उपदेश

विषय ९ : रोमियों (रोमियों की पत्री किताब पर टिप्पणी)

[अध्याय 8-9] ( रोमियों ८:२८-३० ) सब बाते मिलकर भलाई को ही उत्पन्न करती है

( रोमियों ८:२८-३० )
“हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं। क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे। फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।” 
 

आज, हम रोमियों अध्याय ८ में उपरोक्त भाग पर विचार करना चाहेंगे। ऐसा कहा जाता है कि परमेश्वर ने हमें जो यीशु मसीह में है नियत किया, बुलाया, और महिमा दी है। हम इसके बारे में बात करेंगे, और यह भी बताएंगे कि लोग कैसे क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत को समझते हैं।
रोमियों ८:२८ कहता है, “हम जानते हैं कि जो लोग परमेश्‍वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं; अर्थात् उन्हीं के लिये जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं।” हमें उनके बारें में सोचना है “जो परमेश्वर को प्रेम करते है”। 
क्या वास्तव में सब बातें मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती हैं? परमेश्वर ने ऐसा ही कहा है। आदि में, परमेश्वर ने मनुष्यों को बनाया उससे पहले, उसने अपने उद्देश्य के अनुसार हमें अपने लोग बनाने की योजना बनाई और अपने एकलौते पुत्र यीशु मसीह में भलाई के लिए ऐसा किया। 
हमें यह याद रखना होगा कि अदन की वाटिका में भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष था। "परमेश्वर ने यह पेड़ क्यों लगाया? अच्छा होता कि परमेश्वर ने पहले भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष न लगाया होता।” बहुत से लोग इस बिंदु को लेकर उत्सुक हैं। 
लेकिन यह परमेश्वर का गहरा उद्देश्य और योजना थी। परमेश्वर ने लोगों को अपने स्वरुप में रचाने के लिए उन्हें बनाया। वास्तव में, जब तक हमें परमेश्वर की धार्मिकता प्राप्त नहीं हुई, तब तक मनुष्यजाति शेष सृष्टि से भिन्न नहीं थी।
 

परमेश्वर ने भले और बुरे के ज्ञान का पेड़ क्यों लगाया?

इसलिए हमें इसका कारण जानना चाहिए कि परमेश्वर ने आदम और हव्वा को भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल न खाने की आज्ञा क्यों दी। क्या कारण था? यह मनुष्य को परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन रखना और यीशु मसीह के द्वारा हमें छुड़ाकर हमें उसकी सन्तान बनाना था। परमेश्वर की सारी धार्मिकता वचन में छिपी हुई है, "जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिये सब बातें मिलकर भलाई ही उत्पन्न करती हैं।" चूँकि परमेश्वर ने कहा, "जो लोग परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, उनके लिए जो उसकी इच्छा के अनुसार बुलाए हुए हैं, सब बातें मिलकर भलाई ही उत्पन्न करती हैं" (रोमियों ८:२८), हमें इस प्रश्न का उत्तर यीशु मसीह के द्वारा दी गई पानी और आत्मा के सुसमाचार में खोजना चाहिए। 
ऐसा करने के लिए, हमें पहले परमेश्वर के सुसमाचार को स्वीकार करना चाहिए। तब हमें एहसास होगा कि परमेश्वर जो भी योजना बनाते है और करता है वह सब अच्छा है। परन्तु इस सत्य को समझने के लिए, हमें पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास के द्वारा नया जन्म लेना होगा। हमें उस उत्तर को सुसमाचार में खोजना चाहिए जो परमेश्वर ने हमें दिया है। 
परमेश्वर ने हमें बनाया, अदन की वाटिका में भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष लगाया, आदम और हव्वा को उसमें से खाने की अनुमति दी, और हमें व्यवस्था की जानकारी दी उसका कारण यह था की वह हमें अपनी सन्तान बनाना चाहता है। हमारे प्रभु, जिन्होंने हम सभी को छुड़ाया, यह सब होने दिया ताकि वह हमें पापों की क्षमा, अनन्त जीवन, महिमा और स्वर्ग दे सकें। परमेश्वर ने मनुष्य को मिट्टी से बनाया, और मनुष्यजाति को कमजोर होने के लिए बनाया और पैदा हुई थी। बाइबल अक्सर हमारी तुलना मिट्टी के बर्तनों से करती है। परमेश्वर, जो कुम्हार है, उसने मनुष्य को मिट्टी से बनाया है। उसने मनुष्य को मिटटी से बनाया और उसमें पानी और आत्मा का प्रेम फूंक दिया। परमेश्वर ने हमें पानी और आत्मा का सत्य दिया है, कि वह हमें अपनी सन्तान बनायें।
मिट्टी से बने बर्तन आसानी से टूट जाते हैं। इस तरह, परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य के शरीर और आत्मा को कमजोर बनाया ताकि उसे अपनी सन्तान बनाया जा सके। उसका उद्देश्य यीशु द्वारा पूरा किया गया, जिसने मनुष्यजाति के सभी पापों को धो दिया और उन्हें परमेश्वर की पवित्रता के कपड़े पहनाए, ताकि उन्हें पानी और आत्मा के सुसमाचार के साथ नया जन्म लेने के लिए उन्हें अनन्त जीवन दिया जा सके। इसलिए परमेश्वर ने हमें शुरू से ही दोषरहित न होकर अपरिपूर्ण और कमजोर बनाया है। 
 

परमेश्वर ने क्यों आदि में मनुष्य को कमजोर बनाया?

