उपदेश

विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 3-1] रोमियों अध्याय ३ का परिचय

पौलुस ने कहा कि लोगों का अविश्वास परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को निष्प्रभावी नहीं बनाता। अध्याय २ से, प्रेरित पौलुस ने इस अध्याय में बताया कि अन्यजातियों पर यहूदियों का कोई अधिकार नहीं था। इस अध्याय में, पौलुस ने परमेश्वर की धार्मिकता की व्यवस्था के बारे में बात करने से पहले व्यवस्था और परमेश्वर की धार्मिकता की व्यवस्था की तुलना की, जो पापियों को उसकी धार्मिकता प्राप्त करने और उन्हें सच्चे जीवन की ओर ले जाने की अनुमति देती है। उन्होंने इस अध्याय में इस बात पर भी जोर दिया है कि पाप से उद्धार हमारे कार्यो के द्वारा नहीं है, लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास के द्वारा है। 
प्रेरित पौलुस ने कहा कि यदि यहूदी और अन्य लोग परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करते हैं, तो भी उनका अविश्वास परमेश्वर धार्मिकता को निष्प्रभावी नहीं करता है। परमेश्वर झूठ नहीं बोल सकता, और उसकी धार्मिकता की सच्चाई अद्रश्य नहीं होगी। क्योंकि यहूदी परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करते इसलिए उसका प्रभाव मिट नहीं जाएगा। 
परमेश्वर की धार्मिकता जिसके बारे में पौलुस ने प्रचार किया, उसे केवल इसलिए मिटाया नहीं जा सकता क्योंकि लोग अविश्वास करते हैं। जो कोई उस उद्धार में विश्वास करता है जो परमेश्वर ने पापियों को दिया है वह परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करता है, और यह धार्मिकता मानवीय नैतिकता या विचार से परे है। 
पौलुस ने उन लोगों को दोषी ठहराया जो परमेश्वर को झूठा ठहराने के लिए परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करते थे। परमेश्वर ने कहा कि उसने अपनी धार्मिकता के द्वारा लोगों को उनके पापों से पूरी तरह से बचाया, लेकिन उन्होंने इस पर विश्वास नहीं किया। इसलिए, उसे झूठा ठहराया गया था। हालाँकि, परमेश्वर की धार्मिकता उनके अविश्वास से प्रभावित नहीं होती है। 
 

परमेश्वर की धार्मिकता कैसे प्रगट हुई?

जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करते हैं, उनके पापों के लिए उनका न्याय किया जाएगा। हम सभी परमेश्वर की धार्मिकता की पुष्टि उसके द्वारा दिए गए उद्धार से कर सकते हैं। जो लोग उसकी धार्मिकता में विश्वास करते हैं वे पापों की माफ़ी प्राप्त करते हैं और अनन्त जीवन प्राप्त करते हैं। इसलिए, परमेश्वर की धार्मिकता की सच्चाई में विश्वास करके सभी लोग आशीष प्राप्त कर सकते है।
परमेश्वर की धार्मिकता झूठी नहीं है, लेकिन सत्य है। परमेश्वर के सामने हर कोई झूठा है। लेकिन परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार कार्य करता है और वह वायदों को पूरा करता है। इसलिए, मानवीय झूठ पर परमेश्वर की विश्वासयोग्यता की जीत होती है। मनुष्य को परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करना होगा। परमेश्वर अपनी कही हुई बातों को नहीं बदलता, जबकि मनुष्य अक्सर अपने परिस्थितिजन्य निर्णयों के अनुसार अपने दृष्टिकोण को बदलते हैं। परमेश्वर ने जो कुछ भी मनुष्यजाति को बताया है, उस पर वह हमेशा खरा उतरता है। 
रोमियों ३:५ में लिखा है, “इसलिए यदि हमारा अधर्म परमेश्वर की धार्मिकता ठहरा है, तो हम क्या कहे?” मनुष्य की अधार्मिकता परमेश्वर की धार्मिकता को प्रगट करती है। 
परमेश्वर की धार्मिकता हमारी कमजोरियों के द्वारा और अधिक प्रगट होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लिखा गया है, यीशु ने पापियों को उनके सभी पापों से बचाने के लिए खुद धर्मी कार्य किया। इसलिए, लोगों की दुर्बलताओं के कारण परमेश्वर की धार्मिकता और भी अधिक चमकती है। यह सत्य पानी और आत्मा के सुसमाचार में पाया जा सकता है, जो परमेश्वर की धार्मिकता से भरा हुआ है। इसका कारण यह है कि सभी लोग मृत्यु के दिन तक पाप करते हैं, और परमेश्वर का प्रेम उन पापों से बड़ा है। परमेश्वर का प्रेम सभी कमज़ोर पापियों को उनके पापों से बचाता है।
हमारे परमेश्वर ने जगत के सभी पापों पर विजय प्राप्त की और पापों की माफ़ी के द्वारा अपना उद्धार पूरा किया। कोई भी व्यक्ति पाप रहित जीवन नहीं जी सकता। चूँकि लोग नरक में जाने के लिए नियत थे, इसलिए परमेश्वर अपने प्रेम से उनकी संभाल रखता है, और यही उसकी धार्मिकता है।
हम लोग जन्म के दिन से ही झूठे थे और परमेश्वर के वचनों पर विश्वास न करके उसकी धार्मिकता को ठुकरा दिया। मनुष्यजाति को परमेश्वर के सामने नष्ट किया जाना था क्योंकि उनका कोई भी कार्य परमेश्वर दृष्टि में स्वीकार्य नहीं था। परन्तु परमेश्वर ने अपने प्रेम से हमें हमारे पापों से बचाया क्योंकि उसने हम पर दया की। सभी लोग नरक में जाने वाले थे क्योंकि वे शैतान के धोखे से भ्रष्ट हो गए थे और उन सभी ने पाप किया था। हालाँकि, परमेश्वर ने लोगों को शैतान के हाथों से और अंधेरे की सामर्थ से बचाने के लिए अपने एकलौते पुत्र को भेजा। 
प्रेरित पौलुस ने कहा कि एक इंसान हर दिन शालीनता से व्यवहार करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन वह अपने पूरे जीवन में पाप करने से रूक नहीं सकता है। हालांकि, उस व्यक्ति की बुराई आगे जाकर परमेश्वर की धार्मिकता और प्रेम को प्रकट करेगी। वास्तव में, मनुष्यों के पास कोई धार्मिकता नहीं है और इसलिए उन्हें प्रेरित पौलुस जैसे दूत की आवश्यकता है। वह परमेश्वर की धार्मिकता को जानता था और प्राप्त किया था, और इस प्रकार उसमें पवित्र आत्मा का वास था। इसलिए वह परमेश्वर की धार्मिकता का प्रचार कर सकता था।
 

