उपदेश

विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 7-1] अध्याय ७ का परिचय

इस तथ्य पर विचार करते हुए कि उसके छुटकारे से पहले उसके शरीर को परमेश्वर की व्यवस्था के द्वारा मौत की सजा दी गई थी, प्रेरित पौलुस ने विश्वास का अंगीकार किया कि वह यीशु मसीह में विश्वास करके, पाप के लिए मर गया था। इससे पहले कि हम परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करे—अर्थात, नया जन्म लेने से पहले—हम में से जो मसीह में विश्वास करते हैं, व्यवस्था के प्रभुत्व और अभिशाप के अधीन रहते थे। इस प्रकार, यदि यीशु मसीह से मुलाक़ात करने के द्वारा हमें हमारे पापों से मुक्त नहीं किया गया होता, जो हमें परमेश्वर की धार्मिकता के पास लेकर आया, तो व्यवस्था का हम पर प्रभुत्व होता। 
पौलुस ने आत्मिक चीजो के बारे में बात की जिन्हें शरीर में आसानी से नहीं समझा जा सकता है - यानी, जो पाप के लिए मर चुके हैं, वे अब पाप के अधिकार में नहीं हैं, जैसे एक महिला जिसका पति मर गया है, वह अब अपने पति के प्रति अपने दायित्व से पूरी तरह मुक्त हो गई है। यह मार्ग सरल लग सकता है, लेकिन यह आत्मिक रूप से महत्वपूर्ण मार्ग है। इसका मतलब यह है कि, चाहे वे पसंद करते हैं या नहीं, लेकिन जिन्होंने परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त नहीं किया हैं, वास्तव में, व्यवस्था के श्राप के तहत जीने के लिए नियत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने अभी तक अपने पापों की समस्या का समाधान नहीं किया है। 
रोमियों ६:२३ हमें बताता है कि "पाप की मजदूरी मृत्यु है," जिसका अर्थ है कि पाप केवल तभी दूर होगा जब उसकी मजदूरी का भुगतान किया जाएगा। यदि कोई यीशु में विश्वास करता है, फिर भी यीशु द्वारा दी गई परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं जानता है, तो वह अभी भी पाप में जी रहा है और उसे पाप की मजदूरी का भुगतान करना होगा। यही कारण है कि हमें यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करना है। केवल परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करने के द्वारा ही हम अपने पापों के लिए मर सकते हैं, व्यवस्था से मुक्त हो सकते हैं, और अपने नए दूल्हे मसीह यीशु से विवाह कर सकते हैं।
हम यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु परमेश्वर की इस धार्मिकता पर विश्वास किए बिना, कोई भी व्यवस्था से मुक्त नहीं हो सकता है। व्यवस्था के श्राप से छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका परमेश्वर की धार्मिकता को जानना और उस पर विश्वास करना है। क्या आपने यीशु के द्वारा परमेश्वर की यह धार्मिकता प्राप्त की है? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि आप अपनी धार्मिकता को त्याग दें और नम्रता से परमेश्वर के वचन की ओर लौट आएं।
 

पाप के लिए मरने के बाद मसीह की ओर