परमेश्वर ने भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष अदन में क्यों लगाया और आदम और हव्वा को उसका फल न खाने की आज्ञा क्यों दी? इसके पीछे के कारण को पानी और आत्मा के सुसमाचार के भीतर समझना और विश्वास करना चाहिए। जब आदम और हव्वा गिरे और पाप किया तो परमेश्वर ने यह क्यों कहा कि स्त्री का वंश शैतान के सिर को कुचल देगा और शैतान उसकी एड़ी को डसेगा? ये सब चीज़ें लोगों को अपनी सन्तान बनाने के लिए थीं। यीशु मसीह, उनके एकलौते पुत्र में हमारे लिए यह उनकी योजना थी। 
तो फिर, परमेश्वर के उद्देश्‍य के अनुसार “बुलाए गए” कौन हैं? वे वो हैं जो अपने पापों और अधर्मों को स्वीकार करते हैं और परमेश्वर के प्रेम और दया की खोज करते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि बिना शर्त चुनाव के सिद्धांत और क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत के धार्मिक दावे गलत हैं। बिना शर्त चुनाव का सिद्धांत गलत है क्योंकि हमारे परमेश्वर उस तरह के परमेश्वर नहीं हैं जो बिना किसी कारण के दूसरों को छोड़कर बिना शर्त किसी को चुन लेते हैं। 
लेकिन, वे जिन्हें परमेश्वर चुनता है और बुलाता है, वे हैं जो अपने पापों से निराश हैं और स्वीकार करते हैं कि उनके पास नरक में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है—यह वो लोग हैं जिन पर परमेश्वर की दया है और जिन्हें वह पानी और आत्मा के अपने सुसमाचार के साथ बुलाते हैं।
अनगिनत लोगों में से जो इस दुनिया में पैदा हुए हैं और परमेश्वर के पास लौट आए हैं, उनमें से एक भी बिना किसी कारण के परमेश्वर द्वारा चुना या त्यागा नहीं गया है। यदि परमेश्वर ने आपको बिना किसी कारण के नहीं चुना, तो आप परमेश्वर के खिलाफ विरोध करेंगे। यह कहना बकवास होगा कि परमेश्वर ने आपको या किसी को बिना किसी कारण के शैतान की सन्तान बनाया है। यह वह नहीं है जो परमेश्वर ने किया है। 
यदि आप परमेश्वर द्वारा नहीं चुने गए हैं, तो इसका कारण यह है कि आप पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास नहीं करते हैं। यदि आप परमेश्वर के द्वारा दी गए पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास नहीं करते है, तो परमेश्वर आपको छोड़ देगा, क्योंकि हमारे प्रभु ने कहा, "क्योंकि मैं धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को मन फिराने के लिये बुलाने आया हूँ" (मत्ती ९:१३)। दुर्भाग्य से, धर्मशास्त्रियों ने जो किया है, वह हमारे परमेश्वर को एक कट्टर और पूर्वाग्रही परमेश्वर में बदलना है। 
 

परमेश्वर की इच्छा के अनुसार किसे बुलाया गया है?

जिन्हें परमेश्वर ने बुलाया है वे पापी हैं जो नरक में बंधे हैं। वे परमेश्वर के पास आते हैं और स्वीकार करते हैं कि वे नरक में जाने के योग्य हैं क्योंकि वे कमजोर हैं और उनके पास मरने तक उसकी आज्ञाओं की अवज्ञा करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। परमेश्वर ने पापियों को बुलाया और उनके पापों को पानी और आत्मा के सुसमाचार से शुद्ध किया। उसने उन लोगों को बुलाया जिनके पास नरक में भेजे जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था और उन्हें पानी और आत्मा के सुसमाचार के साथ उनके पापों से छुड़ाया।
परमेश्वर उन लोगों को बुलाने नहीं आया जो अच्छे हैं और व्यवस्था के आज्ञाकारी हैं। परमेश्वर उन लोगों को बुलाता है जो वास्तव में उसकी इच्छा के अनुसार जीने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन स्वीकार करते हैं कि उनकी कमजोरियाँ उन्हें पाप करने के लिए मजबूर करती हैं, हालाँकि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं और उस पर निर्भर रहते हैं। परमेश्वर का उद्देश्य दुर्बलों, कमजोर और अशक्त लोगो को बुलाकर उन्हें धर्मी बनाना, उन्हें अपनी सन्तान बनाना है। यह उसकी इच्छा के अनुसार परमेश्वर की बुलाहट है। जो उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाए जाते हैं, उनके लिए सभी चीजें एक साथ मिलकर भलाई ही को उत्पन्न करती है।
हमें परमेश्वर की बुलाहट पर विश्वास करना चाहिए। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि हम बिना किसी कारण के यीशु पर विश्वास करते हैं। ऐसा विश्वास उचित विश्वास नहीं है। उचित विश्वास परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार प्रभु में विश्वास करना है, अपने स्वयं के उद्देश्य के अनुसार नहीं। इसका अर्थ है कि यह विश्वास करना कि परमेश्वर हमारी कमजोरियों को अच्छी तरह जानता है, कि उसने हमारे पापों को हमेशा के लिए दूर कर दिया, और इस प्रकार उसने हमें पापरहित बना दिया। परमेश्वर के उद्देश्य, यीशु मसीह का बपतिस्मा और लहू पर अपना विश्वास स्थापित करके, हम उसकी सन्तान बन सकते हैं। जब हम उसके उद्देश्य को समझते हैं और उसे स्वीकार करते हैं, तो यह परमेश्वर की इच्छा है कि वह हमें अपनी पापरहित सन्तान बनाए—ये वे लोग हैं जिनसे परमेश्वर वास्तव में प्रेम करता है, और जिन्हें वह बुलाता है।
 

परमेश्वर के द्वारा चुने हुए लोग कौन है?