पौलुस ने जिस सुसमाचार का प्रचार किया वह परमेश्वर की धार्मिकता पर आधारित था

पौलुस ने जिस सुसमाचार का प्रचार किया वह परमेश्वर की धार्मिकता पर आधारित था। पौलुस को सुसमाचार का प्रचार करना पड़ा क्योंकि परमेश्वर ने पापियों से प्रेम किया और उन्हें उनके पापों से बचाया। परमेश्वर का छुटकारे का प्रेम पानी और आत्मा के सुसमाचार में है। इसलिए, पापों की माफ़ी परमेश्वर की धार्मिकता पर हमारे विश्वास पर निर्भर करती है। हालाँकि, समस्या यह है कि आम तौर पर लोग सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर के सामने उद्धार प्राप्त करने के लिए सदाचारी जीवन जीना होगा। मनुष्य अपनी मूल प्रवृत्ति के आधार पर अच्छा नहीं हो सकता; बाह्य रूप से अच्छा होना ही परमेश्वर की धार्मिकता को स्वीकार करने में एक बाधा बन जाता है। लोगों को परमेश्वर के दिए हुए आत्मिक खतने के सुसमाचार को स्वीकार करने के लिए सदाचारी जीवन जीने के अपने निश्चित विचारों को तोड़ना होगा। 
पृथ्वी पर कोई भी व्यक्ति वास्तव में अच्छा नहीं हो सकता। फिर, पापी अपने सभी पापो से कैसे बच सकते है? उन्हें इस विचार को त्याग देना चाहिए कि उद्धार पाने के लिए उन्हें अच्छा जीवन जीना चाहिए। बहुत से लोग अपने विचारों और मानकों को छोड़ने से इनकार करते हैं; इसलिए, वे अपने पाप्पों से सम्पूर्ण तरीके से उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते। परमेश्वर की धार्मिकता, जो आत्मिक खतने के सुसमाचार में प्रकट होती है, उसने हमें इस बात से अवगत कराया कि कैसे हमारी अधार्मिकता ने केवल परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए काम किया और उसकी धार्मिकता कितनी महान थी। इस कारण से, जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं, वे अपनी धार्मिकता पर नहीं बल्कि परमेश्वर धार्मिकता पर गर्व करते हैं। धर्मी केवल परमेश्वर की धार्मिकता पर घमण्ड करते हैं और उसकी धार्मिकता को ऊँचा उठाते हैं क्योंकि यह परमेश्वर की ओर से आता है।
प्रेरित पौलुस व्यवस्था की भूमिका उन विधि-सम्मत लोगों को सिखाता है जो विश्वास करते हैं कि यदि वे अच्छे कर्म करते हैं तो वे स्वर्ग जाएंगे, लेकिन यदि वे यीशु में विश्वास करने के बाद अच्छा जीवन नहीं जीते हैं, तो वे कभी भी परमेश्वर की धार्मिकता तक नहीं पहुंच सकते। व्यवस्था एक दर्पण की तरह है जो मनुष्य के पापों को प्रकट करती है। पौलुस सिखाता है कि लोगों के पास राजकीय विश्वास है और उनके विश्वास गलत हैं। यह पौलुस की शिक्षा और परमेश्वर की धार्मिकता के लिए उसका मार्गदर्शन है।
पौलुस उन लोगों से बात करता है जो झूठे शिक्षकों का अनुसरण करते हैं जो यह नहीं सोचते कि यीशु में विश्वास करने के बाद वे धर्मी और पापरहित हो सकते हैं। वह अविश्वासियों को परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करना और निंदा से स्वतंत्र होना सिखाता है। पौलुस का कहना है कि जो लोग यीशु के पानी और लहू के उद्धार में विश्वास नहीं करते हैं, वे न्याय के अधीन हैं और चूंकि वे परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं इसलिए उनका न्याय किया जाना उचित है। वह कहता है कि पापियों को परमेश्वर की धार्मिकता की ओर लौटना चाहिए और भयानक न्याय से छुटकारा पाने के लिए उसकी धार्मिकता प्राप्त करनी चाहिए। 
 

तो फिर क्या हम ज्यादा पाप करेंगे क्योंकि हम परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करते है?

वचन ७ कहता है, “यदि मेरे झूठ के कारण परमेश्वर की सच्चाई उसकी महिमा के लिए, अधिक करके प्रगट हुई तो फिर क्यों पापी के समान मैं दण्ड के योग्य ठहराया जाता हूँ?” फिर यदि हम पापरहित कहलाएँ, तो क्या हम स्वतन्त्र रूप से पाप कर सकते हैं? पौलुस इस बिंदु को प्रदर्शित करता है। चूँकि परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता से आपको बचाया है, तो क्या आपको अधिक स्वतंत्र रूप से झूठ बोलने की अनुमति है? यदि आप ऐसा मानते हैं, तो आपको पता होना चाहिए कि आप परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं जानते हैं और यह कि आप उसकी धार्मिकता की निंदा कर रहे हैं।
आज भी, बहुत से लोग हैं जो अपने हृदय में परमेश्वर की धार्मिकता की निंदा करते हैं; यह पुराने समय से बहुत अलग नहीं है। पौलुस ने इस पवित्रशास्त्र को लगभग २००० वर्ष पहले लिखा था और उस समय भी, ऐसे लोग थे जो अपने सोचने के तरीकों में लिपटे हुए थे। 
आज भी, अधिकांश मसीही, जिन्होंने अभी तक नया जन्म नहीं पाया है, वे गलत समझते हैं कि यदि कोई पाप रहित हो जाता है, तो वह जानबूझकर पाप कर सकता है। जिन्होंने नया जन्म नहीं पाया हैं वे अपनी देह के विचारों से धर्मी लोगों की निंदा करते हैं, जिन्होंने पानी और आत्मा से नया जन्म पाया हैं और नया जन्म पाए हुए संतो के बारे में बुरा बोलते है। नाममात्र के मसीहीयों ने अपने अविश्वासी विचारों से सही मायने में नया जन्म पाए हुए मसीहीयों की निंदा की है। सच्चे विश्वास को मनुष्य देह के द्वारा नहीं समझा जा सकता है। पाप एक ऐसी चीज है जो आप जीवन भर करते हैं। धर्मी और अधर्मी दोनों अनिवार्य रूप से पाप करते हैं। हालाँकि, जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता को अस्वीकार करते हैं, वे पाप के साथ हैं, जबकि जो उस पर विश्वास करते हैं वे पाप रहित हैं। 
पौलुस ने अविश्‍वासियों से कहा, “यदि कुछ विश्वासघाती निकले भी तो क्या हुआ? क्या उनके विश्वासघाती होने से परमेश्वर की सच्चाई व्यर्थ ठहरेगी? कदापि नहीं!” (रोमियों ३:३-४) सिर्फ इसलिए कि मनुष्यजाति परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करती, उनका अविश्वास परमेश्वर धार्मिकता को मिटा नहीं सकता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करता है, तो वह उद्धार पाता है। हालाँकि, यदि व्यक्ति ऐसा नहीं करता है, तो वह उसकी धार्मिकता को प्राप्त नहीं कर सकता है। इतना ही। परमेश्वर की धार्मिकता सदा अटल रहेगी। जो लोग नरक में जाते हैं वे यीशु के बपतिस्मा और लहू में विश्वास नहीं करते हैं और वे कभी भी अपने पापों को शुद्ध नहीं कर पाएंगे। परमेश्वर की धार्मिकता, जो विश्वासियों को नया जन्म पाने के लिए प्रेरित करती है, वह कभी भी इसलिए निष्प्रभाव नहीं होगी क्योंकि लोग उस पर विश्वास नहीं करते है। 
 

परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करना मनुष्य के प्रयासों से नहीं होता

