कोई क्यों न हो, तू निरुत्तर है; क्योंकि जिस बात में तू दुसरे पर दोष लगाता है उसी बात में अपने आप को भी दोषी ठहराता है, इसलिए की तू जो दोष लगाता है स्वयं ही वह काम करता है।” यहूदियों ने व्यवस्था के अनुसार दूसरों का न्याय किया, लेकिन उन्होंने कभी भी अपनी शिक्षाओं का पालन नहीं किया। इसके अलावा, जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करते हैं या फिर उनके हृदयों में यीशु का उद्धार है, वे सोचते हैं कि वे बिल्कुल परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीते हैं, लेकिन वे यहूदियों की तरह ही हैं।
 

विधि-सम्मत लोगों का न्याय होगा

यहाँ की युवा पीढ़ी के लोगों ने शायद कभी इस तरह से धार्मिक जीवन नहीं जिया है। हालाँकि, पुरानी पीढ़ियों के लोगों ने शायद व्यवस्था पर आधारित उपदेशों को सुना होगा। बालों को खुला रखनेवालों को सेवक इसलिए डांटते थे क्योंकि वे भद्दे लगते थे। सेवक आजकल ऐसा नहीं कर सकते। बहुत समय पहले 'धर्मी' या 'पूरी तरह से पवित्र' जैसे शब्दों को कहना आलोचना का निशाना बन गया था। हालाँकि आजकल बहुत से लोग आम तौर पर 'धर्मी' अभिव्यक्ति का उपयोग करते हैं। इसका मतलब है कि मसीही धर्म बदल गया है। झूठे शिक्षक बिना सोचे-समझे झूठ नहीं बोल सकते क्योंकि उनकी मंडलियों को भी किताबों और टेपों के माध्यम से सच्चा सुसमाचार दिया गया है। इसलिए, वे अपने श्रोताओं से अकारण बात नहीं कर सकते। 
जानने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो विधि-सम्मत लोग यीशु मसीह के पूर्ण उद्धार की उपेक्षा करते हैं और जो व्यवस्था के अनुसार धार्मिक जीवन जीते हैं, उनका न्याय परमेश्वर के सामने किया जाएगा।
वचन ४ परमेश्वर के न्याय के बारे में बात करता है। आइए इसे पढ़ें, "क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?" परमेश्वर विधि-सम्मत लोगों का न्याय करेगा। भाइयों, विधि-सम्मत विश्वास परमेश्वर का विरोध करता है। विधि-सम्मत लोग परमेश्वर के प्रेम का उन मानदंडों के साथ विरोध करते हैं जो उनके स्वयं के कर्मों पर आधारित होते हैं। विधि-सम्मत लोग उद्धार के उस सुसमाचार की उपेक्षा करते हैं जिसमें कहा गया है कि परमेश्वर ने अपनी कृपा, सहनशीलता, और धीरजरुपी के धन के द्वारा उनके सभी पापों और अधर्मों को माफ़ कर दिया है।
जो लोग व्यवस्था के अनुसार धार्मिक जीवन जीते हैं, उनका न्याय परमेश्वर के सामने किया जाएगा। हालाँकि, बहुत से लोग परमेश्वर की उपस्थिति के सामने व्यवस्था के अनुसार अपना धार्मिक जीवन व्यतीत करते हैं। हमें यह नहीं सोचना चाहिए की, 'हम उसके न्याय से बच गए है क्योंकि हमने उद्धार पाया है।' प्रेरित पौलुस ने कहा कि विधि-सम्मत लोग उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, लेकिन इसके बजाए वे नष्ट होंगे और उनका न्याय किया जाएगा। हमें यह जानना चाहिए कि किस प्रकार के लोग व्यवस्था के अनुसार धार्मिक जीवन जीते हैं ताकि हम उन्हें सुसमाचार सुनाने की योजना बना सकें।
 