पौलुस ने रोम में अपने भाइयों से कहा, "तुम भी मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिये मरे हुए बन गए।" आपको इसकी ठीक-ठीक समझ होनी चाहिए कि 'मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिए मर जाना' क्या है। कोई भी मसीह की देह के द्वारा पाप के लिए मरे बिना मसीह के पास नहीं जा सकता। दूसरे शब्दों में, हमारे पापों को यीशु मसीह की देह के साथ मरना चाहिए। यह तभी संभव है जब व्यक्ति यूहन्ना द्वारा यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसकी मृत्यु में विश्वास करे।
हम यूहन्ना द्वारा यीशु के बपतिस्मा पर विश्वास करने के द्वारा मसीह के साथ पाप के लिए मर सकते हैं। क्योंकि यीशु यूहन्ना के द्वारा बपतिस्मा लेकर जगत के सारे पापों को अपने ऊपर लेकर मरा, हमारे पाप भी उसके साथ मर गए थे जब हम इस पर विश्वास करते थे। यह सत्य है कि संसार के सारे पाप यीशु के ऊपर यूहन्ना के बपतिस्मा के द्वारा पारित किए गए थे। इस सत्य को न केवल जानना चाहिए बल्कि विश्वास के साथ हमारे हृदय में बसाया जाना चाहिए। हमें इस विश्वास को तब तक बनाए रखना चाहिए जब तक हम परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर लेते। इसलिए पौलुस ने कहा कि हम मसीह की देह के द्वारा व्यवस्था के लिए मरे हुए हैं। जैसे, जो लोग इस सत्य में विश्वास करते हैं, वे यीशु मसीह के पास जा सकते हैं, उनके साथ रह सकते हैं, और परमेश्वर के लिए धार्मिक फल ला सकते हैं।
हमें पत्र की पुरानीता में नहीं, बल्कि आत्मा के नए सत्य में विश्वास करना चाहिए। पापी वास्तव में व्यवस्था के कारण अधिक पाप करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यवस्था उनके अंदर छिपे हुए अधिक पापों को प्रकट करता है, जिससे उन्हें अपने पापों के बारे में अधिक जानकारी मिलती है और उन्हें और भी अधिक पाप करने की अनुमति मिलती है। व्यवस्था के कार्यों में से एक हमें हमारे पापों को पहचानने के लिए है, लेकिन यह पाप की प्रकृति को और अधिक प्रकट करने और हमें और अधिक पाप करने के लिए भी कार्य करता है। यदि  परमेश्वर ने हमें व्यवस्था नहीं दिया होता, तो हमें नहीं पता होता कि हमारे भीतर इतना पाप छिपा है। परन्तु परमेश्वर ने हमें अपनी व्यवस्था दी है, और यह व्यवस्था न केवल पाप को और भी अधिक पापमय बनाती है, बल्कि यह हमें अधिक से अधिक पाप करने के लिए भी बाध्य करती है।
इसलिए, पौलुस कहता है कि चूँकि हम मसीह की देह के द्वारा पाप के लिए मरे हुए हैं, अब हमें परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास के साथ प्रभु की सेवा करनी है। वह हमें आत्मा की मदद से और हमें दिए गए छुटकारे के उपहार के साथ प्रभु की सेवा करने के लिए कह रहा है, क्योंकि हमारा विश्वास वचन के शाब्दिक अक्षर में विश्वास के साथ उसकी सेवा करने के बजाय हमारे हृदयों में गहरा है। जैसा कि बाइबल हमें बताती है कि "क्योंकि शब्द मारता है, परन्तु आत्मा जिलाता है," हमें पानी और आत्मा के सुसमाचार के सही अर्थ को समझने के द्वारा प्रभु का अनुसरण करना चाहिए, जो कि परमेश्वर की धार्मिकता है। जब हम परमेश्वर के वचन में विश्वास करते हैं, दूसरे शब्दों में, हमें लिखित वचन में छिपे सही अर्थ को जानना और उस पर विश्वास करना है। 
 

तो क्या व्यवस्था पाप है? निश्चय ही नहीं!