हमारे प्रभु की धार्मिकता को प्राप्त करने का हमारे मानवीय प्रयासों से कोई लेना-देना नहीं है। यह केवल सत्य में हमारे विश्वासों से संबंधित है कि परमेश्वर की धार्मिकता हमारे पापों की माफ़ी है। एक व्यक्ति जो पानी और आत्मा की सच्चाई में विश्वास करता है, वह विश्वास के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करता है, परन्तु जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करता है, वह परमेश्वर के वचनों की सच्चाई के अनुसार न्याय प्राप्त करता है।
इसलिए, परमेश्वर ने यीशु को इस जगत में भेजा और उसे उनके लिए ठोकर का पत्थर और अपराध की चट्टान बना दिया जो परमेश्वर की धार्मिकता के प्रति अवज्ञाकारी हैं। ऐसे बहुत से लोग हैं जो स्वेच्छा से नरक मांगते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करना चाहते हैं, भले ही फिर यीशु ने यानी की एक ठोकर और अपराध की चट्टान ने उनका उद्धारकर्ता बनकर उन्हें परमेश्वर की धार्मिकता दी। यहां तक कि सबसे बुरे व्यक्ति को भी धर्मी बनने और अनन्त जीवन प्राप्त करने का मार्ग दिया गया। यहां तक कि एक व्यक्ति जो कई अच्छे काम करता है, वह यदि परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करता जो उसे पापों की माफ़ी देती है और नया जन्म देती है तो उसे विनाश से बचाया नहीं जा सकता है।
क्योंकि पाप की मजदूरी मृत्यु है, इसलिए पाप करनेवाला कोई भी व्यक्ति न्याय से गुजरेगा। यीशु उन लोगों के लिए ठोकर का पत्थर और अपराध की चट्टान बन जाता हैं जो अपनी धार्मिकता को स्थापित करते है और परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास किए बिना स्वर्ग में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं। इसलिए, लोगों के नष्ट होने का कारण यह है कि वे किसी तरह यीशु पर विश्वास करते हैं पर उसकी धार्मिकता पर विश्वास नहीं करते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि वे पापी हैं जिन्होंने अपने पापों से उद्धार पाया है, लेकिन 'उद्धार पाया हुआ पापी' जैसी कोई चीज नहीं है। पाप से बचाए जाने के बाद व्यक्ति फिर से पापी कैसे हो सकता है? यदि किसी व्यक्ति को पाप से बचाया गया है तो वह व्यक्ति पापरहित है, और यदि किसी व्यक्ति ने अभी तक पाप से उद्धार प्राप्त नहीं किया है तो वह पाप के साथ है। स्वर्ग के राज्य में पाप वाला एक भी व्यक्ति नहीं होगा। परमेश्वर कहते है, “इस कारण दुष्ट लोग अदालत में स्थिर न रह सकेंगे, और न पापी धर्मियों की मण्डली में ठहरेंगे” (भजन संहिता १:५)।
लोग स्वयं के सामने बड़ा प्रश्न रखते हैं कि वे प्रतिदिन पाप करते हुए धर्मी कैसे बन सकते हैं। हालांकि इससे उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है। परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके धर्मी बनना केवल इसलिए संभव है क्योंकि प्रभु ने पहले ही जगत के सभी पापों को, उनके भविष्य के पापों के साथ, यरदन नदी में बपतिस्मा प्राप्त करके और क्रूस पर मरकर अपने ऊपर ले लिया, जिससे परमेश्वर की सब धार्मिकता को पूरा किया जा सके। पापी केवल परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने से धर्मी बन सकते हैं। क्या आपका सारा कर्ज चुकाने के बाद आप अभी भी कर्कदार है?
हमारे प्रभु ने अपनी धार्मिकता से हमारे सभी पापों को मिटा दिया। प्रभु ने उन लोगों को बचाया जो पानी और आत्मा के सुसमाचार में पूर्ण विश्वास रखते हैं, इसलिए उनके लिए कोई निंदा नहीं है, चाहे वे कितने भी कमजोर क्यों न हों। हम सब परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके धर्मी बन सकते हैं।
 

मानवीय विचार हमें मृत्यु की ओर ले जाते है

मानव विचार हमें मृत्यु की ओर ले जाते हैं और वे दैहिक मन से उत्पन्न होते हैं। आत्मिक विचार परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास से उत्पन्न होते हैं। मानव विचारों पर शैतान का हावी होना संभव है। मनुष्य के पास अपनी देह से पाप करने के सिवा और कोई चारा नहीं है। हालाँकि, एक व्यक्ति जिसे परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास है, वह यीशु के बपतिस्मा और लहू में विश्वास के द्वारा धर्मी बन जाता है। पाप न करने से कोई भी व्यक्ति धर्मी नहीं बन सकता। पवित्र बनने के लिए शारीरिक परिवर्तन से गुजरने से कोई व्यक्ति पूरी तरह से पापरहित नहीं हो सकता। एक मसीही के लिए यह सोचना मूर्खता है कि वह एक पवित्र व्यक्ति बनकर स्वर्ग में प्रवेश कर सकता है जो कभी भी परमेश्वर के सामने पाप नहीं करता है।
परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करके हम एक ही बार में अपने पापों से बच सकते हैं। इसके अलावा, यदि लोग पानी और आत्मा के सुसमाचार की कृपा पर विश्वास करते है जो उन्हें नया जन्म प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है तो प्रत्येक पापी को उसके पाप से पूरी तरह से बचाया जा सकता है। मनुष्य की दृष्टि से पापरहित होना असंभव प्रतीत हो सकता है। हालाँकि, यह परमेश्वर के वचन में विश्वास के द्वारा संभव है। मानव शरीर के द्वारा पाप किए बिना कोई भी व्यक्ति जीवित नहीं रह सकता, लेकिन यदि कोई वास्तव में परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करता है तो उसका हृदय पापरहित हो जाता है। मानव देह को अपनी इच्छाओं को पूरा करने की आवश्यकता होती है और देह के लिए पाप न करना असंभव है क्योंकि वे लगातार वासना की लालसा रखते हैं। परमेश्वर सच बोलते है; पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास करने से ही व्यक्ति धर्मी बन सकता है जो हमारे प्रभु ने हमें दिया है। हम अपनी देह से अच्छे कर्म करके स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकते। हम केवल परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करके ही स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हैं।
 

आत्मिक मन और दैहिक मन में अन्तर है

दैहिक मन इस सच्चाई को नहीं समझ सकते हैं कि वे केवल विश्वास से ही पापरहित हो सकते हैं और वे धर्मी, नया जन्म पाए मसीही बनने में सक्षम हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यदि कोई व्यक्ति अपने गलत कामों के लिए पश्चाताप करता है, तो भी वह अगले दिन फिर से पाप करेगा।
हालाँकि, भले ही किसी व्यक्ति के लिए मानवीय कर्मों के माध्यम से धर्मी बनना संभव नहीं है लेकिन यह परमेश्वर की धार्मिकता से पूरी तरह संभव है। ऐसा इसलिए है क्योंकि यीशु के बपतिस्मा और उसके लहू पर विश्वास करके व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर की धार्मिकता सभी लोगों के पापों को नष्ट करने में सक्षम है। यह हमें धर्मी होने और परमेश्वर को अपना पिता कहने की अनुमति देता है। इसलिए, आपको पता होना चाहिए कि सच्चा विश्वास परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास के साथ शुरू होता है। सच्चा विश्वास दैहिक मन से नहीं, लेकिन सत्य के वचन पर विश्वास से शुरू होता है। 
बहुत से लोग जिन्होंने नया जन्म नहीं पाया है, वे अपने विचारों से बच नहीं सकते हैं क्योंकि वे हमेशा उनके अंदर बंद रहते हैं। ये लोग कभी नहीं कह सकते कि वे धर्मी हो गए हैं क्योंकि वे केवल दैहिक मन से सोचते हैं, भले ही वे कहते हैं कि वे यीशु में विश्वास करते हैं। जब कोई व्यक्ति आत्मिक ख़तने के वचनों पर विश्वास करता है जिसमे परमेश्वर की धार्मिकता शामिल है तब वह कह सकता है की वह यीशु के सामने पापरहित है। 
इसलिए, यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे वास्तव में नया जन्म पाए हुए लोगों से सत्य के वचनों को सुनना चाहिए और उस पर अपने हृदय से विश्वास करना चाहिए। पवित्र आत्मा हर उस संत में वास करता है जो परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करता है। आशा है कि आप भाइयों इस सच्चाई को ध्यान में रखेंगे। यदि आप वास्तव में नया जन्म प्राप्त करने के आशीष को पाना चाहते है, तो परमेश्वर आपको एक नया जन्म पाए हुए व्यक्ति से मिलने की अनुमति देगा जो उसकी धार्मिकता में विश्वास करता है।
 

आप कहते है की कोई भी धर्मी नहीं है?

