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विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 8-2] ( रोमियों ८:१-४ ) परमेश्वर की धार्मिकता, धर्मी की पूर्ति के लिए व्यवस्था की आवश्यकता है

( रोमियों ८:१-४ )
“अत: अब जो मसीह यीशु में हैं, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं। [क्योंकि वे शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हैं।] क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया। क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्‍वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी। इसलिये कि व्यवस्था की विधि हममें जो शरीर के अनुसार नहीं वरन् आत्मा के अनुसार चलते हैं, पूरी की जाए।” 
 

रोमियों ८:१-४ हमें बताता है कि जो लोग मसीह में हैं उनका विश्वास किस प्रकार का है। इस भाग का रहस्य यह है कि हम परमेश्वर की धार्मिकता में अपने विश्वास के साथ व्यवस्था की सभी मांगों को पूरा कर सकते हैं।
तो फिर, वह विश्वास क्या है जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करता है? यह वो विश्वास है जिसने यीशु के बपतिस्मा और उसके लहू में विश्वास करके पापों की माफ़ी प्राप्त की, जिसके द्वारा हमारे प्रभु ने जगत के सभी पापों को दूर किया। इसलिए हम यीशु पर विश्वास करके पाप पर विजय प्राप्त कर सकते हैं, जिसने हमारे उद्धारकर्ता के रूप में परमेश्वर की धार्मिकता का अनुसरण करके सभी धार्मिकता को पूरा किया है। यह वो विश्वास है जो परमेश्वर की धार्मिकता और विश्वास में हमारी जीत का अनुसरण करता है।
सबसे पहले, रोमियों ८:१ हमें बताता है, "अत: अब जो मसीह यीशु में है, उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।" जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके यीशु मसीह में बने रहते हैं, निश्चय ही उनके अन्दर कोई पाप नहीं है। ऐसा विश्वास यीशु के बपतिस्मा और उसके लहू पर आधारित है जिसने व्यवस्था की सभी धार्मिक आवश्यकताओं को पूरा किया है। परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नया जन्म लेने वाले संतों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विश्वास है। और कैसे केवल नश्वर ही पापरहित हो सकते हैं? और फिर भी यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर की धार्मिकता में उनके अटूट विश्वास के साथ, उनके सभी पाप दूर हो गए हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि यीशु ने उन लोगों के लिए अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को अपनी देह पर उठाया जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं। 
रोमियों ८:३ हमें बताता है कि परमेश्वर ने "अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिए भेजकर,” और “शारीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।" दुसरे शब्दों में, यीशु के "शरीर" में पाप पर दण्ड की आज्ञा देकर, परमेश्वर पिता ने संसार के सभी पापों को अपने एकलौते पुत्र पर पारित कर दिया। सत्य का यह वचन मत्ती ३:१३-१७ में प्रकट हुआ है (इस विषय पर अधिक विस्तृत चर्चा मेरी पुस्तक, "क्या वास्तव में आपका पानी और आत्मा से नया जन्म हुआ है?” में पाई जा सकती हैं)। जो लोग इस सत्य में विश्वास करते हैं उनके अन्दर कोई पाप नहीं है क्योंकि परमेश्वर ने अपनी धार्मिकता से जगत के सभी पापों को माफ़ कर दिया है।
 

“मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ!”