पौलुस ने इसके कार्यों पर जोर देते हुए परमेश्वर की व्यवस्था की व्याख्या की। यह दिखाता है कि व्यवस्था के कार्य की उचित समझ के साथ विश्वास करना कितना महत्वपूर्ण है। पौलुस ने पहले अपने पापों को अपने तरीके से देखा, और इस वजह से वह अपने पापों को नहीं जानता था, लेकिन परमेश्वर की व्यवस्था के माध्यम से वह यह जान सका कि उसके पास एक लालची दिल था। 
मैं आशा करता हूँ कि आज यीशु में विश्वास करने वाले भी व्यवस्था के बारे में उसी समझ तक पहुँचने में सक्षम हैं जहाँ तक पौलुस पहुँचा था। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो व्यवस्था की सच्चाई को नहीं जानते हुए, व्यवस्था द्वारा अपना जीवन जीने के लिए और अधिक प्रयास करते हैं। वे यह सोचकर कलीसिया जाते हैं कि यदि वे थोड़ी और कोशिश करेंगे, तो वे सारी व्यवस्था का पालन कर सकेंगे। लेकिन वास्तव में, ये लोग परमेश्वर की धार्मिकता को बिल्कुल भी नहीं खोज पाएंगे। 
उन्होंने परमेश्वर द्वारा दी गई व्यवस्था के गहरे अर्थ को नहीं समझा है, और इस प्रकार वे विधिवादी बन गए हैं। वे पाखंडी हैं, अंधे हैं, अपने ह्रदय को भी देखने में असमर्थ हैं, और वे नहीं जानते कि वे मसीही समुदाय में परमेश्वर की धार्मिकता के खिलाफ खड़े हैं। आज के मसीही धर्म में ऐसे बहुत से लोग हैं। जो लोग वास्तव में परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं जानते हैं और विधि सम्मत विश्वास में यीशु को अपने नाममात्र के उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, उन्हें अनन्त मृत्यु के दण्ड से बचाया नहीं जा सकता। 
पौलुस ने कहा कि परमेश्वर की आज्ञाओं के माध्यम से, उन्हें अपने ह्रदय के अंदर लोभ का एहसास हुआ। जब उसने आज्ञाओं के माध्यम से अपने पापों का एहसास किया, तब भी पौलुस एक विधि सम्मत था जिसने सोचा था कि उसे परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करना होगा। परमेश्वर की आज्ञाओं ने पौलुस के हृदय में लोभ को प्रकट किया और पौलुस के पापों को और भी अधिक पापमय बना दिया। इस तरह पौलुस को पता चला कि वह एक गंभीर पापी के अलावा और कुछ नहीं था।
मनुष्य के मन में पाप के बारह स्वरूप होते हैं। जब पौलुस को व्यवस्था के वास्तविक कार्यों के बारे में नहीं पता था, तो उसने खुद को एक अच्छा व्यक्ति माना, यह महसूस नहीं किया कि वह वास्तव में कितना पापी था। लेकिन परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार जीने के उसके प्रयास के परिणाम ने उसे दिखाया कि वह आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम नहीं था, और यह कि इन आज्ञाओं ने वास्तव में उसके पापों को और भी अधिक प्रकट किया। 
जब लोग यीशु में विश्वास करते हैं तब वे कैसे है? जब आपने पहली बार यीशु पर विश्वास करना शुरू किया, तो आप सभी अपने विश्वास से भर गए होंगे, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा, आपको कई पाप मिल जाएंगे जो मूल रूप से आप में हैं। आपने इन पापों को किस माध्यम से पाया? लिखित व्यवस्था और आज्ञाओं के द्वारा ही हमने यह पाया है कि बारह प्रकार के पापों से हमारा हृदय कितना भरा हुआ है। और हम व्यवस्था के सामने अपने पापी रूप को देखने से झिझक ते है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम व्यवस्था के माध्यम से पाते हैं कि हम वास्तव में गंभीर पापी हैं।