परमेश्वर के पास लोग दो पंक्तियों में नहीं खड़े है और प्रत्येक व्यक्ति को उसके दाहिने ओर यह कहते हुए चुनें, "आओ और यीशु पर विश्वास करो और स्वर्ग में जाओ," और फिर बाईं ओर मुड़कर उनसे कहे, "नरक में जाओ।" 
केल्विनवादियों का दावा है कि परमेश्वर ने कुछ लोगों को बिना किसी कारण के चुना और बाकी को शुरू से ही छोड़ने का फैसला किया। लेकिन परमेश्वर ऐसा नहीं है। परमेश्वर ने उन लोगों के लिए सब कुछ मिलकर भलाई के लिए कार्य किया, जिन्हें उसके उद्देश्य के अनुसार बुलाया गया है। यह सोचना बकवास है कि हमें बिना किसी कारण के बिना शर्त चुना गया। 
तो क्या परमेश्वर अन्यायी परमेश्वर है? हरगिज नहीं। परमेश्वर और उसकी व्यवस्था दोनों के सामने प्रत्येक व्यक्ति समान है। न्याय से पहले भी सब बराबर हैं। हमें परमेश्वर से उद्धार का अनुग्रह प्राप्त हुआ है, जिसने हमें यीशु मसीह के द्वारा हमारे पापों से बचाया। इस सत्य पर विश्वास करने का अवसर भी सबके लिए समान है। वह उन लोगों को पानी और आत्मा के सुसमाचार को समझाने और स्वीकार करने की अनुमति देता है जो परमेश्वर के उद्देश्य को स्वीकार करते हैं और अपनी कमजोरियों को जानते है।
तो फिर, सच्चा ईश्‍वरीय पूर्वनियति और चुनाव क्या हैं? वे हमारे लिए पानी और आत्मा के सुसमाचार में परमेश्वर की इच्छा के अनुसार हमें बुलाए जाने के लिए है जो उसने हमें दिया है। यह इसलिए था क्योंकि परमेश्वर ने यीशु के द्वारा हमारे पापों को दूर किया और हमें अपनी संतान बनाने की योजना बनाई कि हम इस दुनिया में पैदा हुए और हमें सुसमाचार सुनने का मौका दिया गया। परमेश्वर ने पहले से ही यीशु मसीह में यह योजना बनाई है। यह परमेश्वर की योजना थी। जब हम परमेश्वर की उपस्थिति में आते हैं, तो हमें पहले विचार करना चाहिए कि हम याकूब के जैसे है या एसाव की तरह। 
पवित्रशास्त्र हमें बताता है कि परमेश्वर याकूब से प्रेम करता था जबकि वह एसाव से घृणा करता था। यह कैन और हाबिल के बारे में भी बात करता है, और यह कि परमेश्वर हाबिल से प्यार करता था लेकिन कैन से नफरत करता था। क्या परमेश्वर ने एसाव और कैन से घृणा की और याकूब और हाबिल से अकारण प्रेम किया? नहीं। ऐसा इसलिए था क्योंकि एसाव और कैन ने केवल अपनी ताकत पर भरोसा किया और कभी भी परमेश्वर की दया नहीं मांगी, जबकि याकूब और हाबिल को अपनी कमजोरियों के बारे में पता था, उसने परमेश्वर की दया मांगी, और उसके वचन पर भरोसा किया। 
एक उदाहरण के रूप में इन लोगों का उपयोग करके पवित्रशास्त्र परमेश्वर के पूर्वनियति और चुनाव की व्याख्या करता है। हम किस पक्ष के हैं? यदि हम एसाव की तरह अपनी ताकत पर भरोसा रखें तो क्या हम परमेश्वर से मिल सकते हैं? हम नहीं मिल सकते! परमेश्वर से मिलाने का एकमात्र तरीका है परमेश्वर की दया से भरे हुए पानी और आत्मा के सुसमाचार से उसे मिलना। हम दोनों में से किस तरफ परमेश्वर के सामने खड़े हैं? हम वही हैं जो परमेश्वर की उपस्थिति में आशीष पाना चाहते हैं, लेकिन अपनी कमजोरियों के कारण हमेशा ऐसा करने में असफल रहते हैं। यद्यपि हम परमेश्वर के उद्देश्य के अनुसार जीना चाहते हैं, फिर भी हम परमेश्वर के सामने कमजोर और दुर्बल हैं, और इसलिए केवल एक चीज जो हम मांग सकते हैं वह है उसकी दया। 
यदि हम परमेश्वर द्वारा आशीष पाना चाहते हैं, तो हमें याकूब के समान बनना होगा, और वह विश्वास रखना होगा जो हाबिल में था। हमें परमेश्वर के सामने इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि हम कमजोर, दुर्बल और कायर हैं। 