यहूदियों को मिलाकर इस जगत में बहुत सारे विधि-सम्मत लोग है

प्रेरित पौलुस ने केवल इस तथ्य के बारे में बात नहीं की कि यीशु ने जगत के सभी पापों को धो दिया। उन्होंने यह भी बताया कि जो लोग व्यवस्था के आधीन धार्मिक जीवन जीते है, जैसे की यहूदी लोग, वे कैसे, परमेश्वर का विरोध करते हैं और उनका न्याय किया जाएगा। वे परमेश्वर के उस प्रेम की उपेक्षा करते हैं, जिसके द्वारा उसने हमारे प्रति सहानुभूति दिखाई। वे पापों की माफ़ी के सुसमाचार की उपेक्षा करते हैं, जिसमें कहा गया है कि परमेश्वर ने जगत के सभी पापों को मिटा दिया है क्योंकि हम उसकी दृष्टि में दयनीय थे।
क्या आपके आस-पास ऐसे कई विधि-सम्मत लोग नहीं हैं जो इस तरह से धार्मिक जीवन जीते हैं? ऐसे कई विधि-सम्मत लोग हैं जो मानते हैं कि परमेश्वर को जगत के लिए कोई दया नहीं है और उन्होंने हमारे सभी पापों को नहीं मिटाया है। फिर भी, कुछ ऐसे हैं जो परमेश्वर के प्रेम को स्वीकार करते हैं और उनके सामने 'धर्मी' कहे जाते हैं। ऐसे विधि-सम्मत लोग भी हैं जो उसकी धार्मिकता की उपेक्षा करते हैं और अपने विचारों से परमेश्वर के उद्धार का तिरस्कार करते हैं, यहाँ तक कि इस क्षण भी। उसके बाद पूर्ण बहुमत है, और वे पहले को हलके में लेते है। 
मैं चाहता हूं कि आप यह जान लें कि आपके आस-पास बहुत से लोग हैं जो यहूदियों की तरह परमेश्वर की कृपा, सहनशीलता और धीरजरुपी के धन की उपेक्षा करते हैं। यह सच है या झूठ? हाँ, यह सच है, ऐसे बहुत से लोग हैं।─ एक विधि-सम्मत व्यक्ति परमेश्वर के सामने दूसरों का तिरस्कार करता है। विधि-सम्मत क्या तुच्छ समझते हैं? परमेश्वर का पूर्ण उद्धार।
इतने सारे लोग जो इस जगत में रहते हैं वे इस तथ्य से घृणा करते हैं कि यीशु परमेश्वर का पुत्र है, जिसमें यहूदी भी शामिल हैं। यहूदी इस्राएल के लोग हैं। वे कहते हैं, “वह परमेश्वर का पुत्र कैसे है? वह केवल भविष्यवक्ताओं में से एक है।” वे केवल इस स्तर तक यीशु को स्वीकार करते हैं। इस्राएलियों ने परमेश्वर के पुत्र का तिरस्कार किया और अपने हाथों से यीशु के गाल पर थप्पड़ मारते हुए कहा, "उसने परमेश्वर की निन्दा की है" (मत्ती २६:६५)। वे भी अब उसका तिरस्कार करते हैं। यहूदी परमेश्वर का तिरस्कार करते हैं क्योंकि वे उसके पुत्र पर विश्वास नहीं करते हैं। यह समझ में आता है कि इस्राएलियों ने यीशु की अवहेलना की क्योंकि वे उस पर विश्वास नहीं करते थे। लेकिन, अन्यजातियों के बीच विधि-सम्मत लोग किस बात से घृणा करते हैं? वे परमेश्वर के प्रेम और धार्मिकता के धन को तुच्छ जानते हैं।
 