वचन ९ और १० में लिखा है, “तो फिर क्या हुआ? क्या हम उनसे अच्छे है? कभी नहीं; क्योंकि हम यहूदियों और यूनानियों दोनों पर यह दोष लगा चुके है की वे सब पाप के वश में है। कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।” ऐसा लिखा है की कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं। 
इसका क्या मतलब है? क्या ये वचन हमारे नए जन्म से पहले या बाद में हमारे स्तर के बारे में बात करते हैं? नया जन्म पाने से पहले हम सब पापी थे। वचन "कोई धर्मी नहीं" यीशु द्वारा जगत के सभी पापों को नष्ट करने की सेवकाई को पूरा करने से पहले की स्थिति को दर्शाता है। यीशु पर विश्वास किए बिना कोई धर्मी नहीं बन सकता।
इसलिए, 'क्रमिक पवित्रता' शब्द उन लोगों के द्वारा अस्तित्व में आया जो पाखंडी धर्मों या मूर्तियों की आराधना करते थे। "कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।" क्या आपको लगता है कि एक पापी आत्म-प्रशिक्षण और साधना के माध्यम से धर्मी बन सकता है? कोई अपने आप धर्मी नहीं बन सकता।
"कोई धर्मी नहीं, एक भी नहीं।" ऐसा कोई नहीं है जो अपने अच्छे जीवन से धर्मी बना हो या धर्मी बन सकता है। एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो अपने स्वयं के प्रयासों से पापरहित बना हो। यह केवल आत्मिक खतने पर विश्वास के द्वारा ही संभव है जिसमें परमेश्वर की धार्मिकता शामिल है। 
वचन ११ भी यह कहता है, “कोई समझदार नहीं; कोई परमेश्वर का खोजनेवाला नहीं।” अपनी बुराइयों को समझने वाला कोई नहीं है। दूसरे शब्दों में, ऐसा कोई नहीं है जो यह समझे कि वह वो है जिसे नरक में भेजा जाएगा। पापी यह भी नहीं समझ पाता कि वह पापी है। एक पापी जीवित रहते हुए भी स्पष्ट रूप से यह नहीं समझता है कि वह अपने पापों के कारण नरक में जाएगा। इसलिए ऐसे व्यक्ति को यह समझकर पाप से उद्धार पाने का प्रयास करना चाहिए कि वह पाप के कारण नरक में जाने के योग्य है। हालाँकि, ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के सामने अपने पापी स्वभाव या नरक में जाने के लिए अपने भाग्य को समझता हो।
क्या हम परमेश्वर के सामने हितकारी या हानिकर प्राणी हैं? पूरी मनुष्यजाति तब तक बेकार है जब तक कि वे नया जन्म प्राप्त नहीं करलेते। भले ही हम सब परमेश्वर के कारण धर्मी बन गए हैं, क्या हम पहले ऐसे लोग नहीं थे जिन्होंने परमेश्वर के खिलाफ लडे थे, सच्चाई पर विश्वास करने से इनकार कर दिया और यहां तक कि परमेश्वर पर दोष भी लगाया?
फिर, एक पापी परमेश्वर की महिमा कैसे कर सकता है? एक पापी, जिसने अपनी स्वयं की पाप की समस्याओं का समाधान भी नहीं किया है, परमेश्वर की स्तुति कैसे कर सकता है? पापी की अवस्था में परमेश्वर की स्तुति करना सच्ची आराधना नहीं हो सकती। एक पापी परमेश्वर की स्तुति कैसे कर सकता है? एक पापी कभी भी परमेश्वर की महिमा नहीं कर सकता, और परमेश्वर ऐसे व्यक्ति से कुछ भी स्वीकार नहीं करता है। 
आजकल, महिमा की सेवा जगत भर में फैली हुई हैं। हालाँकि, केवल वे जो परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करते हैं, वे ही परमेश्वर की स्तुति कर सकते हैं। क्या आपको लगता है कि पापी की स्तुति से परमेश्वर प्रसन्न होंगे? पापी की स्तुति काइन की भेंट के समान है। परमेश्वर पापियों की व्यर्थ स्तुति और पापी हृदयों को क्यों स्वीकार करेगा?
वचन १२ कहता है, “सब भटक गए है, सब के सब निकम्मे बन गए है; कोई भलाई करनेवाला नहीं, एक भी नहीं।” वे पापी जो “भटक गए” है, वे उन महान कार्यों को नहीं जानते हैं जो परमेश्वर ने उनके लिए किए हैं, और परमेश्वर पर या सत्य के वचन पर विश्वास नहीं करते हैं। इसके अलावा, पापी न केवल परमेश्वर के वचन को मानने या उस पर विश्वास करने से इनकार करते हैं, लेकिन वे हमेशा अपने विचारों के आधार पर शारीरिक पूर्वाग्रहों के बारे में सोचते हैं। इसलिए, वे परमेश्वर के सामने कभी भी सही और गलत के बीच भेदभाव नहीं कर सकते।
सही न्याय केवल सत्य के उन वचनों से ही संभव है जिनमें परमेश्वर की धार्मिकता शामिल है। अच्छे निर्णय और सही न्याय केवल परमेश्वर की धार्मिकता के भीतर ही किए जा सकते हैं। आपको पता होना चाहिए कि सभी वैध निर्णय मनुष्यों के भीतर नहीं, लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता के भीतर होते हैं। मानवीय विचार भटग गए है और परमेश्वर की धार्मिकता को अस्वीकार कर दिया है। लोग कहते हैं, "मैं इस तरह से सोचता हूं और अपने विचारों के अनुसार विश्वास करता हूं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाइबल किस बारे में बात करती है।" लेकिन, मुझे आशा है कि आप यह महसूस करेंगे कि जो अपने इस तरह के विचारों को नहीं त्यागता है, वह वो है जो अपने अहंकारी हठ के साथ परमेश्वर की धार्मिकता को अस्वीकार करता है। इसलिए, इस तरह सोचना व्यक्ति को परमेश्वर की धार्मिकता की ओर लौटने की अनुमति नहीं देता है।
 

दैहिक मन व्यक्ति की आत्मा को मृत्यु की ओर ले जाते है

जिसने नया जन्म प्राप्त नहीं किया वह खुद अपना न्यायी है। इस प्रकार के लोग वास्तव में इस बात की परवाह नहीं करते कि परमेश्वर के वचनों में क्या लिखा है, लेकिन इसके बजाय, अगर कुछ उनके अपने विचारों से अलग है, तो वे कहते हैं कि यह गलत है और केवल वचन के एक हिस्से से सहमत होते हैं जो उनके अपने विचारों से मेल खाते हैं। बाइबल कहती है कि मनुष्य अपने स्वयं के विचारों और आत्म-केंद्रितता से अलग हो गए। यदि कोई अपने पापों से सबसे उचित तरीके से छुटकारा पाने की आशा करता है, तो उसे परमेश्वर की धार्मिकता और न्याय की आवश्यकता है। फिर उसका न्याय क्या है?
परमेश्वर का न्याय परमेश्वर की धार्मिकता है और आपको पता होना चाहिए कि परमेश्वर का वचन परमेश्वर के धर्मी न्याय का मापदंड है। "आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था, और वचन परमेश्वर था" (यूहन्ना १:१)। यह व्यक्ति कौन है जिसे "वचन" कहा जाता है? वह व्यक्ति कौन है जो पिता परमेश्वर और पवित्र आत्मा के साथ था? वह हमारा उद्धारकर्ता, यीशु मसीह है। यीशु मसीह हमारा उद्धारकर्ता और राजाओं का राजा बना। यीशु परमेश्वर है।
यूहन्ना में कहा गया है कि आदि में वचन था, और वचन परमेश्वर के साथ था। हाँ, प्रभु यीशु हमारे उद्धारकर्ता हैं। वचन परमेश्वर है और वह उसकी महिमा का प्रकाश और उसके तत्व की छाप है (इब्रानियों १:३)। उद्धारकर्ता परमेश्वर है। क्योंकि वचन स्वयं परमेश्वर है इसलिए उसके धार्मिकता के वचन हम मनुष्यों के विचारों से भिन्न हैं। आपको यह महसूस करना होगा कि जब पापी परमेश्वर की धार्मिकता से अनभिज्ञ होते हैं, तो वे अपनी स्वयं की धारणा के माध्यम से परमेश्वर की धार्मिकता को समझने का साहस करते हैं। जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास के साथ दृढ़ रहता है वह एक हितकारी व्यक्ति है जिसे परमेश्वर द्वारा अच्छे उपयोग में लाया जाएगा। जो स्थिर खड़ा रहता है और परमेश्वर के वचन को धारण करता है वह विश्वास का व्यक्ति है और परमेश्वर के सामने हितकारी है। इस प्रकार का व्यक्ति धन्य भी होता है।
सभी लोग अपने-अपने विचारों और पापों से परमेश्वर के विरुद्ध लड़ते हैं। आपको पता होना चाहिए कि किसी का पवित्र और अच्छा होने का ढोंग करना, या दयालु होने का नाटक करना और दूसरों पर दया करना, सभी पाखंडी कार्य हैं जो मानव विचारों से आते हैं जो परमेश्वर को धोखा देते हैं। अच्छा होने का नाटक करना परमेश्वर के विरुद्ध है। परमेश्वर के अलावा कोई अच्छा नहीं है। यदि कोई मसीही नया जन्म प्राप्त किए बिना परमेश्वर के प्रेम और उसके उद्धार की धार्मिकता का स्वीकार नहीं करता है, तो यह परमेश्वर के विरुद्ध है और सत्य की अवहेलना है।
क्या आपको लगता है कि इस दुनिया में केवल महान पाप करने वालों को ही परमेश्वर के दण्ड की आज्ञा मिलेगी? वे सभी जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के उग्र क्रोध से बच नहीं पाएंगे।
जो व्यक्ति यीशु में सच्चाई में विश्वास नहीं करता है, वह एक अच्छा जीवन जीने की अनिवार्य अवधारणा से भरा हुआ है। ऐसे विचारों को किसने सिखाया? यह शैतान था जिसने ऐसा किया था। हालाँकि, मनुष्य अपने जन्म से ही अच्छा जीवन जीने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर का वचन हमें बताता है कि हमें पापों की माफ़ी प्राप्त करनी चाहिए। क्या इसका मतलब यह है कि हमें जानबूझकर बुरे काम करने चाहिए ताकि अनुग्रह बढ़ता जाए? हरगिज नहीं। चूँकि मनुष्य जन्म के दिन से ही पाप से ग्रसित थे, इसलिए दूषित पाप के घावों के कारण उन्हें नरक में जाना तय है। इसलिए, परमेश्वर ने उन्हें उन पापों की माफ़ी प्राप्त करने के लिए कहा जो यीशु ने उनके लिए पहले ही तैयार कर दी थी। वह उद्धार का परमेश्वर है और हम सभी को सलाह देते हैं कि हम उनकी धार्मिकता के वचन, जो कि सत्य है, उसे अपने हृदय में स्वीकार करके उद्धार प्राप्त करें।
 