भजन संहिता १४५:१४ कहता है, "यहोवा सब गिरते हुओं को सम्भालता है, और सब झुके हुओं को सीधा खड़ा करता है।" वास्तव में, हर कोई परमेश्वर की उपस्थिति में झुकता है। हमारे अन्दर कोई सामर्थ नहीं है। हम छोटे से छोटे लाभ के लिए समझौता करते हैं। हम दास हैं। हम कभी-कभी साहसी लग सकते हैं, लेकिन यह केवल एक सेकंड के लिए होता है। यदि हम अपने जीवन को करीब से देखें, तो हम आसानी से पता लगा सकते हैं कि हम कितने गुलाम हैं। हम उन मजबूत और यहां तक कि असत्य प्राणियों के प्रति समर्पण करते हैं जो हमें सत्य को त्यागने के लिए मजबूर करते हैं। परन्तु परमेश्वर ने दासों को उन से प्रेम करने और उन्हें यीशु मसीह में उद्धार देने के लिये बुलाया है, और उस ने उन्हें अपनी सन्तान बनाया है।
हमें यह समझने की जरूरत है कि हम कितने कमजोर और पापी हैं ताकि हम परमेश्वर से प्रेम करें। हमें पूछना होगा कि क्या हम वास्तव में व्यवस्था का पालन उसकी पूर्ण संतुष्टि के साथ कर सकते हैं। तब हमें तुरंत इस बात का अहसास होना चाहिए कि हम व्यवस्था का पालन करने में सक्षम नहीं हैं, और इस तरह, हम सिद्ध जीवन नहीं जी सकते। 
यदि मैं सिद्ध होता, तो मुझे कभी भी उद्धारकर्ता की आवश्यकता नहीं होती। यदि हम सिद्ध होते, तो हमें परमेश्वर की सहायता और आशीषों की आवश्यकता क्यों पड़ती? ऐसा इसलिए है क्योंकि हम परमेश्वर के सामने इतने कमजोर हैं कि हमें उनके आशीष की आवश्यकता है। हमें उसकी दया चाहिए। हम पर परमेश्वर की करुणा इतनी प्रबल थी कि उसने अपने एकलौते पुत्र को भेजा और हमारे सारे पाप साफ़ करने के लिए उन्हें उसके ऊपर दाल दिए। और परमेश्वर ने हमारे बदले यीशु पर पाप के लिए न्याय पारित किया ताकि हम पाप से मुक्त हो सकें। यही हमें विश्वास करना चाहिए।
इसी विश्वास से ही हम परमेश्वर की प्यारी संतान बन सकते हैं। यह इस दया के कारण है कि हम उसके प्रेम में लिपटे हुए हैं, न कि अपने स्वयं के उद्धार को प्राप्त करने के अपने प्रयासों के कारण। 
भले ही कई मसीही भविष्यवाणी और चुनाव के सिद्धांतों को सिखाते और उनका पालन करते हैं, फिर भी वे इन सिद्धांतों के बारे में चिंतित महसूस करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे लगातार सोचते हैं कि उन्हें परमेश्वर ने चुना है या नहीं। 
ये दो सिद्धांत केल्विनवादी धर्मविज्ञान का लगभग 90% हिस्सा बनाते हैं। सवाल यह है कि क्या यीशु में उनके विश्वास के बावजूद, उन्हें वास्तव में चुना गया है या नहीं, और यही बात उन्हें चिंतित करती है। लेकिन यह महत्वपूर्ण नहीं है कि आप चुने गए हैं या नहीं। लेकिन, आपके लिए महत्वपूर्ण यह है की परमेश्वर की धार्मिकता को प्राप्त करने के द्वारा उद्धार प्राप्त करने के लिए पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास करे। जिन्होंने विश्वास से परमेश्वर की यह धार्मिकता प्राप्त की है वे चुने हुए हैं।
एक बार धर्मशास्त्र के एक विद्वान थे जिन्हें रूढ़िवादी धर्मशास्त्र के विद्वानों में से एक माना जाता था। उन्होंने केल्विनवाद की शिक्षाओं को बहुत महत्व दिया, जैसे कि पूर्वनियति के सिद्धांत और ईश्वरीय चुनाव। 
एक दिन, वह इन विषयों पर व्याख्यान दे रहे थे, जब एक छात्र ने पूछा, "अच्छा, क्या आप परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं? आप कैसे जान सकते है कि परमेश्वर ने किसे चुना है?” 
धर्मशास्त्री ने उत्तर दिया, “इसे कौन जान सकता है? हम इसका पता तभी लगा पाएंगे जब हम परमेश्वर के सामने खड़े होंगे।" 
तब उस छात्र ने पूछा, "तो फिर जब आप परमेश्वर के सामने जायेंगे और वह कहेगा की मैंने आपको नहीं चुना, तब आप क्या करेंगे?" 