 
रोमियों ७:२४ से ८:६ तक के सन्दर्भ में दो बहुत ही विपरीत विषय हैं। उनमें से एक पाप की समस्या की चर्चा है, दूसरे शब्दों में, अपने स्वयं के देह की वासनाओं के कारण परमेश्वर की अवज्ञा, और दूसरा पाप की इस समस्या के समाधान की चर्चा है जो उसने यीशु मसीह में पाई थी।
रोमियों ७:२४-२५ कहता है, “मैं कैसा अभागा मनुष्य हूँ! मुझे इस मृत्यु की देह से कौन छुड़ाएगा? हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर का धन्यवाद हो। इसलिये मैं आप बुद्धि से तो परमेश्‍वर की व्यवस्था का, परन्तु शरीर से पाप की व्यवस्था का सेवन करता हूँ।” जब पौलुस ने खुद की देह को देखा तो वह चिल्लाया कि वह कैसा अभागा मनुष्य है। परन्तु उसने परमेश्वर का धन्यवाद किया क्योंकि वह यीशु मसीह के द्वारा अपनी देह से छुडाया गया था। हम भी यह समझ सकते हैं कि पौलुस ने भी अपने मन में परमेश्वर की व्यवस्था की सेवा की, परन्तु अपनी देह में उसने पाप की व्यवस्था की सेवा की।
पौलुस ने अंगीकार किया कि उसका शरीर परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाला जीवन जीने के बजाए पाप की व्यवस्था का पालन कर रहा था जो परमेश्वर को अप्रसन्न करता है। और फिर भी उसने कहा कि वह अभी भी अपने मन में परमेश्वर के आत्मा की व्यवस्था का पालन करता है। इन दो व्यवस्थाओं के बीच में, पौलुस ने खुद को अभागा और हताश महसूस किया, लेकिन फिर भी उसने यीशु मसीह में अपने विश्वास के माध्यम से, परमेश्वर की धार्मिकता की पूर्ति के लिए उसे अपने पापों से मुक्त करने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हुए विश्वास की जीत की घोषणा की।
पौलुस ऐसा धन्यवाद केवल इसलिए दे सका क्योंकि वह विश्वास करता था कि यीशु मसीह ने उसके सभी पापों के साथ-साथ मनुष्यजाति के सभी पापों का प्रायश्चित किया था। संसार के इन पापों को अपने ऊपर लेने के लिए, यीशु ने यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लेकर मनुष्यजाति के सभी पापों को अपने शरीर पर उठा लिया। और क्रूस पर पाप का न्याय सहने के द्वारा, उसने उन सभी को जो उस पर विश्वास करते हैं, संसार के सभी पापों से बचा लिया है। यही कारण है कि पौलुस ने रोमियों ८:१ में घोषित किया, "इसलिये अब जो मसीह यीशु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।" कि कोई दण्ड नहीं है, इसका अर्थ यह है कि जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं, उनमें बिल्कुल भी पाप नहीं है। जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके मसीह यीशु में हैं, उनके हृदय में कभी भी पाप नहीं हो सकता। वे अपने शरीर में कमजोर हो सकते हैं, लेकिन उनमें कोई पाप नहीं है।
इसके विपरीत, दण्ड का अर्थ है पाप का अस्तित्व, अर्थात्, दण्ड पाने की स्थिति। जब कोई कुछ गलत करता है, तो हम आमतौर पर उसे पाप कहते हैं। लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास नहीं करता है इसलिए वह एक पापी है। फिर भी उपरोक्त भाग हमें बताता है कि जो लोग मसीह यीशु में हैं, उनके लिए दण्ड की कोई आज्ञा नहीं है। 
हालाँकि, यह घोषणा तथाकथित धार्मिकता के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, जिसका दावा दुनिया के धर्म करते हैं। 'विश्वास से धर्मी माने जाने का प्रमाण' का अर्थ एक काल्पनिक दावा है कि परमेश्वर व्यक्ति को धर्मी मानता है, भले ही फिर यीशु पर उसके विश्वास के बावजूद भी उसके ह्रदय में पाप हो और वह धर्मी वास्तव में धर्मी न हो। लेकिन ये ग़लत है। परमेश्वर कैसे झूठ बोल सकता है और एक पापी को पापरहित कह सकता है? वह ऐसा नहीं करता। इसके बजाय वह ऐसे पापी को कहता है, “तू अपने पापों के कारण अपनी निश्चित मृत्यु का सामना कर रहा है; मेरी उस धार्मिकता पर विश्वास करो जो पानी और आत्मा के सुसमाचार में दिखाई गई है!” 