मनुष्य स्वभाव से क्या है?

वचन १३-१८ कहता है, “उनका गला खुली हुई कब्र है, उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है, उनके होठों में साँपों का विष है। उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है। उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं, उनके मार्गों में नाश और क्लेश है, उन्होंने कुशल का मार्ग नहीं जाना। उनकी आँखों के सामने परमेश्‍वर का भय नहीं।”
"उन्होंने अपनी जीभ से छल किया है।" वे सभी लोग कितना अच्छी तरीके से धोख़ा देते हैं! यूहन्ना में लिखा है, "जब वह झूठ बोलता है, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है" (यूहन्ना ८:४४)। "मैं सच कह रहा हूँ, यह सच है। क्या आप मुझे समझते हैं?" सारे वचन जो एक व्यक्ति बोलता है जिसने नया जन्म नहीं पाया है, जो दृढ़ता से सत्य होने का दावा करता है, वे झूठे हैं।
एक व्यक्ति जिसने अभी तक नया जन्म नहीं पाया है वह जब भी लोगों से बात करता है तो झूठ बोलता है। वह इस बात पर जोर देता है कि उसने जो कुछ भी कहा है वह सब सच है, लेकिन यह विरोधाभासी सबूत है जो साबित करता है कि हर बार जब वह झूठ बोलता है, तो वह यह कहकर लोगों को धोखा देता है कि यह सच है। वे सभी बातें जो नया जन्म न पाने वाले एक व्यक्ति ने कही है, झूठी हैं क्योंकि वह परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करता है। 
जब लोग जन जाते है की व्यक्ति जो कुछ भी करता है वह कपट है उसके बाद वह ठग कभी भी लोगों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नहीं कर सकता। वह ऐसे बात करता है जैसे वह असली हो। वह लोगों से वास्तविक और ईमानदारी से बात करता है ताकि वे उस पर विश्वास कर सकें। "मैं आपको बिल्कुल सच बताता हूं। यदि आप इसमें कुछ पैसे निवेश करते हैं, तो आप बदले में बहुत सारे पैसे कमाएँगे। बस दस लाख डॉलर का निवेश करें, और एक साल के भीतर, आपने जितना निवेश किया है, उससे लगभग दोगुना यानी की बीस लाख डॉलर अधिक प्राप्त होंगे। अगले कुछ सालों में आप इतना पैसा कमाएंगे। यह नवीनतम प्रकार का व्यवसाय है, और यह बिल्कुल सुरक्षित है। आपको जल्दी करना चाहिए और अपना मन बनाना चाहिए क्योंकि बहुत से अन्य लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं।" एक ठग लोगों को ऐसा बताता है। आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि जिस व्यक्ति को पापों की माफ़ी नहीं मिली है, वह अपनी जीभ से छल करता है।
बाइबल कहती है कि जब शैतान झूठ बोलता है, तो वह अपने स्वभाव ही से बोलता है। एक व्यक्ति जिसने पाप से नया जन्म नहीं लिया है वह सब झूठ बोलता है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि एक सेवक जिसने नया जन्म नहीं पाया है, कलीसिया के सदस्यों को यह कहकर धोखा देता है कि अगर वे कलीसिया को बड़ी मात्रा में दशमांश देते हैं तो वे अमीर बन जाएंगे। इसके अलावा, वह कह सकता है कि एक बार जब कोई व्यक्ति कलीसिया का एक प्राचीन बन जाता है, तो वह व्यक्ति 'परमेश्वर के अप्रतिरोध्य आशीष' से समृद्ध हो जाएगा। लोग एक प्राचीन बनने के लिए इतनी मेहनत क्यों करते हैं? यह झूठे सेवको के झूठ के कारण है जो दावा करते हैं कि एक बार जब वह प्राचीन बन जाता है तो परमेश्वर भौतिक धन से भर देगा। बहुत सारे मसीही हैं जो एक प्राचीन बनने की कोशिश के बाद अपनी संपत्ति से वंचित हो गए हैं। उन्होंने अपने ठग सेवको के लिए अत्यधिक भक्ति का भुगतान किया है क्योंकि वे प्राचीन बनना चाहते थे।
आइए फिर से रोमियों ३:१० पर ध्यान दें। वाक्य, "जैसा लिखा है," हमें दर्शाता है कि निम्नलिखित वचन पुराने नियम के उद्धरण हैं। अतिरिक्त स्पष्टीकरण देने के बजाय, पौलुस ने मूल पवित्रशास्त्र के सटीक वाक्यांश को उद्धृत किया: "क्योंकि उनके मुँह में कोई सच्चाई नहीं; उनके मन में निरी दुष्टता है। उनका गला खुली हुई कब्र है, वे अपनी जीभ से चिकनी चुपड़ी बातें करते है" (भजन संहिता ५:९)। "वे बुराई करने को दौड़ते है, और निर्दोष की हत्या करने को तत्पर रहते है; उनकी उक्तियाँ व्यर्थ है, उजाड़ और विनाश ही उनके मार्गो में है" (यशायाह ५९:७)। जो लोग इसलिए नरक में जाते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं जानते हैं, वे कितने दयनीय हैं। 
वचन १९ कहता है, “हम जानते है की व्यवस्था जो कुछ कहती है उन्हीं से कहती है, जो व्यवस्था के अधीन है; इसलिए की हर एक मुँह बंद किया जाए और सारा संसार परमेश्वर के दण्ड के योग्य ठहरे।” 
"व्यवस्था तो क्रोध उपजाती है" (रोमियों 4:15)। परमेश्वर उन लोगों को व्यवस्था देता है जिन्होंने अभी तक नया जन्म नहीं पाया है ताकि वे स्वयं को पापी समझ सकें। व्यवस्था प्रत्येक पापी को सिखाती है कि वे परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार जीवन जीने में असमर्थ है। यह स्पष्ट रूप से कहा गया था कि परमेश्वर ने हमें व्यवस्था के अनुसार जीवन जीने के लिए व्यवस्था नहीं दी है। तब क्या परमेश्वर व्यवस्था को अमान्य कर देता है? नहीं, वह ऐसा नहीं करता। परमेश्वर ने कहा कि उसने हमें यह सिखाने के लिए मूसा के द्वारा व्यवस्था दी कि हम पापी हैं। वह चाहता है कि हम व्यवस्था के माध्यम से अपने पापी स्वभाव का एहसास करें और हमें इसका पालन करने के नहीं दिया गया था। व्यवस्था की भूमिका यह दर्शाती है कि हम मनुष्य के रूप में कितने अपर्याप्त और दुर्बल हैं।
इसलिए, वचन २० कहता है, “क्योंकि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा, इसलिए की व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।” व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा। न केवल पौलुस के खुद के लिए, लेकिन परमेश्वर के अन्य दुसरे सेवकों के लिए भी, “व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी नहीं ठहरेगा।” ऐसा कोई नहीं है जो व्यवस्था का पालन कर सके, कोई भी इसका पालन नहीं कर पाएगा, और किसी ने इसका पालन नहीं किया है। इसलिए, निष्कर्ष यह है की व्यवस्था के कामों के द्वार कोई भी व्यक्ति धर्मी नहीं बन सकता।
क्या हम व्यवस्था का पालन करके धर्मी लोग बन सकते हैं? जब हम इन भाग को देखते हैं, तो हम आसानी से सोच सकते हैं कि हम यीशु में विश्वास करने के बाद अपने कर्मों के माध्यम से अच्छे जीवन जीने के द्वारा पवित्रता तक पहुँचने के लिए कदम-दर-कदम पवित्र हो सकते हैं। हालाँकि, यह बिल्कुल भी सच नहीं है। यह कहना कि कोई व्यक्ति क्रमिक रूप से पवित्र होकर स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है, बिल्कुल झूठ है। 
वे सभी जिन्होंने नया जन्म नहीं पाया है वे अब भी परमेश्वर की व्यवस्था, पाप और मृत्यु की व्यवस्था के अधीन हैं (रोमियों ८:२)। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक बार जब कोई व्यक्ति मसीही बन जाता है, तो वह सोचता है कि उसे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना चाहिए। मसीही अपने कार्यों के साथ व्यवस्था का पालन करने के लिए बाध्य महसूस करते हैं, लेकिन वास्तव में, वे व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते। इसलिए वे प्रतिदिन पश्चाताप की प्रार्थना करने आते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे एक आशाहीन धर्म के दलदल में फँस रहे हैं; अर्थात् मसीही धर्म। इससे साबित होता है कि इस तरह का धार्मिक जीवन जीना शुरू से ही गलत है। व्यवस्था की गलतफहमी के बाद परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने की कोशिश मसीही-धर्मवादियों को परमेश्वर की धार्मिकता के टकराव की ओर ले जाती है, भले ही व्यवस्था केवल लोगों को यह सिखाने के लिए है कि वे पापी हैं।
मसीही धर्म में क्रमिक पवित्रता का सिद्धांत दुनिया के अन्यजातियों के धर्मों के समान ही धार्मिक सिद्धांत है। बौद्ध धर्म में निर्वाण में प्रवेश करने के सिद्धांत के समान, मसीही धर्म में, क्रमिक पवित्रता का सिद्धांत कहता है कि किसी का शरीर और आत्मा यीशु में विश्वास करने के बाद पवित्र और अति पवित्र हो जाता है, और अंत में स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए पर्याप्त पवित्र हो जाता है।
जो व्यक्ति पाप के संक्रमण के साथ पैदा हुआ है, वह अपने पूरे जीवनकाल में पाप फैलाने का काम ही कर सकता है। इसका कारण यह है कि कोई व्यक्ति पहले से ही पाप से संक्रमित हो चुका है। पाप का विषाणु उसके शरीर से बाहर आता है, भले ही वह व्यक्ति पाप फैलाना न चाहता हो। इस बीमारी का एक ही इलाज है। यह सत्य के सुसमाचार के वचन को सुनना और उस पर विश्वास करना है जिसमें परमेश्वर की धार्मिकता शामिल है। यदि कोई व्यक्ति पाप की माफ़ी के सच्चे वचन को सुनता है और विश्वास करता है जो हमें आत्मिक ख़तना प्राप्त करने के लिए सक्षम बनाता है तो वह सारे पापों से उद्धार पा सकता है और अनन्त जीवन भी प्राप्त कर सकता है।
इस दुनिया में कोई ऐसा व्यक्ति कैसे हो सकता है जो नया जन्म पाने के बाद भी सम्पूर्ण तरीके से व्यवस्था के अनुसार जीवन जीता है? ऐसा कोई नहीं है। बाइबल कहती है, “व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है” (रोमियों ३:२०)। क्या यह सत्य स्पष्ट और सरल नहीं है? आदम और हव्वा ने पवित्रता के युग में शैतान द्वारा धोखा दिए जाने के द्वारा विश्वास न करने और पाप में गिरने के द्वारा परमेश्वर के वचन को छोड़ दिया, और वे घटना के बाद उन्होंने सभी पापों को अपने वंशजो को सौंप दिए। हालाँकि, भले ही सभी मनुष्यों को अपने पूर्वजों से पाप विरासत में मिला हो फिर भी वे यह नहीं जानते थे कि वे वास्तव में पापी के रूप में पैदा हुए थे।
इब्राहीम के समय से, परमेश्वर ने मनुष्यजाति को उसकी धार्मिकता पर ठोस ज्ञान दिया ताकि सभी लोगों को परमेश्वर के वचन में विश्वास करके पापों की माफ़ी प्राप्त हो सके।
 