विधि-सम्मत लोग अपने खुद के कर्म के आधार पर जीवन जीते है

एक विधि-सम्मत संप्रदाय में, विधि-सम्मत लोग अपने अनुयायियों को दाहिने गाल पर थप्पड़ खाने के बाद बाएं गाल को आगे करना सिखाते हैं। उन्हें कभी क्रोध नहीं करना चाहिए। उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि कैसे सिद्धांत का प्रचार करना है, धीरे से चलना है, कैसे मुस्कुराना है, इत्यादि। उन्हें लगता है कि वे शास्त्रों के बारे में सब कुछ जानते हैं और इस बात पर जोर देते हैं कि उनके मूल पाप को माफ़ कर दिया गया है, लेकिन वे हर दिन पश्चाताप की प्रार्थना करके दैनिक पापों की माफ़ी प्राप्त करते हैं। 
कुछ ऐसा ही व्यवस्था पर आधारित विश्वास भी है। ये चीजें लोगों को परमेश्वर के प्रेम और उद्धार के धन से भी घृणा करती हैं। वे कहते हैं, "तुम्हें यह कहते हुए बहुत गर्व होता है कि आप में कोई पाप नहीं है, आप धर्मी हैं, और यह कि आपने यीशु पर विश्वास करके सभी पापों की माफ़ी प्राप्त की है, उन्हें धो दिया गया है!" वे सोचते हैं कि परमेश्वर उन्हें धर्मी होने के लिए बुलाया है, भले ही फिर वे वास्तव में धर्मी न हों। सभी विधि-सम्मत लोग इन झूठे मसीही सिद्धांतों को मानते हैं। इसलिए हमें ऐसे विधि-सम्मत लोगों से दूर रहना चाहिए।
यीशु पर विश्वास करने के बाद, क्या पश्चाताप की प्रार्थनाओं के द्वारा दैनिक पापों की माफ़ी प्राप्त करना विधि-सम्मत है? या ऐसा नहीं है? हाँ, यह ऐसा ही है।─ क्या यह कर्म के नियम से निकला है या नहीं? हाँ, यह कर्म के नियम से ही निकला है।─ यह विश्वास नहीं है। जो लोग यह घोषणा करते हैं कि वे व्यवस्था के कार्यों से जीते हैं, वे विधि-सम्मत हैं। हमारे आस-पास ऐसे अनगिनत लोग हैं।
प्रेरित पौलुस ने केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा पापों की सम्पूर्ण माफ़ी प्राप्त की। हालाँकि, इस्राएली, जो व्यवस्था के अनुसार पुराने नियम में विश्वास करते थे, वे यहूदी धर्म में विश्वास करते थे। क्या वे सभी लोग जो इन लोगों में से है वे विधि-सम्मत थे या नहीं? वे वो थे जो व्यवस्था का पालन करते थे; बाहरी कर्मों की शिक्षा देते थे, जैसे कि कैसे चलना चाहिए, क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए। 
इसलिए, प्रेरित पौलुस ने इन लोगों पर दोष लगाया। यह काम उसने अच्छे तरीके से किया। आज के मसीही भी व्यवस्था के अनुसार विधि-सम्मत जीवन जीते हैं। उनका मानना है कि, भले ही वे विश्वास से पवित्र होते हैं, लेकिन उनके पापों को प्रतिदिन तभी माफ़ किया जाता है जब वे अपने पापों के लिए पश्चाताप की प्रार्थना करते हैं। वे विधि-सम्मत हैं और उनका विश्वास व्यवस्था पर आधारित है।
कई पादरी प्रचार करने में अच्छे हैं, वे कहते है, "हम विश्वास से बचाए गए हैं।" हालाँकि, वे अंत में कहते हैं, "लेकिन हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि हमने पाप किया है और पश्चाताप करना चाहिए।" ये पादरी विधि-सम्मत हैं। वे अपने उद्धार के लिए अपने स्वयं के कार्यों पर निर्भर हैं, जबकि वे खुद यीशु मसीह पर विश्वास नहीं करते या निर्भर नहीं रहते।
क्या हमने उद्धार पाया उससे पहले हम विधि-सम्मत थे? – हाँ, हम थे। - हमने नया जन्म प्राप्त किया उससे पहले हम सोचते थे की अच्छे कर्म हमें उद्धार देगा। इस जगत में बहुत से लोग है जो इस प्रकार सोचते है। परमेश्वर उन्हें पश्चाताप करने के लिए कहता है। “इसलिये, मन फिराओ और लौट आओ कि तुम्हारे पाप मिटाए जाएँ, जिससे प्रभु के सम्मुख से विश्रान्ति के दिन आएँ” (प्रेरित ३:१९)। हालाँकि, यह लोग पश्चाताप नहीं करते है। वे कितने हठीले है! इसलिए, प्रेरित पौलुस एकबार ओर इन हठीले लोगों से बात करता है।
 