यही कारण है कि कुछ लोगों ने खुद को आराम देने के लिए न्यायीकरण के सिद्धांत का निर्माण किया। यह सिद्धांत दावा करता है कि भले ही हमारे दिलों में पाप है, सिर्फ इसलिए कि हम यीशु में विश्वास करते हैं, परमेश्वर हमें धर्मी मानेंगे। यह केवल एक मनुष्य निर्मित सिद्धांत है। लोगों ने अपने पापों को छिपाने के लिए इस सिद्धांत की आत्मसंतुष्टि में जीने की कोशिश करते हुए इस तरह के सिद्धांत को बनाया और विश्वास किया है। परन्तु क्योंकि वे अब भी व्यवस्था के सामने पापी के रूप में प्रगट होते हैं, उनके पाप उनके मन पर और ज्यादा बढ़ते ही रहते है। हमारे सभी पापों से मुक्त होने के लिए, हमारे पास उस सुसमाचार में विश्वास करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है जिसमें परमेश्वर की धार्मिकता है। हमारे सभी पापों से छुटकारा पाने का यही एकमात्र तरीका है। 
जैसा कि अपने अतीत में पौलुस ने सोचा था कि परमेश्वर ने आज्ञाओं का पालन करने के लिए आज्ञाए दी है, उसने इसे केवल स्वाभाविक माना कि वह उसका पालन करने की पूरी कोशिश करेंगे। फिर भी इसके विपरीत, उसने पाया कि ये आज्ञाएँ वास्तव में पाप के कारण उसकी आत्मा को मार देती हैं। पौलुस ने अंततः महसूस किया कि वह गलत समझ रहा था और गलती से परमेश्वर की आज्ञाओं में विश्वास कर रहा था। 
प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय के अन्दर मरकुस ७:२१-२३ में दर्शाए गए बारह प्रकार के पाप है। “क्योंकि भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से, बुरे विचार, व्यभिचार, चोरी, ह्त्या, परस्त्रीगमन, लोभ, दुष्टता, छल, लुचपन, कुदृष्टि, निन्दा, अभिमान, और मूर्खता निकलती है।“ 
पौलुस और अन्य सभी लोगों ने अंततः परमेश्वर की आज्ञाओं के माध्यम से अपने पापों को पहचाना। व्यवस्था के द्वारा, उन्होंने अपने पापों का एहसास किया और उन्हें मार डाला गया, और तब उन्होंने यीशु मसीह के माध्यम से परमेश्वर की धार्मिकता की खोज की और उस पर विश्वास किया। परमेश्वर की धार्मिकता के बारे में आपकी क्या समझ है? क्या आप अभी भी यह सोचकर आज्ञाओं का पालन करने की कोशिश कर रहे हैं कि आप उन सभी का पालन कर सकते हैं? परमेश्वर ने हमें उसकी व्यवस्था दी ताकि हम अपने पापों को पहचान सकें और उसके पास लौट सकें—पाप से छुटकारा पाने के लिए, दूसरे शब्दों में, परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने के द्वारा। हमें इस बात की उचित समझ होनी चाहिए कि परमेश्वर ने हमें अपनी आज्ञाएँ क्यों दीं और उन पर सही रीती से विश्वास करें। एक बार जब आप इस सच्चाई को जान लेते हैं, तो आप जान जाएंगे कि पानी और पवित्र आत्मा का सुसमाचार कितना कीमती है। 
जो लोग परमेश्वर की आज्ञाओं में विश्वास करते हैं वे जान सकते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में वे कितने बड़े पापी हैं। जो लोग आज्ञाओं की भूमिका को नहीं जानते हैं और परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करते हैं, वे अपने धार्मिक जीवन में बड़ी कठिनाइयों का सामना करेंगे और अंततः अपने स्वयं के विनाश की ओर ले जाएंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि पापों से भरी दुनिया में रहते हुए पाप से दूर रहना असंभव है। यही कारण है कि कुछ लोग दूर-दराज के पहाड़ों में भी एकांत में रहकर सन्यासी का जीवन जीने की कोशिश करते हैं। वे सोचते हैं कि गहरे पहाड़ों में रहकर और संसार के पापों से पीछे हटकर वे पाप करने से बच सकते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। 