प्रोफेसर ने उत्तर दिया, "जो परमेश्वर ने पहले ही स्वयं तय कर लिया है उसके बारें में मैं क्या कर सकता हूँ? इसलिए मैंने कहा था कि आप तभी जान पाएंगे जब आप परमेश्वर के सामने खड़े होंगे।" 
छात्रों ने सोचा, “वह बहुत विनम्र व्यक्ति हैं। उनके जैसा महान व्यक्ति भी कहता है कि वह नहीं जानता कि वह चुना गया है या नहीं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि कोई नहीं जान सकता कि उसे चुना गया है या नहीं।"
परन्तु जिस सत्य में परमेश्वर की धार्मिकता छिपी थी वह अब स्पष्ट रूप से प्रकट हो गया है। कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य से छिपाया था, परन्तु उसने उन्हें नियत समय पर प्रकट किया। सुसमाचार प्रचारक कैसे सुसमाचार का प्रचार कर सकते हैं जब कि वे यह भी नहीं जानते कि वे बचाए गए हैं और चुने गए हैं या नहीं? जो परमेश्वर के द्वारा बुलाए गए हैं वे वही हैं जो परमेश्वर की धार्मिकता में विश्वास करते हैं। 
रोमियों ८:२९ कहता है, “क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।” परमेश्वर पिता ने हमें अपने इकलौते पुत्र, यीशु मसीह के स्वरूप के अनुरूप बनाने के लिए पहले से ही ठहरा दिया है, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे। यहाँ यीशु को “पहिलौठा” कहा गया है। यदि हम यीशु पर और पानी और आत्मा के सुसमाचार पर विश्वास करते हैं जो परमेश्वर ने हमें दिया है, तो हम अपने सभी पापों से बच जाते हैं और परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं। तब, यीशु हमारे संबंध में क्या होगा? वह हमारा सबसे बड़ा भाई होगा। वह परमेश्वर का पहिलौठा है और हम उसके छोटे भाई-बहन हैं।
बहुत समय पहले, जब मैं एक प्रार्थना घर में रहता था तब एक बुजुर्ग प्रचारक मुझसे मिलने आया था। जब वह चीन में था तभी उसने यीशु पर विश्वास करना शुरू कर दिया था और फिर वह कोरिया आया। मैंने एक दिन उसे प्रार्थना करते हुए सुना, और उसने यही कहा: "भाई यीशु और पिता परमेश्वर, मुझे बचाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। भाई यीशु, कृपया मेरी मदद करें।” यीशु हमारा भाई है!
हम पूछ सकते हैं कि क्या परमेश्वर हमारे बारे में सब कुछ जानता है। इसका उत्तर है हाँ, वह हमारे बारे में सब कुछ जानता है। परमेश्वर पिता हमारे बारे में सब कुछ जानता है। उसने इस संसार की उत्पत्ति से पहले ही अपने एकलौते पुत्र के माध्यम से हमें हमारे पापों से बचाने की योजना बनाई थी। यह परमेश्वर की योजना थी। उसका पुत्र यीशु दुनिया में आया, हमें हमारे पापों से बचाने के लिए बपतिस्मा लिया और क्रूस पर चढ़ाया गया। परमेश्वर ने इसकी योजना पहले ही बना ली थी। 
हम कह सकते हैं कि संसार की स्थापना से पहले, परमेश्वर ने एक "त्रिपक्षीय सम्मेलन" का आह्वान किया था। त्रिएक परमेश्वर—पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा—ने उन लोगों को छुड़ाने की योजना बनाई जो उसकी धार्मिकता में विश्वास करते हैं। उसकी योजना लोगों को बनाने और उन्हें अपने पूर्ण राज्य में उनके साथ रहने के लिए अपनी संतान बनाने की थी।
पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी योजना पर सहमत हुए। फिर, यह सोचने की प्रक्रिया में कि कैसे उसे मनुष्य की रचना करनी चाहिए और मनुष्यजाति को अपनी संतान बनाना चाहिए, परमेश्वर ने पुत्र, यीशु को संसार में भेजने और उसे बपतिस्मा लेने और क्रूस पर चढ़ाने की योजना बनाई, ताकि वे उसके पुत्र के स्वरुप के अनुरूप बना सके।
हमें बनाने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य क्या था? हमें उनकी संतान बनाना था। क्या यीशु परमेश्वर का पहिलौठा है? हाँ, वह है, और क्योंकि हम परमेश्वर की सन्तान बन गए हैं, हम भी उसके भाई हैं। 
33 वर्षों तक इस पृथ्वी पर रहते हुए, यीशु ने सभी मानवीय कमजोरियों और दुर्बलताओं का अनुभव किया। इसलिए जब हम प्रार्थना करते हैं, हम कहते हैं, "यीशु, मैं बहुत कमजोर हूँ। मैं ऐसा ही हूँ। कृपया मेरी मदद करें और मेरी रक्षा करें। आपके वचन को स्वीकार करने के लिए लोगों के ह्रदय को नम्र करें, सावधान रहें, अनुग्रह दें, और उनकी मदद करें।" प्रभु हमारी प्रार्थनाओं को सुनता है और उसका उत्तर देता है। यीशु से प्रार्थना करना और परमेश्वर से प्रार्थना करना एक ही है। 