विधि-सम्मत लोग घोषणा करते है की वे मरते दम तक पापी है

आइए हम रोमियों २:५ को पढ़ते है, “पर तू अपनी कठोरता और हठीले मन के कारण उसके क्रोध के दिन के लिए, जिसमे परमेश्वर का सच्चा न्याय प्रगट होगा, अपने लिए क्रोध कमा रहा है।” जब तक परमेश्वर का सच्चा न्याय विधि-सम्मत लोगों पर प्रगट नहीं होगा तब तक उसका क्रोध नहीं आएगा। 
हालांकि, विधि-सम्मत लोग इतने जिद्दी हैं कि यदि उसके गले पर चाक़ू भी रखा जाए तब भी वे यही अंगीकार करेंगे की वे परमेश्वर के सामने पापी है। खतरे का सामना करने पर भी वे अंगीकार करेंगे कि वे परमेश्वर के सामने पापी हैं। कुछ लोग घोषणा करते हैं कि वे मरने के दिन तक परमेश्वर के सामने पापी हैं। कितने जिद्दी हैं ये लोग! वे कहते हैं कि वे पापी हैं क्योंकि वे परमेश्वर के वचन के अनुसार नहीं जी सकते, भले ही वे यीशु मसीह में विश्वास करते हों। 
परमेश्वर क्या कहते हैं? वह कहता है, “क्योंकि तुम वचनों के अनुसार नहीं जी सकते, इसलिए मैंने तुम्हें बचाया। मैंने तेरे सब पापों को मिटा दिया और तेरा सर्वथा उद्धार किया।” वे न तो यीशु मसीह में विश्वास रखते हैं और न ही अपने पापों से छुटकारा पाने के लिए परमेश्वर की धार्मिकता को स्वीकार करने का प्रयास करते हैं। इसके बजाय, वे इस बात पर जोर देते हैं कि वे मरने के दिन तक पापी हैं क्योंकि वे व्यवस्था के कामों और यीशु मसीह में विश्वास दोनों के द्वारा उद्धार पाने की कोशिश करते हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि वह समय आएगा जब उनके अपने विश्वासों और कार्यों के लिए उनका न्याय किया जाएगा।
“पर तू अपनी कठोरता और हठीले मन के कारण उसके क्रोध के दिन के लिए, जिसमे परमेश्वर का सच्चा न्याय प्रगट होगा, अपने लिए क्रोध कमा रहा है” (रोमियों २:५)। प्रेरित पौलुस का मतलब था, “तुम कितने हठीले हो। आपको आपके कठोर हृदयों के लिए न्याय किया जाएगा। आप उसके क्रोध को कमा रहे हो।" यीशु मसीह ने हमारे सभी पापों को मिटा दिया, भले ही कोई इस पर विश्वास करे या न करे। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को यीशु मसीह के द्वारा उसके सभी पापों से बचाया जा सकता है। यीशु मसीह ने हमारे पापों को साफ़ किया है इस तथ्य पर हमारे विश्वास के द्वारा हमारा उद्धार हुआ है। जब हमने माफ़ी प्राप्त करने के लिए अपने दैनिक पापों का पश्चाताप किया था तब हम व्यवस्था के मुताबिक़ नहीं जी सकते थे, इसलिए हम अन्यजातियों के धर्मों से यीशु मसीह के पास लौट आए। हम मरते दम तक पाप करने के लिए नियोजित है, इसलिए हम व्यवस्था के कामों से नहीं, बल्कि प्रभु में विश्वास के द्वारा धर्मी बन सकते हैं।
क्या तुम यह घोषणा करते हो कि तुम मरते दम तक परमेश्वर के सामने धर्मी हो? या क्या आप घोषणा करते हैं कि जब तक आप मर नहीं जाते तब तक आप पापी बने रहेंगे? हम घोषणा करते हैं कि हम धर्मी हैं। क्या यह केवल जबर्दस्ती परिवर्तन करने से संभव है? कुछ लोग कह सकते हैं कि यह जबर्दस्ती परिवर्तन करने जैसा है। इस तरह की मत-शिक्षा के लिए संभवतः कौन आगे आएगा? कोई नहीं। 
आइए मान लें कि कोई आपको हर दिन शिक्षा देता है। आप यह कहकर दृढ़ता से विरोध करेंगे, “ऐसा क्यों है? तो? तो क्या?" क्या ज्यादातर लोग इस तरह से प्रतिक्रिया नहीं देंगे? हम किसी चीज़ पर तभी विश्वास करते हैं जब हम हृदय से पुष्टि करते हैं कि यह सच है। यदि कोई व्यक्ति सुन्दर वचनों से  हमें ऐसी किसी भी चीज़ पर विश्वास करने के लिए धोखा देने की कोशिश करता है जो बाइबल के अनुसार नहीं है, तो ऐसा नहीं हो पाएगा। थोड़ा सा भी नहीं। हम जानते हैं कि मनुष्य बहुत हठीले होते हैं, लेकिन यदि यह परमेश्वर का वचन है तो हम नम्र हो जाते हैं और सत्य में विश्वास करते हैं।
 

विधि-सम्मत लोग कितने हठीले है

वे कितने जिद्दी हैं। वे घोषणा करते हैं कि वे अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक पापी हैं। यहूदी धर्म को मानने वाले बहुत से लोग हैं। क्या आज के मसीहीयों में बहुत से ऐसे लोग हैं जो वास्तव में यहूदी धर्म को मानते हैं? या नहीं हैं? बहुत सारे लग हैं। "परमेश्वर, एक पापी यहाँ है। कृपया मेरे पापों को क्षमा करें।" ऐसे कई लोग हैं जो परमेश्वर के सामने यह घोषणा करते हैं कि वे पापी हैं क्योंकि वे अपनी कमजोरियों और दैनिक पापों को अपने विचारों से देखते हैं। भले ही दुनिया में एक अरब से अधिक मसीही हों और कोरिया में दस मिलियन मसीही हों, ये लोग व्यवस्था का पालन करने वाले हैं।
 