आजकल बहुत से लोग अपने गलत विश्वास को तर्क सांगत बनाने का प्रयास करते हैं और ऐसे सिद्धांतों पर टिके रहकर परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त करते हैं। लेकिन इस तरह का विश्वास बहुत गलत और खतरनाक है। यदि यीशु सत्य के परमेश्वर नहीं होते, तो शायद वे एक पापी को अपना अनुयायी कह सकते थे। लेकिन आपको यह समझना चाहिए कि यीशु, सत्य, एक पापी को धर्मी और पापरहित नहीं कहता हैं। परमेश्वर की धार्मिकता, उसके न्याय और पवित्रता के सामने पापी को धर्मी और पापरहित कहना असंभव है।
आपको यह समझना चाहिए कि पाप से आपका छुटकारा केवल यीशु पर विश्वास करने से नहीं, लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करने से आता है, जो आपकी हो जाती है। यदि आप यीशु पर विश्वास करते है लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता को नहीं जानते और विश्वास नहीं करते तो परमेश्वर आपको धर्मी नहीं कहेगा। लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत और धार्मिकता के सिद्धांत जैसे सिद्धांतों को कई लोग रूढ़िवादी मसीही सिद्धांतों के रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन बहुत ही थोड़े लोग जानते हैं कि इस तरह के तथाकथित रूढ़िवादी सिद्धांत वास्तव में व्यक्ति को परमेश्वर की धार्मिकता को जानने या प्राप्त करने से रोकते है। यह सिद्धांत परमेश्वर की धार्मिकता के खिलाफ है यह न समझते हुए इन सिध्धांतों पर विश्वास करने के द्वारा, बहुत से लोग परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करने में विफल रहे हैं, क्योंकि ऐसे सिद्धांत उनके स्वयं के लिए ठोकर बन गए हैं। 
यदि आप एक सच्चे मसीही बनना चाहते हैं, तो आपको स्वयं परमेश्वर के वचन से खुद की जाँच करनी चाहिए और यह देखना चाहिए की क्या आप वास्तव में मसीह में है या नहीं। और ऐसा करने के लिए, आपको पानी और आत्मा के वचन को सुनना, देखना और समझना चाहिए। अपने आप से पूछें, "क्या यीशु में मेरा विश्वास सही है? जब मैं कहता हूँ कि मैं यीशु में विश्वास करता हूँ, तब क्या मैं केवल धर्म का पालन नहीं कर रहा हूँ? क्या मैं आधे रास्ते पर तो नहीं खडा हूँ, न तो यीशु के अंदर और न ही बाहर?" अब समय आ गया है कि आप परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके उसे प्राप्त करें और सत्य के विश्वास में निवास करें कि "इसलिये अब जो मसीह यीशु में हैं उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।"
इफिसियों में हम अक्सर इस भाग को देखते है, "उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है।" इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर ने हमें हमारे सभी पापों से बचाने के लिए मसीह यीशु में हमें ठहराया और चुना है। वे जो यीशु में परमेश्वर की धार्मिकता से प्रायश्चित किए गए हैं और मसीह में प्रवेश कर चुके हैं, वे वो हैं जिनके पाप पूरी तरह से मिटा दिए गए हैं। इसलिए जो लोग हमारे प्रभु के द्वारा दी गए पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करते हैं, उनके लिए मसीह यीशु में दण्ड की आज्ञा नहीं है। जब व्यक्ति पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करता है, तो वह ऐसा व्यक्ति बन जाता है जिसने प्रभु में परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त की है और जो इस सुसमाचार का प्रचार करता है।