हमें बनाने के पीछे परमेश्वर का उद्देश्य क्या था? हमें उसकी सन्तान बनाना था। परमेश्वर हमारे बारे में सब कुछ जानता है। उसने हमें इस दुनिया में जन्म लेने के लिए बनाया और यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू के माध्यम से हमें हमारे सभी पापों से बचाया, क्योंकि उसने हमें दुनिया की नींव से पहले ही अपने बेटे और बेटियों के रूप में अपनाने के लिए पूर्वनिर्धारित किया था। इसलिए, वह न केवल हमारे जीवन और मृत्यु को जानता है बल्कि हमारे हर एक हलन चलन को जानता है। वह जानता है कि हम कब पैदा हुए, हम किसके साथ पैदा हुए, कब हमारी शादी हुई, कब हमारे अपने बच्चे हुए, और हमारे जीवन में हमारे साथ क्या हुआ। परमेश्वर, जो हमारे जीवन के बारे में सब कुछ जानता है, उसने हमें पानी और आत्मा का सुसमाचार दिया है ताकि हम यीशु मसीह में विश्वास कर सकें और परमेश्वर की सन्तान बन सकें।
परमेश्वर हमें पहले से जानता था और हमें ठहराया था। रोमियों ८:३० कहता है, “फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।” हमारे लिए इस भाग को समझना और उस पर विश्वास करना कितना महत्वपूर्ण है इसके बारे में बताने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। 
बहुत से लोग उपरोक्त वचन को क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत का समर्थन करने के लिए लेते हैं। इस भाग के आधार पर—कि परमेश्वर ने हमें ठहराया है, हमें बुलाया, हमें धर्मी ठहराया, और हमें महिमा दी—वे दावा करते हैं कि यही कारण है कि भले ही हमारे ह्रदय में पाप है फिर भी परमेश्वर हमें पाप रहित मानते हैं और यह कि पवित्रीकरण की एक अवधि से गुजरने के बाद, हम महिमावंत होंगे, मानो ऐसे चरण है जिनके माध्यम से हम पवित्र हो जाते हैं।
क्या परमेश्वर ने सभी पापियों को यीशु मसीह में बुलाने के लिए पहले से निर्धारित नहीं किया था? उसने हम सभी को बुलाया, और फिर भी कुछ लोग उसकी बुलाहट का जवाब नहीं देते। वे एसाव और कैन के समान हैं। ये वही हैं जिन्हें नर्क में भेजा जाता है। 
 

परमेश्वर की दया में

परमेश्वर पिता ने हमें अपने एकलौते पुत्र, यीशु मसीह में बुलाने की योजना बनाई और पानी और लहू से हमारे पापों को धोकर हमें अपने पुत्रों के रूप में गोद लेने के लिए ठहराया। जो लोग परमेश्वर के बुलाने के बाद भी परमेश्वर के पास नहीं जाते, वे परमेश्वर के उद्धार से बाहर हैं। ऐसे लोगों को उसकी कृपा से बाहर रखा गया है, जो नरक में बंधे हुए है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने परमेश्वर की बुलाहट का पालन किया। वे कहते हैं, "प्रभु, मैं इस तरह कमजोर होते हुए भी, क्या आप मेरे जैसे व्यक्ति को स्वीकार करेंगे?" 
परमेश्वर कहता है, “निश्चय ही में स्वीकार करूंगा।” 
“सच में, जबकि मैं कमजोर हूँ फिरे भी आप मेरा स्वीकार करेंगे?” 
“निश्चय ही में तुम्हारा स्वीकार करूंगा।” 
“परमेश्वर, मेरे पास आपको अर्पण करने के लिए कुछ ख़ास नहीं है और में यह भी वायदा नहीं कर सकता की अब से मैं अच्छा बनूंगा।” 
“फिर भी मैं तुम्हारा स्वीकार करूंगा।” 
“मुझे नहीं लगता की मैं अच्छा बनूँगा और ऐसा करने के लिए मेरे पास योग्यता भी नहीं है।” 
“फिर भी मैं तुम्हारा स्वीकार करूंगा।” 
“ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि आप मुझे जानते नहीं हो। आप मेरी वजह से निराश हो जायेंगे।” 
जब हम जानते हो की हम कैसे है तब क्या हम आमतौर पर शर्मिंदा महसूस नहीं करते हैं, जैसे कि हम कहीं छिपना चाहते हैं, और फिर भी कोई व्यक्ति कहता है कि वह वास्तव में हम पर विश्वास करता है? हम क्यों छिपाना चाहते हैं? हम छिपना चाहते हैं क्योंकि हम बेहतर नहीं हो पा रहे हैं और जो हमने अभी तक किया है उसे हम बरकरार भी नहीं रख सकते। 
इसलिए हम पूछते रहते हैं, "क्या आप मुझे इतना कमजोर होने पर भी स्वीकार करोगे? क्या आप सच में मुझे स्वीकार करोगे? क्या मुझे आप पर विश्वास करने की भी अनुमति है? क्या मेरे जैसा व्यक्ति पापों की क्षमा प्राप्त कर सकता है? क्या मेरे जैसा व्यक्ति धर्मी बन सकता है यहाँ तक की मैं भविष्य में भी अच्छा नहीं बन पाऊंगा?” लेकिन हमारे परमेश्वर के पास एक जंगली जैतून के पेड़ को एक अच्छे जैतून के पेड़ में बदलने की सामर्थ है।