हमें यह महसूस करना चाहिए कि यद्यपि यह सच है कि इस संसार में प्रत्येक व्यक्ति पाप करता है और इस प्रकार उसके हृदय में पाप है, ऐसे सभी पापों से मुक्ति परमेश्वर की धार्मिकता को जानने और उसमें विश्वास करने में पाई जा सकती है। भले ही हम पापों से बचने के लिए जगत से बचते है, फिर भी हम अपने दिल के पापों से बचने में असमर्थ होंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे पाप हमारे दिलों में पाए जाते हैं। वास्तव में अपने आप को पाप से मुक्त करने के लिए, हमें पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करना चाहिए। परमेश्वर की व्यवस्था और उसकी आज्ञाएं हमारे पापों को और भी अधिक पापमय बनाती हैं। जो लोग अपने पापों की गंभीरता को जानते हैं, उन्हें पानी और आत्मा के सुसमाचार के द्वारा हम पर प्रकट की गई परमेश्वर की धार्मिकता को जानना और उस पर विश्वास करना चाहिए। 
"और वही आज्ञा जो जीवन के लिये थी, मेरे लिए मृत्यु का कारण ठहरी। क्‍योंकि पाप ने अवसर पाकर आज्ञा के द्वारा मुझे बहकाया, और उसी के द्वारा मुझे मार भी डाला” (रोमियों ७:१०-११)। हमें व्यवस्था की उचित समझ होनी चाहिए। जो लोग व्यवस्था को ठीक से नहीं समझ पाए हैं, वे अपना पूरा जीवन विधि सम्मत में डूबे हुए बिताएंगे, अपने अंतिम दिन तक व्यवस्था से बचने की कोशिश करेंगे। केवल वे ही जो व्यवस्था की वास्तविक भूमिका को जानते हैं वे प्रेम करेंगे और यीशु द्वारा पूरी की गई परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करेंगे। तो क्या आप परमेश्वर की इस धार्मिकता को जानते हो? 
प्रेरित पौलुस ने कहा कि क्योंकि उसने अतीत में नया जन्म नहीं पाया था तब तक वह उसके शरीर का था और पाप के तहत बेचा गया था। उसने यह भी स्वीकार किया कि यद्यपि वह परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार जीना चाहता था, उसने वह किया जो वह नहीं करना चाहता था—अर्थात् पाप किया। इसका कारण यह था कि उस में पवित्र आत्मा नहीं था, क्योंकि उसके पास परमेश्वर की धार्मिकता नहीं थी। तब पौलुस ने स्वीकार किया कि उसने अपनी इच्छा के विरुद्ध पाप किया इसका कारण उसके हृदय में पाए गए पाप थे, क्योंकि उस समय उसे परमेश्वर की धार्मिकता को ढूँढना बाकी था।
फिर भी, पौलुस को एक व्यवस्था के बारे में एहसास हुआ, और वह व्यवस्था पाप की व्यवस्था थी - तथ्य के उसकी सबसे बुनियादी समझ कि मनुष्य, जिसके हृदय में पाप है, पाप करने से बच नहीं सकता। उन्होंने यह भी महसूस किया कि आंतरिक व्यक्ति अभी भी हमेशा परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार जीना चाहता है। परन्तु पौलुस ने अंगीकार किया कि जैसे पाप का वृक्ष पाप का फल लाता है, वैसे ही वह एक पापी था जो केवल पाप में जीवित रह सकता था, क्योंकि उसने अभी तक यीशु मसीह से मुलाकात नहीं की थी, उसे अपने पापों से मुक्ति नहीं मिली थी। दूसरे शब्दों में, यह उचित था कि उसे उसके पापों के कारण मार डाला जाए। 
यही कारण है कि उसने स्वीकार किया कि वह एक अभागा व्यक्ति था, और विलाप करता है की, "मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा?" (रोमियों ७:२४) यह पौलुस को खुद के बारे में याद था जब वह एक पापी था। आपको पौलुस के इस अंगीकार को अपने ऊपर लागू करने पर विचार करना चाहिए। क्या आप अब भी इस मौत की देह में कैद नहीं हो जो व्यवस्था का पालन नहीं कर सकती? हमें परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करना चाहिए। पानी और आत्मा के सुसमाचार में परमेश्वर की यह धार्मिकता छिपी हुई है, और हम इस सुसमाचार में विश्वास करके उसकी धार्मिकता को प्राप्त कर सकते हैं।
यीशु मसीह के बपतिस्मा और क्रूस पर उसकी मृत्यु में विश्वास करने के द्वारा पौलुस उसकी सारी दुर्दशा से मुक्त हुआ था।