जो लोग यीशु मसीह में परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करते हैं और जिन्होंने उसकी खुली बाहों में प्रवेश किया है, उनके लिए कोई पाप नहीं है। यही सत्य और सही उत्तर है। क्योंकि यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू ने उन लोगों के लिए सभी पापों को मिटा दिया है जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके मसीह में हैं, उनके लिए पाप करना असंभव है। इसलिए जो लोग मसीह में हैं, उनके पास वास्तव में कोई पाप नहीं है। यह सत्य—कि जो मसीह में हैं उनके लिए कोई पाप नहीं है—पानी और आत्मा के वचन में पाया गया उत्तर है और इस तरह पाप की समस्या के बारे में कुछ भी जटिल नहीं है। जब आप पानी और आत्मा के सुसमाचार के द्वारा प्रकट की गई परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं, तो आप भी वास्तव में धर्मी बन सकते हैं। पानी और आत्मा के सुसमाचार को जाने और इसमें निहित परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करो। तब आप एक धर्मी संत बनेंगे जो मसीह में निवास करता है।
मान लीजिए कि हम एक बहुत ही कठिन समस्या का सामना कर रहे हैं। यदि हम वास्तव में इस समस्या का समाधान खोजना चाहते हैं, तो हमें चाहे कितनी भी मुश्किलों और परेशानियों का सामना करना पड़े, हमें उत्तर की तलाश जारी रखनी चाहिए। इसी तरह, जो यीशु पर विश्वास करते हैं और अभी तक उसमें प्रवेश नहीं किया है, उन्हें पानी और आत्मा के सुसमाचार में प्रकट परमेश्वर की धार्मिकता की खोज करनी चाहिए। 
कुछ लोग मसीही धर्म को दुनिया के कई धर्मों में से एक मानते हैं, और क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत जैसे सिद्धांतों पर विश्वास करके अपने पापों का समाधान खोजने का प्रयास करते हैं। लेकिन वे जल्द ही महसूस करेंगे कि न तो ऐसे सिद्धांत  और न ही उनकी अपनी धार्मिकता उनके पापों को शुद्ध कर सकती है। इसके बजाय वे पाएंगे कि पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करने के द्वारा उनकी पाप की समस्या को आसानी से हल किया जा सकता है। 
यदि आप एक सच्चे मसीही बनना चाहते हैं, तो आपको अपने हृदय में पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करके परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करना चाहिए। लेकिन धार्मिक लोग अपने स्वयं के कार्यों के साथ पाप की सभी समस्याओं को हल करने के प्रयास में, क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत और औचित्य के सिद्धांत जैसे सिद्धांतों को मापकर परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ऐसा विश्वास पश्चाताप की प्रार्थनाओं पर भरोसा करने के लिए होता है, जो अंततः उन्हें उनके निश्चित विनाश से नहीं बचा सकता क्योंकि जब भी वे ऐसी प्रार्थनाओं का सहारा लेते हुए अपने पापों को देखते हैं तो वे अधिक से अधिक पापी हो जाते हैं। 
परन्तु जो लोग पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करते हैं, भले ही वे शरीर में कमजोर हों, उन्होंने परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करके पाप की सभी समस्याओं का समाधान किया है। जिन लोगों ने इस प्रकार विश्वास करके परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त की है, उनके मन में कोई पाप नहीं है, और इस तरह, उनके लिए कोई दण्ड नहीं है।
 

क्योंकि परमेश्वर की धार्मिकता यीशु में है
 
वचन २ कहता है, “क्योंकि जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने मसीह यीशु में मुझे पाप की और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र कर दिया।” परमेश्वर ने मनुष्य को दो व्यवस्था दी हैं, यीशु में जीवन की आत्मा की व्यवस्था और पाप और मृत्यु की व्यवस्था। जैसा कि पौलुस हमें बताता है, जीवन की आत्मा की व्यवस्था ने हमें पाप और मृत्यु की व्यवस्था से हमारे सभी पापों से मुक्त किया है। नया जीवन प्राप्त करने के लिए आपको पौलुस द्वारा बोले गए इस सत्य को जानना और समझना चाहिए। यह सत्य इस संसार में सभी पर समान रूप से लागू होता है।