पौलुस व्यवस्था से अलग परमेश्वर की धार्मिकता की बात करता है

वचन २१-२२ कहता है, “परन्तु अब व्यवस्था से अलग परमेश्वर की वह धार्मिकता प्रगट हुई है, जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यवक्ता देते है, अर्थात् परमेश्वर की वह धार्मिकता जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से सब विश्वास करनेवालों के लिए है। क्योंकि कुछ भेद नहीं।” 
ऐसा कहा जाता है कि परमेश्वर की धार्मिकता प्रकट हुई है, "जिसकी गवाही व्यवस्था और भविष्यवक्ता देते है।" "व्यवस्था और भविष्यद्वक्ता" का तात्पर्य पुराने नियम से है। अब, पौलुस ने परमेश्वर की धार्मिकता के सुसमाचार के बारे में बात की जो कि तम्बू की बलिदान प्रणाली के द्वारा प्रकट किया गया था। पवित्रशास्त्र स्पष्ट रूप से हमें परमेश्वर की धार्मिकता दिखाता है जिसके द्वारा व्यक्ति पापबलि के द्वारा पाप की माफ़ी प्राप्त कर सकता है, और पौलुस का विश्वास भी परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास पर आधारित था, जो पवित्र शास्त्र में प्रकट हुआ है।
पौलुस घोषणा करता है कि जो कोई भी यीशु मसीह में विश्वास रखता है वह बिना किसी भेदभाव के परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त कर सकता है। व्यक्ति का उद्धार पाना या न पाना सम्पूर्ण रीति से उसके विश्वास या अविश्वास पर निर्भर करता है। इसलिए, वह कहता है कि परमेश्वर की धार्मिकता जो “यीशु मसीह पर विश्वास करने से सब विश्वास करनेवालों के लिए है। क्योंकि कुछ भेद नहीं।”
सच्चा विश्वास क्या है? विश्वास का मूल कौन है? यह यीशु मसीह है। इब्रानियों १२:२ में लिखा है, "और विश्वास के कर्ता और सिध्ध करनेवाले यीशु की ओर ताकते रहे।" हमें एक नया जन्म पाए हुए संत से परमेश्वर के सत्य के बारे में सीखना चाहिए और इस सत्य में विश्वास करके यीशु मसीह में उद्धार प्राप्त करना चाहिए और फिर परमेश्वर के वचनों में विश्वास के द्वारा जीना चाहिए। हृदय से प्रभु की धार्मिकता में विश्वास करना सच्चा विश्वास है। 
रोमियों १०:१० कहता है, "क्योंकि धार्मिकता के लिए मन से विश्वास किया जाता है और उद्धार के लिए मुँह से अंगीकार किया जाता है।" हम अपने हृदय से यीशु के बपतिस्मा और लहू पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी बन सकते हैं और अपने विश्वास को अपने मुँह से अंगीकार करके अपने उद्धार में दृढ़ हो सकते हैं। पापों की माफ़ी हमारे कर्मों से प्राप्त नहीं की जा सकती, परन्तु केवल परमेश्वर की धार्मिकता में हमारे विश्वास के द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
वचन २३-२५ कहता है, “इसलिये कि सब ने पाप किया है और परमेश्‍वर की महिमा से रहित हैं, परन्तु उसके अनुग्रह से उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं। उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता के कारण ध्यान नहीं दिया। उनके विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे।”
बाइबल कहती है कि सभी ने पाप किया है, और इसलिए, वे परमेश्वर की महिमा से रहित हैं। पापियों के पास नरक में जाने के अलावा और कोई चारा नहीं था। हालाँकि, छुटकारे के माध्यम से जो कि मसीह यीशु और परमेश्वर की धार्मिकता में है, लोगों ने स्वतंत्र रूप से पापों की माफ़ी प्राप्त की है। लोग पापरहित हुए है क्योंकि वे परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते थे। परमेश्वर ने विश्वास के द्वारा यीशु को उसके लहू के द्वारा प्रायश्चित के रूप में स्थापित किया। 
जब हम वचन २५-२६ को देखते है तो ऐसा लिखा है, “उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता के कारण ध्यान नहीं दिया। उनके विषय में वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे। वरन् इसी समय उसकी धार्मिकता प्रगट हो कि जिससे वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्‍वास करे उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।” 
यहाँ, वाक्यांश, "अपनी धार्मिकता प्रगट करे" परमेश्वर की धार्मिकता को दर्शाता है, जो यीशु मसीह के धर्मी कार्य के द्वारा पूरा किया गया था। यीशु ने क्रूस पर लहू बहाया क्योंकि उसकी मृत्यु से पहले, उसने यरदन नदी में यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लेने के द्वारा परमेश्वर की सब धार्मिकता को पूरा किया था (मत्ती ३:१३-१७ देखें)। परमेश्वर पिता ने मनुष्य और स्वयं के बीच शांति बनाने के लिए यीशु को इस संसार के पाप के प्रायश्चित के बलिदान के रूप में बनाया। यीशु परमेश्वर की धार्मिकता का अवतरण था।
यीशु ने यूहन्ना से बपतिस्मा लेकर जगत के सभी पापों को ले लिया। यीशु अल्फा और ओमेगा बन गया। इसका मतलब यह है कि यदि व्यक्ति उन वचनों पर विश्वास करता है जो कहते है की परमेश्वर ने जगत के शुरुआत से अन्त तक के सभी पापों को मिटा दिया है तो वह व्यक्ति पाप से उद्धार प्राप्त कर सकता है। 
परमेश्वर की धार्मिकता जिसे यीशु ने पूरा किया, उसने हमें परमेश्वर के साथ शांति से रहने की अनुमति दी। इसे इसलिए बनाया गया था ताकि केवल वही व्यक्ति स्वर्ग में प्रवेश कर सके जो परमेश्वर के साथ शांति से रहता था। सत्य के सुसमाचार में विश्वास करने के बाद ही मुझे यह वचन समझ में आया, उसे परमेश्‍वर ने उसके लहू के कारण एक ऐसा प्रायश्‍चित ठहराया, जो विश्‍वास करने से कार्यकारी होता है, कि जो पाप पहले किए गए और जिन पर परमेश्‍वर ने अपनी सहनशीलता के कारण ध्यान नहीं दिया।” उनकी सहनशीलता के समय में, मैं यीशु के माध्यम से परमेश्वर की धार्मिकता को समझने और उसमें विश्वास करने लगा। 