विधि-सम्मत लोग फरिशी जैसे है

पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करने से पहले मैं भी एक विधि-सम्मत व्यक्ति था। मैं सोचता था की, "मैं प्रतिदिन पाप करते हुए धर्मी कैसे बन सकता हूँ?" आजकल ऐसा नहीं है। आपके जानने वाले बहुत से लोग है जो जिद्दी व्यवहार करते हैं। बाइबल के अनुसार इस प्रकार के लोग कहाँ जाते हैं? वे नरक में जाएंगे क्योंकि उन्होंने अपने कठोर हृदयों के कारण परमेश्वर के क्रोध को कमाया है। विधि-सम्मत लोगों को भी इस जगत में रहते हुए धन्यवाद देने के द्वारा और यीशु मसीह ने उनके पापों को वास्तव में दूर किया है यह विश्वास करने के द्वारा एक बार पश्चाताप करना चाहिए। 
हालाँकि, वे पश्चाताप करने के लिए बहुत जिद्दी हैं। ये लोग दया के पात्र हैं। ऐसा करने पर भी वे पछताते नहीं हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो फरीसियों की तरह व्यवहार करते हैं। वे बाइबल को अपने हाथों के निचे पकडे हुए धीरे से कलीसिया के सामने लोगों का अभिवादन करते हुए कहते हैं, “आप कैसे है? आप आज कैसे है?" रविवार के दिन जब वे लोगों से मिलते हैं तो उनकी आंखें अहंकार से भरी हुई होती हैं। वे यीशु से भी अधिक दिव्य दिखने की कोशिश करते हैं। कितना अच्छा होता यदि वे वास्तव में प्रतिदिन इसी प्रकार दिव्य होते? 
क्या आप जानते हैं कि विधि-सम्मत पादरियों की पत्नियां क्या कहती हैं? वे कहती हैं कि जब उनके पति मंच पर उपदेश देते हैं तो वे खुश होती हैं क्योंकि उनके पति ऐसे "पवित्र और दयालु" तरीके से बातें करते हुए कोमल शब्दों में बोलते हैं। हालांकि, घर पहुंचते ही वे बदल जाते हैं। एक बार, एक विधि-सम्मत पादरी की पत्नी ने अपने साथ ओवन, कंबल और चावल लेकर, मंच के पीछे एक घर बना लिया, क्योंकि उसका पति घर पर एक डाकू की तरह होता है, लेकिन मंच के पीछे बहुत ही कोमल रहता है। पादरी ने उससे पूछा कि वह वहाँ क्या कर रही है। उसकी पत्नी ने कहा कि उसे वहां अच्छा लगा क्योंकि पादरी वहाँ नम्र था और मंच के पीछे उसकी आवाज कोमल लग रही थी, लेकिन घर पर वह बदल जाएगा और उसे परेशान करेगा।
 