हम भी जीवन के आत्मा की व्यवस्था पर विश्वास करने के द्वारा पाप और मृत्यु की व्यवस्था से स्वतंत्र किए गए हैं; अन्यथा, हम पाप और मृत्यु की व्यवस्था के अधीन अपने निश्चित विनाश तक पहुँच जाते। लेकिन हमारे ह्रदय में यीशु में परमेश्वर की धार्मिकता पर विश्वास करने के द्वारा - अर्थात, यीशु का बपतिस्मा और क्रूस पर उसका लहू - हमने उसकी धार्मिकता प्राप्त की है, जीवन की आत्मा व्यवस्था के तहत आए हैं, और हमारे लिए तैयार किया हुआ अनन्त जीवन प्राप्त किया है। तो फिर, आप पानी और आत्मा के सुसमाचार को कहां पा सकते हो जो आपके सब पापों को माफ़ कर सकता है? यह यीशु ने यूहन्ना से लिए हुए बपतिस्मा और जूस क्रूस पर उसने लहू बहाया था उसमे है। दुसरे शब्दों में, परमेश्वर की धार्मिकता पानी और आत्मा के सुसमाचार में पाई जाती है।
तो फिर, परमेश्वर की धार्मिकता का सुसमाचार क्या है जो हमें पाप और मृत्यु की व्यवस्था से मुक्त करता है? यह सुसमाचार है कि हमें हमारे पापों से छुडाने के लिए हमारे प्रभु इस पृथ्वी पर पैदा हुए, जगत के सारे पापों को अपने ऊपर उठाने के लिए तीस साल की उम्र में यूहन्ना से बपतिस्मा लिया, क्रूस पर चढ़ाया गया, और मृत्यु से जीवित हुआ—यह परमेश्वर की धार्मिकता से बना हुआ सुसमाचार है।
यह जानते हुए कि मनुष्यजाति अपनी कमजोरी के कारण पाप करने के लिए बाध्य थी, परमेश्वर ने सभी पापियों को उनके पापों से बचाने के लिए उन्हें उद्धार का सुसमाचार देने की योजना बनाई जो उन्हें पाप और मृत्यु की व्यवस्था से मुक्त कर सकता है। यह ठीक वही प्रायश्चित का सुसमाचार है जो यूहन्ना द्वारा यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू में पाया जाता है। इस सुसमाचार में विश्वास करने से, सभी मनुष्य अपने पापों की मृत्यु की व्यवस्था से मुक्त हो सकते हैं—परमेश्वर की यह धार्मिकता जीवन की व्यवस्था है जिसने मनुष्यजाति को उसके सभी पापों से छुड़ाया है।
परमेश्वर ने मनुष्य को व्यवस्था का वचन दिया है और यह निर्धारित किया है कि उसकी व्यवस्था के अनुसार जीने में कोई भी विफलता पाप होगा। साथ ही, परमेश्वर ने एक व्यवस्था भी निर्धारित की है जो पापियों को उनके पापों से मुक्ति दिला सकती है। उद्धार की यह व्यवस्था परमेश्वर की धार्मिकता में छिपा हुआ सत्य है, अनुग्रह का नियम जो उन सभी को अनन्त जीवन देता है जो इसमें विश्वास करते हैं। परमेश्वर ने मनुष्यजाति के लिए जो प्रायश्चित की व्यवस्था निर्धारित की है, वह पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास की व्यवस्था है—अर्थात, यीशु का बपतिस्मा और क्रूस पर उसका लहू—और यह विश्वास जीवन की व्यवस्था है जो उन्हें परमेश्वर की धार्मिकता दे सकती है। 
तो फिर, कौन जीवन की इस व्यवस्था के विरुद्ध हो सकता है? जो कोई भी परमेश्वर के द्वारा दी गए पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करता है, वह दुनिया के सभी पापों से मुक्त हो जाएगा, और इस विश्वास से वह परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करेगा।
परमेश्वर ने आपको जीवन के आत्मा की व्यवस्था कैसे दी है? अपने पुत्र यीशु को इस धरती पर भेजकर, जो एक कुंवारी से पैदा हुआ, यूहन्ना द्वारा उसके बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को उस पर डाल कर, इन पापों की मजदूरी के लिए उसे क्रूस पर मरने के द्वारा, और उसे मृत्यु से पुनरुत्थित करने के द्वारा — इस प्रकार, संसार के सभी पापों का नाश किया और यीशु को पापियों का उद्धारकर्ता बनाया। उन सभी को जो इस सत्य में विश्वास करते हैं, परमेश्वर ने माफ़ी और नया जीवन दिया है, और यह जीवन की आत्मा की व्यवस्था है जो परमेश्वर ने हमें दी है।
तो फिर, पाप और मृत्यु की व्यवस्था क्या है? यह वो आज्ञा है जो परमेश्वर ने मनुष्यजाति को दी है। परमेश्वर द्वारा निर्धारित व्यवस्था "क्या करना है और क्या नहीं करना है" पर उसकी आज्ञाओं का विवरण देता है और इन आज्ञाओं से कोई भी विचलन इसे पाप बना देगा, जिसकी मृत्यु की मजदूरी नरक में दण्ड के द्वारा चुकाई जानी चाहिए।