हम मूल रूप से जैतून के पेड़ थे, जो स्वभाव से जंगली हैं, लेकिन हम उस सुसमाचार के द्वारा अच्छे जैतून के पेड़ बन गए जो यीशु ने हमें दिया है। उसने हमें यानी की जो पाप के सिवा और कुछ नहीं कर सकते उन्हें बुलाया। क्या उसने हमें तब बुलाया था जब हम थोड़े ही कमजोर थे? उन्होंने हमें तब भी बुलाया जब हम पूरी तरह से कमजोर थे। उसने हमारी बहुत ही गम्भीर कमियों और कमजोरियों के बावजूद भी हमें यीशु मसीह में बुलाया। उसने हमें बुलाया जो अशक्त थे। हमें बुलाने के बाद उसने क्या किया? उसने हमारे सब पापों को उठा लिया और हमें अपनी धार्मिकता दी ताकि हम अनंत जीवन पा सकें।
उसने यह सब कैसे किया? मत्ती के अध्याय ३ में, हमें बताया गया है कि यीशु संसार में आया और सब धार्मिकता को पूरा करने के लिए बपतिस्मा लिया जिसे परमेश्वर ने सभी ,मनुष्यजाति के लिए निर्धारित किया था। यीशु ने यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लिया, मनुष्यजाति के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया, उनके सभी पापों को सहते हुए क्रूस पर मर गए, और उन्हें जगत के पापों से बचाने के लिए तीसरे दिन मृतकों में से फिर से जी उठा। उसने हमें नया जीवन दिया, और ऐसा करके उसने हमें धर्मी ठहराया और हमारे सभी पापों को साफ़ किया। यीशु ने हमें बुलाया, हमारे पापों को पानी और लहू से धोया, हमें परमेश्वर की धार्मिकता दी, हमें पापरहित बनाया, और फिर हमें परमेश्वर की सन्तान बनाकर हमें महिमा दी, जिसे उसने धर्मी ठहराया।
यीशु ने हमें स्वर्ग में प्रवेश करने और परमेश्वर की सन्तान के रूप में अनंत काल तक जीने के लिए महिमा दी। क्या आप इस बात को समझ सकते है? लेकिन धार्मिक सिद्धांत सिखाते हैं कि, भले ही आप एक पापी हैं, यदि आप यीशु में विश्वास करते हैं, तो आप धीरे-धीरे समय के साथ पवित्र हो जाएंगे, और जब तक आप मरेंगे, तब तक आप एक सिध्ध व्यक्ति के रूप में परमेश्वर के सामने खड़े होंगे। यह सच्चाई के खिलाफ है। यह सच्चा विश्वास नहीं है। उस तरह का विश्वास पवित्रीकरण के सिद्धांत के लिए है, सत्य के लिए नहीं।
प्रभु ने हमें हमारे पापों से बचाया, और परमेश्वर ने हमें ठहराया, हमें बुलाया, हमारे पापों को पानी और लहू से एक ही बार में धोया, हमें यानी जिन्हें पवित्र किया गया है उन्हें अपनी संतान बनाया, और हमें आशीष दी ताकि हम परमेश्वर के राज्य में महिमा के साथ प्रवेश कर सकें। यह सत्य है, और इसी तरह उसने यीशु मसीह में सभी आशीषों को एक वाक्य में एक साथ रखकर सत्य की बात की। यह भाग क्रमिक पवित्रता के सिद्धांत के सात चरणों के बारे में बात नहीं कर रहा है। यह ऐसा नहीं कह रहा है कि हम पूरी तरह से पवित्र होने के लिए सात चरणों से गुजरने के बाद धीरे-धीरे सिद्ध हो जाएंगे।
रोमियों ८:३० यह नहीं कहता है कि जब हम यीशु पर विश्वास करेंगे तो परमेश्वर हमें बुलाएगा या फिर जैसे-जैसे हम बड़े होते जाएंगे, हम पवित्र होते जाएंगे। यह ऐसा भी नहीं कहता है कि जब तक हम सम्पूर्ण पवित्रता तक नहीं पहुचते तब तक हम धीरे-धीरे पवित्रता की सीढ़ी पर कदम-कदम पर चढ़ते हैं। जब हम यीशु मसीह को जानते थे, और यीशु मसीह ने हमें बुलाया, तो उसने हमारे पापों को एक ही बार में हमेशा के लिए पानी और लहू से माफ़ कर दिया। जब हम सत्य के इस सुसमाचार के साथ परमेश्वर के पास आते हैं तो हम उसकी बाहों में आलिंगन में आ जाएंगे। 
कुछ लोग कहते हैं, "मैं पहले अपने पापों को नहीं जानता था, लेकिन उपदेश सुनने के बाद, मुझे इसका एहसास होने लगा है। मुझे अतीत से एक या दो पाप याद हैं, और मैं शायद भविष्य में पाप करता रहूंगा, इसलिए मुझे नहीं लगता कि मैं परमेश्वर में विश्वास कर सकता हूँ।” लेकिन यह सही नहीं है। हमें इसके बजाय ऐसा सोचना चाहिए, “आह! सही बात है। जब मैं पाप कर रहा था तब भी मैं अपने पापों को नहीं जानता था। परमेश्वर के सभी वचन सही हैं। मुझे उसके वचन पर विश्वास करना चाहिए, लेकिन मैं उसके अनुसार जीने में सक्षम नहीं हूँ। मैं अनिवार्य रूप से एक गंभीर पापी हूं, जो नरक के लिए नियत है। इसलिए यीशु आया।"