हमें सुसमाचार का प्रचार करना ही चाहिए

सच कहूं तो मैंने अपनी पत्नी से कई अंक गंवाए है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरी पत्नी कहती है, "केवल एक चीज जिसकी आप परवाह करते हैं वह है सुसमाचार।" मैं सब कुछ ठीक से नहीं कर सकता क्योंकि मैं एक आदर्श व्यक्ति नहीं हूँ। पहली चीज जो मुझे अच्छी तरह करनी चाहिए वह है परमेश्वर का कार्य। दूसरी बात, मुझे अपने घर की देखभाल करनी चाहिए। तीसरा, मुझे दूसरे काम करने होंगे। ये मेरे अधिमान्य आदेश हैं। यह सिर्फ इसलिए नहीं है क्योंकि मैं एक पादरी हूं। मैं ऐसा इसलिए करता हूं क्योंकि मैं सुसमाचार की सेवा करने का कार्यभार संभालता हूं। मैं अपने सभी मामलों का ध्यान रखने के बाद सुसमाचार की सेवा नहीं कर सकता। इसलिए, मैं सुसमाचार के प्रचार पर ज़ोर देता हूँ और सुसमाचार का प्रचार करने के बाद अपने अन्य सभी मामलों का ध्यान रखता हूँ। मुझे नहीं लगता कि मैं वैसे भी अपने सभी कार्यों को खत्म करने के बाद सुसमाचार का प्रचार कर सकता था। 
विधि-सम्मत लोग जब पुल्पिट पर खड़े होते हैं तो स्वर्गदूतों की तरह दिखते हैं। वे विश्वासियों को अपने पापों के लिए रोना सिखाते हैं। प्रत्येक विधि-सम्मत व्यक्ति को यीशु पर विश्वास करने के बाद पापों की माफ़ प्राप्त करनी चाहिए क्योंकि तभी व्यक्ति वास्तव में खुश हो सकता है कि वह पापरहित हो गया है। यही एकमात्र तरीका है जिससे किसी की आत्मा खुश हो सकती है। लोग पाप करते हैं और अपने जीवन को जीते हुए अनैतिक कार्य करते हैं, और इस प्रकार यदि किसी के दिल में पाप है, तो यह उसके लिए नरक से भी बदतर होगा। परमेश्वर ऐसे लोगों का न्याय करता है।
मैं यह कह रहा हूँ कि बहुत से लोग परमेश्वर के सामने क्रोध को संचित कर रहे हैं। जो लोग न तो पश्चाताप करते हैं, न परिवर्तित होते हैं और न ही यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं, जबकि वास्तव में विश्वास करने का नाटक करते है, उनका न्याय परमेश्वर के क्रोध से होगा। वे परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकते। चाहे हम परमेश्वर के सामने सच्चा विश्वास करते हो या नहीं लेकिन हम उसे धोखा नहीं दे सकते। यदि हम विश्वास नहीं करेंगे तो हमारा न्याय किया जाएगा। परमेश्वर का क्रोध उन पर प्रकट होता है जिनके पास विश्वास नहीं है। वे नरक की भीषण आग में जल जाएंगे। बहुत से लोग हैं जो अपने अविश्वास के कारण नरक में जलाए जाएंगे। 
इसलिए हमें सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए। हमें लगातार परमेश्वर के वचन का प्रसार भी करना चाहिए। हर बार जब हम इकट्ठे होते हैं, तो हमें सुसमाचार के बारे में सोचना चाहिए और न केवल अपने बारे में, लेकिन दूसरों की परवाह करने के लिए भी समय निकालना चाहिए। हमें सुसमाचार का प्रचार करने का कारण यह है कि हमें लोगों को परमेश्वर के क्रोध से स्वतंत्र होने में मदद करनी है, भले ही वे हमें सताते हैं और परमेश्वर के प्रेम का तिरस्कार करते हैं।
हमें निम्नलिखित बातों को जानना चाहिए। हमारे आस-पास बहुत से लोग हैं जो इस क्रोध को प्राप्त करेंगे। हमें इस बारे में सावधानी से सोचना चाहिए कि हमें वास्तव में इसकी गवाही देनी चाहिए या नहीं, क्यों हमें सुसमाचार का प्रचार करने और अन्य लोगों के लिए भेंट लेने के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करना चाहिए। यदि हम परमेश्वर को अपने क्रोध से उनका न्याय करने दे तो क्या परमेश्वर प्रसन्न होगा? हम उन्हें वैसे ही नहीं छोड़ सकते जैसे वे हैं। यह अच्छी तरह से जानते हुए, हमें दुनिया भर में सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए।
यदि आपके परिवार में कोई विधि-सम्मत है, तो परमेश्वर के क्रोध से पूरे परिवार का न्याय होगा। क्रोध क्या है? जब बच्चे अपने माता-पिता की बात नहीं मानते हैं, तो हम कहते हैं, "यदि आप नहीं मानते हैं, तो आपको मार पड़ेगी।" अगर वे अपने बच्चों को सहन नहीं कर सकते हैं तो माता-पिता अपने बच्चों को मारते है। बच्चे अपनी गलती स्वीकार करते हैं और माफ़ी मांगते हैं। माता-पिता अपने बच्चों को माफ कर देते हैं क्योंकि वे उनकी संतान हैं। वचन ४ में लिखा है, “क्या तू उसकी कृपा, और सहनशीलता, और धीरजरूपी धन को तुच्छ जानता है? क्या यह नहीं समझता कि परमेश्‍वर की कृपा तुझे मन फिराव को सिखाती है?” हालाँकि, परमेश्वर कब तक सहन करते हैं? परमेश्वर इस धरती पर ७०-८० साल तक सहन करते हैं, लेकिन लोग दो-तीन बार मना करने पर अपने बच्चों को बेंत से मारते हैं। परमेश्वर हमारे जीवन के अंत तक सहन करते हैं।
 