इस प्रकार सभी लोगों को मृत्यु की व्यवस्था के तहत रखा गया था, लेकिन यीशु मसीह ने हमें अपने बपतिस्मा और क्रूस पर बहाए लहू के द्वारा मृत्यु की इस व्यवस्था से बचाया है। यीशु के सिवा और कोई नहीं जो पापियों को उनके पापों से बचा सकता है, और उसके द्वारा दी गए पानी और आत्मा के सुसमाचार के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, जो हमें हमारे सभी पापों से बचा सकता है। इसलिए आपको यह जानना और विश्वास करना चाहिए कि यीशु इस पृथ्वी पर आपको बचाने के लिए कैसे आया, और परमेश्वर की धार्मिकता क्या है। 
आजकल, हालाँकि, ऐसे कई लोग हैं जो यीशु में विश्वास का दावा करते हैं और जिनके पास व्यवस्था का अत्यधिक ज्ञान हैं - अर्थात, पाप और मृत्यु की व्यवस्था - और फिर भी वे पानी और आत्मा के सुसमाचार से पूरी तरह से अनजान हैं जिसने उन्हें उनके सभी पापों से बचाया है। बहुत से लोग अभी भी इस अज्ञानता के साथ यीशु पर विश्वास करना जारी रखते हैं। इससे, हम देख सकते हैं कि पानी और आत्मा का सुसमाचार कितने समय से छिपा हुआ है। पानी और आत्मा का यह सुसमाचार उस सुसमाचार से भिन्न है जिसमें केवल क्रूस पर का विश्वास निहित है। बहुत से लोग केवल क्रूस पर यीशु के लहू को बहुत महत्व देते हैं, लेकिन पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि यीशु ने क्रूस पर लहू बहाया क्योंकि जब उसे यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा दिया गया तब उसने जगत के सारे पापों को अपने ऊपर उठाया, ना की तब जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया। 
आपको यह समझना चाहिए कि ज्ञान का यह अंतर स्वर्ग और नर्क में जाने के बीच के अंतर के सामान है। यह एक मामूली अंतर की तरह लग सकता है, लेकिन ये दोनों समझ एक-दूसरे से बहुत अलग हैं, जिसके मूल रूप से अलग-अलग परिणाम हैं। यही कारण है कि जब आप यीशु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में विश्वास करना चाहते हैं, तो आपको अपने विश्वास को पानी और आत्मा के सुसमाचार के आसपास केन्द्रित करना चाहिए। ऐसा करने से ही आप अपने सभी पापों से मुक्ति पा सकते हैं। और फिर भी बहुत से लोग जो आजकल यीशु में विश्वास का दावा करते हैं, वे परमेश्वर की धार्मिकता से अनजान बने रहते हैं।
ऐसे लोग यथासंभव कम से कम पाप करने का प्रयास करके और स्वयं के लिए पवित्र होने का प्रयास करके परमेश्वर के सामने खड़े होने का प्रयास करते हैं। लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे मनुष्य के अपने विचारों, प्रयासों या कार्यों से प्राप्त किया जा सकता है। केवल पानी और आत्मा के सत्य में छिपे प्रायश्चित के सत्य में विश्वास करके ही व्यक्ति परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त कर सकता है। जो लोग व्यवस्था का पालन करके खुद को पवित्र करने की कोशिश करते हैं, उनका विश्वास एक मूर्खतापूर्ण विश्वास है। ऐसा कोई नहीं है जो व्यवस्था की सभी आवश्यकताओं का पालन कर सके। 
 

यीशु के शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा देने के द्वारा
 
वचन ३ कहता है, “क्योंकि जो काम व्यवस्था शरीर के कारण दुर्बल होकर न कर सकी, उस को परमेश्‍वर ने किया, अर्थात् अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।” हम इस भाग से यह ढूंढ सकते है की पौलुस की पानी और आत्मा की व्यवस्था की गवाही कितनी विस्तृत थी। यहाँ, पौलुस हमसे कहता है की किस प्रकार परमेश्वर पिता ने जगत के सारे पाप यीशु पर डाले: “अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।”