परमेश्वर की धार्मिकता पूर्ण भूतकाल में पूरी हुई थी, जो दर्शाती है कि यह पहले ही पूरी हो चुकी थी। हमने सच्चे वचन में विश्वास के द्वारा पापों की माफ़ी प्राप्त की, जो कहता है कि यीशु ने हमारे सभी पापों को अपने बपतिस्मा और लहू के द्वारा समाप्त कर दिया। भले ही हमारी आत्माओं को एक ही बार में पाप के लिए माफ़ कर दिया गया हो, फिर भी हमारे शरीर पाप करते है। परमेश्वर ने इस वर्तमान दुनिया में हमारे द्वारा किए गए पाप को 'पहले किए गए पाप' के रूप में संदर्भित किया है। 
क्यों? परमेश्वर ने यीशु के बपतिस्मा को उद्धार के प्रारंभिक बिंदु के रूप में स्थापित किया। इसलिए, पापों की माफ़ी परमेश्वर की धार्मिकता के द्वारा एक ही बार में पूरी हुई, जिसे यीशु मसीह ने पूरा किया था। इस समय जो पाप हम देह से करते है वे वो पाप हैं जिन्हें पहले ही परमेश्वर की दृष्टि में यीशु के बपतिस्मा के द्वारा समाप्त कर दिया गया है। परमेश्वर की दृष्टि में जगत के सारे पाप पहले ही माफ़ किए जा चुके हैं। 'पहले किए गए पापों को पारित करने' का अर्थ है 'पापों की मजदूरी को समझना जो पहले ही चुकाई गई है।' इस जगत के सभी पाप वे पाप हैं जो पहले से ही प्रभु के बपतिस्मा और क्रूस परा के उसके लहू द्वारा धोए गए हैं।
इसलिए, इस दुनिया की शुरुआत से लेकर अंत तक, आदम के समय से लेकर पृथ्वी के अंतिम दिन तक के मनुष्यजाति के सभी पाप और यहां तक कि वे पाप जो लोग वर्तमान में कर रहे हैं, वे सारे पाप 'पहले किए गए' पाप हैं जिसे यीशु ने भूतकाल में ही समाप्त कर दिया था। जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं वे पापरहित हैं। यह सच है कि पहले किए गए पापों को पहले ही पारित किया गया है। यहाँ तक कि इस समय हम जो पाप कर रहे हैं, वे भी पहले किए गए पापों का हिस्सा हैं और परमेश्वर की दृष्टि में माफ़ किए गए हैं। इस जगत के लोग उन पापों को कर रहे हैं जिन्हें परमेश्वर के पुत्र द्वारा मिटा दिया गया था, जिसे इस दुनिया में जगत के सभी पापों को दूर करने के लिए भेजा गया था। अभी हम जो पाप कर रहे हैं, वे वो पाप हैं जिन्हें हमारे प्रभु ने पहले ही समाप्त कर दिया था। क्या आप इसका मतलब समझते हैं?
यीशु ने कहा कि उसने पहले ही इस जगत के पापों को परमेश्वर की धार्मिकता के द्वारा मिटा दिया है। यदि कोई वास्तव में इस भाग का अर्थ नहीं समझता है, तो इसे गलत समझा जा सकता है। प्रभु के दृष्टिकोण में, हम मनुष्य जो पाप करते हैं, वे वो पाप हैं जिनका पहले ही न्याय हो चुका है क्योंकि उन्होंने स्वयं यरदन नदी में बपतिस्मा लिया था और क्रूस पर उसका न्याय किया गया था। परमेश्वर हमें पापों के बारे में चिंता न करने के लिए कहते है उसका कारण यह है क्योंकि यीशु इस जगत में आया और लोगों को एक ही बार में पूरी तरह से पवित्र कर दिया।
इस भाग में पौलुस जिस सत्य के बारे में बात करता है, वह उस व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है जिसे परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने के द्वारा बचाया गया है। हालाँकि, जिन लोगों का नया जन्म नहीं हुआ है, वे परमेश्वर की धार्मिकता की उपेक्षा करते हैं और नरक में जाएंगे। भाइयो, आपको परमेश्वर के वचन को सुनना और पूरी तरह से समझना चाहिए। केवल तभी आपके विश्वास की स्थापना और किसी अन्य व्यक्ति को सुसमाचार का प्रचार करना अच्छा होगा। क्या आप जानते हैं कि परमेश्वर ने संसार को पाप, धार्मिकता और न्याय के लिए दोषी ठहराया है ताकि अंत में उसकी धार्मिकता का उल्लेख किया जा सके? (यूहन्ना १६:८)
परमेश्वर ने यीशु को उसके लहू से, विश्वास के द्वारा, उसकी धार्मिकता को प्रदर्शित करने के लिए एक प्रायश्चित के रूप में स्थापित किया, क्योंकि उसकी सहनशीलता में, परमेश्वर ने उन पापों को पारित किया था जो पहले किए गए थे। चूँकि परमेश्वर ने यीशु को प्रायश्चित के रूप में स्थापित किया, वह हमें सिखाता है कि पहले किए गए पापों को भी पहले ही समाप्त कर दिया गया था। इसलिए, हम परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके धर्मी बने। 
वचन २६ में लिखा है, "वरन इसी समय उसकी धार्मिकता प्रगट हो की जिससे वह आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करे उसका भी धर्मी ठहरानेवाला हो।" 'इसी समय', परमेश्वर हमें अनन्त जीवन की अनुमति देता है, और वह जगत की निंदा नहीं करना चाहता। 'इसी समय,' जब परमेश्वर ने यीशु मसीह को 'अपनी धार्मिकता प्रगट करने' के लिए भेजा, तो प्रभु ने अपने बपतिस्मा और लहू के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता प्रगट की। परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को इस संसार में बपतिस्मा लेने और क्रूस पर चढ़ाने के लिए भेजा और इस प्रकार हमारे सामने अपने प्रेम और धार्मिकता को प्रगट किया। 
परमेश्वर ने यीशु के द्वारा अपनी सब धार्मिकता पूरी की। परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने वाला प्रत्येक विश्वासी धर्मी है। हमारे परमेश्वर ने जगत के पापों को हमेशा के लिए मिटाने का धर्मी कार्य पूरा किया। तब क्या हम अपने हृदय से परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास कर सकते हैं? परमेश्वर कहते हैं कि जब हम उसकी धार्मिकता में विश्वास करते हैं तो हम धर्मी और पापरहित बनते है। क्यों? क्या यीशु में विश्वासी पापरहित नहीं है क्योंकि उसने पहले ही हमारे सभी पापों को धोने का धर्मी कार्य किया है? परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने वाला धर्मी है क्योंकि उसके पास कोई पाप नहीं है। क्योंकि प्रभु ने हमारे पूरे जीवन में हमारे द्वारा किए गए सभी पापों को मिटा दिया था इसलिए हम परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने में सक्षम हैं। अन्यथा, हम कभी भी परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त नहीं कर पाते।
 