परमेश्वर ने विधि-सम्मत लोगों के लिए नरक की आग को तैयार किया है

जब प्रभु अपने हाथों में बेंत लेंगे तब अन्त होगा। परमेश्वर ने विधि-सम्मत लोगों के लिए एक पिघलने वाली भट्टी तैयार की है, जिसमें उबलती पिघली हुई चट्टानें और गंधक हैं। परमेश्वर अपने क्रोध से मरे हुओं को अमर शरीरों में पुनर्जीवित करता है। परमेश्वर उनके शरीर को अमर बनाता है ताकि वे हमेशा के लिए पीड़ा का अनुभव कर सके, और वह उन्हें पिघलने वाली भट्टी में डाल देता है जो कभी नहीं बुझती। परमेश्वर का क्रोध उन्हें अनन्त शरीर में पुनर्जीवित करता है और उन्हें हमेशा के लिए पीड़ित करता है। वे जलते हुए कभी मरेंगे नहीं, भले ही वह बहुत ही गरम हो और वे कहे की, “कृपया करके अपनी ऊँगली का सिरा पानी में भिगोकर मेरी जीभ को ठंडी करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूँ" (लूका १६:२४)।
हमें उन्हें सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए क्योंकि यह स्पष्ट है कि उनका न्याय किया जाएगा। भले ही हमें तिरस्कृत किया जाए या हमारा सताव किया जाए लेकिन हमें अपने चारों ओर के विधि-सम्मत लोगों को सुसमाचार का प्रचार करने का कारण यह है की हम उन्हें क्रोध और विनाश से बचा सके। क्या आप समझते हैं कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ क्यों करते हैं, हम दूसरों को बचाने में क्यों रुचि रखते हैं, और हम कलीसिया के अधिकांश वित्त को साहित्यिक सेवा में क्यों खर्च करते हैं? यदि हम केवल हम अपनी कलीसिया के लिए ही पैसा खर्च करे तो हम आमिर र हो सकते हैं। हम अच्छा खा सकते थे और जी सकते थे। 
हालाँकि, दुनिया भर में सुसमाचार को फैलाने के लिए बहुत सारी भौतिक चीजों की आवश्यकता होती है। क्या अप जानते है क्यों? क्योंकि इस तरह अन्य लोगों को बचाया जा सकता है। इसलिए, हम अपने आप को पूरी दुनिया में सुसमाचार के प्रचार के लिए समर्पित करते हैं। यदि हम ऐसा नहीं करते, तो क्या दूसरे लोग पापों की माफ़ी प्राप्त करने में सक्षम होते?
भले ही परमेश्वर ने आपको पहले ही उद्धार दिया हो लेकिन यदि हमने आप को सुसमाचार न सुनाया होता, तो क्या आप उध्दार प्राप्त करते? नहीं आप नहीं कर सकते। नया जन्म प्राप्त करने से पहले हम सभी विधि-सम्मत थे। भले ही हम सोचते की हम यीशु पर विश्वास करते है लेक्किन हम पाप के साथ थे। यदि हमने यह सुसमाचार न सुना होता तो हम इस संसार में नाश हो जाते।
क्या हम उन्हें नरक में जाने और नाश होने दे सकते हैं? नहीं, हम नहीं कर सकते। हम उन्हें नरक में जाने नहीं दे सकते क्योंकि हम प्रभु के सुसमाचार और उद्धार को जानते हैं। हम जानते हैं कि कौन नरक में जाएगा और कौन स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा। इसलिए, हम उनकी चिंता करते हैं, और प्रार्थना करते हैं और सुसमाचार का प्रचार करते हैं। हम इस सेवकाई के लिए पैसा सुरक्षित करते हैं और इतना पैसा खर्च करते हैं इसका कारण निम्नलिखित है: इस जगत में सब कुछ प्राप्त करने से बहेतर है की एक आत्मा को बचाए। 
विधि-सम्मत लोगों द्वारा तिरस्कृत और सताए जाने के बावजूद भी हम सहनशीलता और धीरज के साथ सुसमाचार का प्रचार क्यों करते हैं, इसका कारण उन आत्माओं को बचाना है जिनका न्याय परमेश्वर के क्रोध के द्वारा किया जाएगा।
आप सोच सकते हैं, 'अच्छा होता की आप सच्चे सुसमाचार पर पढ़ने योग्य किताबें लिखते और उसे परचे पर छपवाकर दुनियाभर में बाँट देते।' यदि यह सच्चे सुसमाचार का प्रचार करने का एक अच्छा तरीका होता तो हम ऐसा जरुर करते। हालाँकि, यह काम नहीं आ सकता है, इसलिए हम अक्सर हर संभव उपाय करने की कोशिश करते हैं और प्रार्थना करते रहते हैं। 
हम सुसमाचार प्रचारक कुछ भी कमाने के लिए सुसमाचार का प्रचार करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे आत्माओं को बचाने के लिए सुसमाचार का प्रचार करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि सभी पापी निश्चित रूप से नरक में जाएंगे। हालाँकि, इस दुनिया में कई विधि-सम्मत लोग वास्तव में अपनी सांसारिक वासना का पालन करते है जबकि उन्हें मसीही धर्म के प्रति अपनी भक्ति पर गर्व है। हमें विधि-सम्मत लोगों को सुसमाचार सिखाने का कारण समझना चाहिए। 
हमें यह भी जानना चाहिए कि यहोवा ने हमें दस आज्ञाओं में सब्त के दिन को पवित्र रखने की आज्ञा क्यों दी और सब्त के दिन का पालन नहीं लारने वालों को पत्थरवाह करके क्यों मार डाला गया। सब्त के दिन का तात्पर्य उस सुसमाचार से है कि यीशु ने हमारे सभी पापों को धो डाला। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यीशु ने हमारे सभी पापों को मिटा दिया है। हमें इसे प्रभु में विश्वास के द्वारा भी प्रचारित करना चाहिए, जिसमें यह तथ्य भी शामिल है कि प्रभु ने जगत के सभी पापों को मिटा दिया है।
ऐसा लगता है कि मैंने इस उपदेश के दौरान विधि-सम्मत लोगों पर अपनी नाराजगी को संतुष्ट किया है। लेकिन हमें उन्हें माफ कर देना चाहिए और उनके प्रति व्यापक विचार रखना चाहिए। यदि हम अपना मुंह बंद रखेंगे तो उनका नरक में जाना तय है। हम सुसमाचार प्रचारक विधि-सम्मत लोगों को अपने पैसे से हमें तिरस्कृत करने या हमारे लिए अपने शारीरिक प्रभाव का प्रदर्शन करने की अनुमति नहीं दे सकते।
 