इसका क्या अर्थ है जब यह कहता है कि परमेश्वर ने शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी? इसका अर्थ यह है कि पिता परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को इस पृथ्वी पर भेजा, उसकी देह पर जगत के सारे पापों को डालने के लिए उसे यूहन्ना से बपतिस्मा दिया, और इस प्रकार विश्वासियों के सभी पापों को हमेशा के लिए शुद्ध कर दिया। यही कारण है कि यह कहता है कि “जो काम व्यवस्था न कर सकी…उसे परमेश्वर ने किया।” परमेश्वर ने जगत के सारे पापों को अपने पुत्र पर डालकर पापों को मिटा दिया। और उसे क्रूस पर मरने और उसकी मृत्यु से पुनर्जीवित होने के द्वारा, सभी पाप अद्रश्य हो गए।
यह सत्य का सुसमाचार है जो आपको बचाता है, और यह सुसमाचार पानी और आत्मा का सुसमाचार है। यूहन्ना ३:५ में हमारे प्रभु ने नीकुदेमुस से जो कहा, "जब तक कोई मनुष्य जल और आत्मा से न जन्मे तो वह परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता," वो यही सुसमाचार है। यह सुसमाचार जो परमेश्वर की धार्मिकता को प्रकट करता है, तब प्रकट हुआ जब यीशु को यूहन्ना के द्वारा बपतिस्मा दिया गया, क्रूस पर लहू बहाया गया, और मृत्यु से जीवित हुआ।
मत्ती ३:१५ कहता है, “यीशु ने उसको यह उत्तर दिया, “अब तो ऐसा ही होने दे, क्योंकि हमें इसी रीति से सब धार्मिकता को पूरा करना उचित है।” तब उसने उसकी बात मान ली।” यह भाग परमेश्वर की धार्मिकता और यीशु में उसकी अभिव्यक्ति की गवाही देता है। जब यीशु गलील से यरदन के किनारे यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले के पास उससे बपतिस्मा लेने आया परन्तु यूहन्ना यह कह कर उसे रोकने लगा, “मुझे तो तेरे हाथ से बपतिस्मा लेने की आवश्यकता है, और तू मेरे पास आया है?” यीशु ने उसको यह उत्तर दिया, “अब तो ऐसा ही होने दे, क्योंकि हमें इसी रीति से सब धार्मिकता को पूरा करना उचित है।” 
तो फिर, “सब धार्मिकता को पूरा करने” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि यीशु ने यूहन्ना से प्राप्त अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया। जब यीशु अपने बपतिस्मा के बाद पानी से ऊपर आया, तो उसके लिए आकाश खुल गया और परमेश्वर का आत्मा एक कबूतर की तरह उतरा। तब “यह आकाशवाणी हुई, यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।” परमेश्वर यीशु के बपतिस्मा से प्रसन्न हुआ जिसके द्वारा उसने जगत के सारे पाप अपने ऊपर ले लिए। यहाँ हम त्रिएक परमेश्वर के तीनों व्यक्तियों को एक साथ देखते हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, जिन्होंने मनुष्यजाति को उसके पापों से बचाने और इस वादे को पूरा करने का निर्णय लिया है।
पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि जब यीशु ने बपतिस्मा लिया तो उसके लिए स्वर्ग खुल गया और स्वर्ग से यह आकाशवाणी हुई की, "यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ।" कहने का तात्पर्य यह है कि, परमेश्वर पिता इस तथ्य से प्रसन्न थे कि उसके पुत्र ने यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लेने के द्वारा एक ही बार में जगत के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया। क्योंकि यीशु ने इस प्रकार बपतिस्मा लिया था, और क्योंकि उसके बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को उसकी देह पर रखा गया था, उसने क्रूस पर चढ़कर और मृत्यु से जीवित होकर सब धार्मिकता को पूरा किया। 
दूसरे शब्दों में, यीशु को परमेश्वर की सब धार्मिकता को पूरा करने के लिए यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा दिया गया था। फिर वह क्रूस पर मरा। यह बपतिस्मा और यह मृत्यु परमेश्वर की सभी धार्मिकता को पूरा करने के लिए थी। यीशु ने अपने बपतिस्मा के साथ जगत के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया, और इस तरह वह क्रूस पर लहू बहा सका। और मृत्यु से पुनरुत्थित होकर, उसने परमेश्वर की सभी इच्छाओं को पूरा किया।