हम यीशु पर विश्वास करने और पापों की क्षमा प्राप्त करने के द्वारा पापरहित बने हैं। हम पवित्र हो जाते हैं और परमेश्वर की सन्तान बन जाते हैं। जब से हम परमेश्वर की सन्तान बन गए हैं, हम स्वर्ग में प्रवेश करने और महिमा पाने में सक्षम हैं। यह परमेश्वर की धार्मिकता और सच्चाई है।
परमेश्वर ने हमें ठहराया, हमें बुलाया, धर्मी बनाया, और हमें महिमा दी। आप सोच सकते हैं कि क्रमिक पवित्रता का सिद्धांत यह कहते हुए सही है, "मैं धीरे-धीरे बदलूंगा और एक पाप रहित व्यक्ति बनूंगा।" परन्तु जिस क्षण आप पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करते हो, उसी क्षण आप धर्मी और पवित्र हो जाते है। आपका ह्रदय धीरे धीरे में नहीं बदलता है। आपका हृदय एक ही बार में पापरहित हो जाता है, और यह आपका विश्वास है जो धीरे-धीरे बढ़ता है जब आप परमेश्वर के वचन और उसकी कलीसिया में विश्वास करते हैं।
हमारा विश्वास धीरे-धीरे बढ़ता है क्योंकि हम परमेश्वर के वचन से पोषित होते हैं, अंततः एक ऐसे बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ हम दूसरों को सिखा भी सकते हैं। लेकिन यह दावा कि हम अधिक पूर्ण और अधिक पापरहित होने के बाद परमेश्वर की संतान बनेंगे, बाइबल पर आधारित नहीं है। हम एक ही बार में पवित्र और पापरहित हो जाते हैं।
क्या परमेश्वर ने हमें मसीह यीशु में अपनी पूर्वनियति के अनुसार बुलाया था? हाँ उसने ऐसा ही किया है। उसने हमें यीशु मसीह में बुलाया और हमें धर्मी और पापरहित बनाया। परमेश्वर ने हमें धर्मी ठहराया और हमें यीशु मसीह के द्वारा पापरहित बनाया, हमें अपनी सन्तानों के रूप में ग्रहण किया, और हमें उसके राज्य में प्रवेश करने के लिए महिमा दी। 
हम यीशु मसीह के उद्धार में विश्वास करने के द्वारा एक ही बार में धर्मी बन गए, जिन्होंने परमेश्वर की सभी धार्मिकता को पूरा किया। हम आशीषित हुए हैं क्योंकि हमने परमेश्वर की बुलाहट का पालन किया और यह विश्वास किया कि यीशु ने हमारे सभी पापों को धो दिया, ताकि हमारी दुर्बलताओं के बावजूद, हमें परमेश्वर की पापरहित और धर्मी संतान और उसके राज्य की प्रजा बना सकें।
इसलिए पवित्रता का सिद्धांत गलत है। इसका कोई मतलब नही बनता। बाइबल हमें स्पष्ट रूप से बताती है, “फिर जिन्हें उसने पहले से ठहराया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें धर्मी भी ठहराया है; और जिन्हें धर्मी ठहराया, उन्हें महिमा भी दी है।” विश्वास धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन पापों की माफ़ी, परमेश्वर की संतान बनना और स्वर्ग में प्रवेश करना—ये सब एक ही बार और सबके लिए होता है। क्या आप इस पर विश्वास करते हैं?
हम पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करने के द्वारा परमेश्वर की सन्तान बनने में समर्थ हुए। परमेश्वर ने पानी और आत्मा के अनुग्रह के द्वारा हमारे सभी पापों से हमारे बेकार जीवन को बचाया है। क्या हमने अपने उद्धार के लिए किसी भी तरह से परमेश्वर के लिए कुछ किया? क्या हमने धर्मी बनने में योगदान दिया? ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी हमने योजना बनाई है, और कोई भी व्यक्ति अपने जन्म से पहले यीशु पर विश्वास करने का निर्णय नहीं लेता है। क्या कोई है जो अपनी माँ के गर्भ में रहते हुए यीशु पर विश्वास करने का फैसला करता है? 
हमने उन लोगों से सच्चाई सुनी जिन्होंने पानी और आत्मा के सुसमाचार का प्रचार किया, समझा कि यह सत्य है, और अपने मन में सोचा, "मेरे पास इस पर विश्वास करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है; मेरे जैसे पापी व्यक्ति को इसमें विश्वास करना ही चाहिए।" उस समय से, हम पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करने लगे, पापों की क्षमा प्राप्त की, और परमेश्वर की सन्तान बन गए। 
केवल धर्मी ही परमेश्वर की सन्तान हैं। परमेश्वर हमेशा के लिए स्वर्ग के राज्य के अनन्त धन और सम्मान के साथ उनकी महिमा करते हैं। महिमावंत होने का मतलब यही है। परमेश्वर ने ये आशीषें उन विश्वासियों को दी हैं जो पानी और आत्मा के सुसमाचार को स्वीकार करते हैं। 
प्रभु की स्तुति हो!