घमंड करने के लिए केवल परमेश्वर की धार्मिकता है

वचन २७-३१ कहता है, “तो घमण्ड करना कहाँ रहा? उसकी तो जगह ही नहीं। कौन–सी व्यवस्था के कारण से? क्या कर्मों की व्यवस्था से? नहीं, वरन् विश्‍वास की व्यवस्था के कारण। इसलिये हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से अलग ही, विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहरता है। क्या परमेश्‍वर केवल यहूदियों ही का है? क्या अन्यजातियों का नहीं? हाँ, अन्यजातियों का भी है। क्योंकि एक ही परमेश्‍वर है, जो खतनावालों को विश्‍वास से और खतनारहितों को भी विश्‍वास के द्वारा धर्मी ठहराएगा। तो क्या हम व्यवस्था को विश्‍वास के द्वारा व्यर्थ ठहराते हैं? कदापि नहीं! वरन् व्यवस्था को स्थिर करते हैं।”
व्यवस्था की स्थापना का अर्थ है कि हम अपने कर्मों के द्वारा पापों से नहीं बच सकते। हम कमजोर और अपरिपूर्ण प्राणी हैं, परन्तु परमेश्वर की धार्मिकता ने हमें उसके वचन के द्वारा सिद्ध बनाया है। परमेश्वर के धार्मिकता के वचन में विश्वास करने से हमारा उद्धार हुआ है। पापों से हमारा उद्धार होने के बाद भी, हमारा परमेश्वर यह कहते हुए हमसे बात करना जारी रखता हैं की, "आप अपर्याप्त हैं, लेकिन मैंने आपको पवित्र किया है। इसलिए आप को परमेश्वर की धार्मिकता के साथ उसके निकट आना चाहिए।”
वचन २७ में लिखा है, “तो घमण्ड करना कहाँ रहा? उसकी तो जगह ही नहीं। कौन–सी व्यवस्था के कारण से? क्या कर्मों की व्यवस्था से? नहीं, वरन् विश्‍वास की व्यवस्था के कारण।” व्यक्ति को परमेश्वर की धार्मिकता की व्यवस्था को जानना चाहिए जो परमेश्वर ने स्थापित की है और परमेश्वर की धार्मिकता के इस व्यवस्था में विश्वास करना चाहिए। “कौन–सी व्यवस्था के कारण से? क्या कर्मों की व्यवस्था से? नहीं, वरन् विश्‍वास की व्यवस्था के कारण।” 
आपको जानना चाहिए की हम हमारे पापों से छूटकारा तभी प्राप्त करते है जब हम परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करे और हम अपने कर्मो से उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते। रोमियों अध्याय ३ प्रेरित पौलुस के द्वारा इस भाग के बारे में बात करता है। “तो क्या उनका अविश्वास परमेश्वर की विश्वासयोग्यता को व्यर्थ ठहराता है? कदापि नहीं!” परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करनेवाला व्यक्ति कायम रहेगा, पर जो परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करता वह गिर जाएगा।
रोमियों अध्याय ३ स्पष्ट रूप से परमेश्वर की धार्मिकता को प्रकट करता है। आपको यह ध्यान रखना चाहिए कि परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता की व्यवस्था की स्थापना उन लोगों को बनाने के लिए की जो अपने ही विचारों पर विश्वास करते हैं। परमेश्वर ने हमें सभी पापों से पूरी तरह से बचाया है। इसलिए, हम परमेश्वर के वचन पर विश्वास करने के द्वारा सभी पापों से बचाए जा सकते हैं जो उसकी धार्मिकता को प्रकट करता है। हम परमेश्वर के राज्य के वारिस होने के लिए आते हैं और उसकी धार्मिकता में विश्वास करके उसके साथ शांति प्राप्त करते हैं।
जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास नहीं करते, उनके हृदय में शांति नहीं हो सकती। व्यक्ति धन्य है या शापित है, यह प्रश्न इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करता है या नहीं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता के वचनों को नहीं लेता है, तो उसका न्याय परमेश्वर के वचनों की न्यायोचित निंदा के अनुसार किया जाएगा। उद्धार परमेश्वर के प्रेम से उत्पन्न होता है और फिर हम उसकी धार्मिकता में विश्वास करने के द्वारा अपने पापों से उद्धार प्राप्त करते हैं। हम अपने प्रभु की स्तुति करते हैं जिन्होंने हमें परमेश्वर की धार्मिकता में यह विश्वास दिया है। आइए इस सच्चाई के लिए धन्यवाद दें कि हमारे पास वही विश्वास है जो प्रेरित पौलुस के पास था! हम प्रभु की स्तुति करते हैं।
हम उसकी स्तुति और धन्यवाद भी करते हैं क्योंकि हम यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू में विश्वास करने के द्वारा सभी पापों से मुक्त हो गए हैं। यदि यह उद्धार, विश्वास, या परमेश्वर की कलीसिया के लिए नहीं होता, तो हम कभी भी पापों की माफ़ी प्राप्त करने में सक्षम नहीं होते। हम ने वास्तव में हृदय से परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास किया था, और मुँह से उद्धार का अंगीकार किया था। हम परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, जिसने अपनी धार्मिकता से हमें सभी पापों से बचाया।