"परमेश्वर की सब धार्मिकता" का अर्थ मनुष्यजाति को उसके सभी पापों से छुड़ाने का कार्य है। इस नेक कार्य को पूरा करने के लिए, यीशु ने अपने बपतिस्मा के द्वारा सभी लोगों के पापों को अपने ऊपर ले लिया और क्रूस पर लहू बहाया। परमेश्वर की सब धार्मिकता सबसे न्यायपूर्ण और उचित तरीके से पूरी हुई। बपतिस्मा, लहू, और यीशु के पुनरूत्थान ने परमेश्वर की धार्मिकता को पूरा किया है, और परमेश्वर की इस धार्मिकता ने हमें पापरहित बना दिया है, हमें परमेश्वर की पप्रचुर धार्मिकता प्रदान की है। त्रिएक परमेश्वर ने इसकी योजना बनाई, यीशु ने इसे पूरा किया, और पवित्र आत्मा अब भी इसकी धार्मिकता की गवाही देता है। आपको उस वचन पर विश्वास करना चाहिए की परमेश्वर ने “अपने ही पुत्र को पापमय शरीर की समानता में और पापबलि होने के लिये भेजकर, शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी।”
अपने आप से पूछें। अपने आप से पूछें कि क्या आपको लगता है कि आप वास्तव में अपने पूरे जीवन भरव्यवस्था के सभी आदेशों का पूरी तरह से पालन कर सकते हैं। बेशक, आप उनका पालन करने की पूरी कोशिश करेंगे, लेकिन आप कभी भी पूरी तरह से व्यवस्था के अनुसार नहीं जी पाएंगे। जब आप व्यवस्था के छोटे से छोटे विवरण को तोड़ते हैं, तो आप सारी व्यवस्था को तोड़ रहे होते हैं (याकूब २:१०), और यही कारण है कि बिना किसी अपवाद के प्रत्येक व्यक्ति व्यवस्था के अधीन एक पूर्ण पापी के रूप में समाप्त हो जाता है। 
आप व्यवस्था का पालन करने और अपना सर्वश्रेष्ठ करने की अपनी इच्छा में विश्वासयोग्य हो सकते हैं, लेकिन परमेश्वर की धार्मिकता जो वह हमसे मांगते हैं वह व्यवस्था का पालन करने से कभी भी प्राप्त नहीं होती है। आपको यह अवश्य समझना चाहिए कि परमेश्वर ने हमें अपनी व्यवस्था क्यों दी, इसका एकमात्र कारण यह है कि हम अपने पापों को पहचान सकें। क्योंकि हम अपने शरीर में कमजोर हैं, कोई भी परमेश्वर की व्यवस्था का पूरी तरह से पालन नहीं कर सकता है।
यही कारण है कि परमेश्वर ने हमें हमारे पापों से पूरी तरह छुड़ाने के लिए अपने पुत्र को इस पृथ्वी पर भेजा और सभी के पापों को उठाने के लिए यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लिया। दुसरे शब्दों में, उसके बपतिस्मा लेने के द्वारा, जगत के सारे पाप उसकी देह पर डाले गए थे। यही कारण है कि पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर ने यीशु के "शरीर में पाप पर दण्ड की आज्ञा दी ", और इस तरह परमेश्वर ने हमें पापरहित बनाया है।
हमें यह जानना और विश्वास करना चाहिए कि कैसे परमेश्वर ने हमारे पापों को दूर कर दिया है। मनुष्यजाति के प्रतिनिधि यूहन्ना द्वारा अपने पुत्र को बपतिस्मा देने के द्वारा, परमेश्वर ने हमारे सभी पापों को यीशु पर डाल दिया। उसके बाद उन्होंने यीशु को जगत के सभी पापों को क्रूस पर ले जाने के लिए कहा, और हमारे बदले पापों की मजदूरी का भुगतान करने के लिए लहू बहाया और उस पर मर गया। और मृत्यु से अपने पुनरुत्थान के द्वारा, उसने उन सभी के लिए छुटकारे का मार्ग खोल दिया जो इसमें विश्वास करते हैं। परमेश्वर ने इस प्रकार योजना बनाई है और इस प्रकार पाप से हमारे उद्धार को पूरा किया है। 
इसलिए हमें अपने ह्रदय में विश्वास करना चाहिए कि यीशु का बपतिस्मा और क्रूस पर उनका लहू हमारे प्रायश्चित के लिए था। जो लोग परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं, उन्हें निश्चित रूप से यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उनके लहू पर विश्वास करना चाहिए। 
आपको भी, अपने सारे पापों की माफ़ी प्राप्त करने के लिए और सम्पूर्ण धर्मी और पापरहित बनने के लिए इसी प्रकार विश्वास करना चाहिए। आपको सही रूप से समझना चाहिए कि कैसे परमेश्वर ने आपके पापों को दूर कर दिया है, और अपने प्रयासों पर विश्वास करने के बजाए परमेश्वर की इच्छा का पालन करे और उस पर विश्वास करे।