हमें हमारे परिवार और अन्य आत्माओं को सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए

हमें कई अन्य लोगों सहित, सब लोगों को सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए। हम जानते हैं कि सभी आत्माएं हमारे अपने परिवार के सदस्यों के समान कीमती हैं। हमें दूसरे लोगों को कीमती समझना चाहिए क्योंकि परमेश्वर के सामने हम सभी एक जैसे हैं।
जब भी मैं उपदेश देता हूँ तब मैं उद्धार के सत्य की बात करता हूँ क्योंकि आत्माओं को नरक में भेजा जा रहा है। हमें उन्हें नरक में जाने से बचाना चाहिए। हमें अपने परिवारों और दोस्तों को सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए, यदि कुछ छूट जाता है तो साहित्य के साथ इसका प्रचार करें, और उन चीजों के लिए प्रार्थना करें जिनकी हमें आवश्यकता है। हमें इसका कई अलग-अलग तरीकों से प्रचार करना चाहिए। जब कोई आत्मा वापस मुड़ती है तो हम दावत तैयार करते हैं। जब भी हमारे पास जागृति की सभा में सुसमाचार का प्रचार करने का मौक़ा होता है तब हम आत्माओं को प्राप्त करते है। कभी-कभी, लोग दुनिया में वापस चले जाते हैं, भले ही हम मुश्किल से उन्हें सुसमाचार का प्रचार कर पाते हैं। तब हम दु:ख से भर जाते हैं। लेकिन अंत में, हम बिना किसी निराशा के सुसमाचार का प्रचार करते हैं। 
मैं चाहता हूं कि आज आप एक बात जान लें। इस तथ्य को याद रखें कि हमारे आस-पास कई विधि-सम्मत मसीही हैं और हमें उन्हें सुसमाचार का प्रचार करना चाहिए। भले ही वे प्रत्येक दिन पाप करते हो फिर भी वे व्यवस्था का पालन करने का दिखावा करते हैं, और वे सोचते हैं कि वे प्रतिदिन पश्चाताप की प्रार्थना करने से अपने दैनिक पापों की माफ़ी प्राप्त कर सकते हैं। 
वे उस सुसमाचार को अस्वीकार करते हैं जो कहता है कि यीशु ने पहले ही हमारे सभी पापों को मिटा दिया है। वे सोचते हैं कि यीशु ने उनके दैनिक पापों को छोड़कर, केवल उनके मूल पापों को दूर किया है, क्योंकि वे पापों की सच्ची माफ़ी को नहीं जानते हैं। जो सत्य के उद्धार को नहीं जानते, वे विधि-सम्मत कहलाते हैं। हमें उन्हें परमेश्वर की धार्मिकता का सुसमाचार सुनाकर उनके पापों से बचाना चाहिए।