उपदेश

विषय १० : प्रकाशितवाक्य (प्रकाशितवाक्य पर टिप्पणी)

[अध्याय 3-2] वे जिन्होंने अपने वस्त्र अशुध्द नहीं किए ( प्रकाशितवाक्य ३:१-६ )

वे जिन्होंने अपने वस्त्र अशुध्द नहीं किए
( प्रकाशितवाक्य ३:१-६ )

यहाँ पद्यांश कहता है की, “पर हाँ, सरदीस में तेरे यहाँ कुछ ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपने–अपने वस्त्र अशुद्ध नहीं किए, वे श्‍वेत वस्त्र पहिने हुए मेरे साथ घूमेंगे, क्योंकि वे इस योग्य हैं।“ “श्वेत वस्त्र” पहिने घूमने का मतलब है की उन्होंने परमेश्वर की धार्मिकता में अपने विश्वास की रक्षा की है।
परमेश्वर उनके साथ चलता है जो अपने विश्वास की शुद्धता को बनाए रखते हैं। वह उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ता, बल्कि हमेशा उनके साथ रहता है और उन्हें आशीर्वाद देता है।
इस पृथ्वी पर धर्मी लोग हैं जो पवित्र आत्मा के साथ चलते हैं। परमेश्वर ने उनके नाम जीवन की पुस्तक में लिखे हैं और उन्हें हमेशा के लिए अनन्त जीवन जीने की अनुमति दी है। धर्मी लोगों को श्वेत वस्त्र पहनाकर और हमेशा उनके साथ रहने के द्वारा, परमेश्वर ने उनके लिए शैतान को उसके खिलाफ संघर्ष में हमेशा पराजित करना संभव बनाया है।
 
 

शैतान पर जय पानेवाला बनना


शैतान पर जय पाने वाला व्यक्ति बनने के लिए, हमें पहले उस छुटकारे के वचन पर विश्वास करना चाहिए जो प्रभु ने हमें दिया है। इसलिए, आइए हम वचन की ओर मुड़ें और देखें कि कैसे प्रभु ने जल और आत्मा के सुसमाचार के द्वारा हमें बचाया है।
आइए लूका १०:२५-३५ को देखने के द्वारा शुरुआत करे। “और देखो, एक व्यवस्थापक उठा और यह कहकर उसकी परीक्षा करने लगा, “हे गुरु, अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूँ?” उसने उस से कहा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?” उसने उत्तर दिया, “तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्‍ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।” उसने उससे कहा, “तू ने ठीक उत्तर दिया, यही कर तो तू जीवित रहेगा।” परन्तु उसने अपने आप को धर्मी ठहराने की इच्छा से यीशु से पूछा, “तो मेरा पड़ोसी कौन है?” यीशु ने उत्तर दिया, “एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीटकर उसे अधमरा छोड़कर चले गए। और ऐसा हुआ कि उसी मार्ग से एक याजक जा रहा था, परन्तु उसे देख के कतराकर चला गया। इसी रीति से एक लेवी उस जगह पर आया, वह भी उसे देख के कतराकर चला गया। परन्तु एक सामरी यात्री वहाँ आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया। उसने उसके पास आकर उसके घावों पर तेल और दाखरस ढालकर पट्टियाँ बाँधीं, और अपनी सवारी पर चढ़ाकर सराय में ले गया, और उसकी सेवा टहल की। दूसरे दिन उसने दो दीनार निकालकर सराय के मालिक को दिए, और कहा, ‘इसकी सेवा टहल करना, और जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे भर दूँगा।”
हम इस भाग में दो नायक देखते हैं: यीशु और एक व्यवस्थापक। इस व्यवस्थापक ने, व्यवस्था के प्रति अपनी विश्वासयोग्यता का घमण्ड करने के लिए, यीशु से पूछा: “हे गुरु, अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूँ?” इस प्रश्न से आपको किस प्रकार का प्रभाव मिलता है?
विचाराधीन व्यवस्थापक ने गलती से सोचा कि वह शाब्दिक स्तर पर इसका पालन करके व्यवस्था का पालन कर सकता है। परन्तु परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था मनुष्यजाति को दी ताकि लोग अपने हृदय के पापों को पहचान सकें। परमेश्वर की व्यवस्था उन पापों की बात करती है और उन्हें प्रकट करती है जो लोगों के हृदयों के लिए मौलिक हैं। उनके दिलों में बुरे विचार, अनैतिक दिमाग, जानलेवा दिमाग, चोरी करने वाले दिमाग, झूठी गवाही देने वाले दिमाग, पागलपन के दिमाग, और बहुत कुछ पाए जाते हैं। व्यवस्थापक के दिल के पापों को इंगित करने के लिए, हमारे प्रभु ने बदले में उससे पूछा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?”
हमारे प्रभु चाहते थे कि व्यवस्थापक अपने दिल में पाप की मौलिक उपस्थिति को पहचानें। लेकिन अपनी धार्मिकता का दावा करने के बजाए व्यवस्थापक गर्व के साथ यीशु से पूछता है की, "अनन्त जीवन का वारिस होने के लिये मैं क्या करूं?" उनके शब्दों से, हम देख सकते हैं कि व्यवस्थापक ने क्या सोचा: "मैंने अब तक व्यवस्था का अच्छी तरह से पालन किया है, और मैं मरते दम तक इसका पालन करने के लिए सुनिश्चित करता हूँ।"
लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि परमेश्वर द्वारा दी गई व्यवस्था को केवल स्वयं परमेश्वर ही पालन कर सकता है, और कोई नहीं, यहां तक कि एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो पूरी तरह से परमेश्वर की व्यवस्था का पालन कर सकता है। इसलिए, एक मनुष्य के लिए परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने की कोशिश करना केवल प्रभु के सामने अपनी मूर्खता और अहंकार को दर्शाता है। हमें केवल यह समझना चाहिए कि हम पापी हैं जो कभी भी परमेश्वर की व्यवस्था का पालन नहीं कर सकते।
हम सभी के लिए, हम परमेश्वर के वचन को कैसे पढ़ते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। जब हम परमेश्वर के वचन को पढ़ते हैं, तो हमें उस उद्देश्य के बारे में जागरूकता के साथ पढ़ना चाहिए जो परमेश्वर ने हमारे लिए बनाया है। यदि हम प्रभु के उद्देश्य के बारे में इस जागरूकता के बिना बाइबल पढ़ते हैं, तो हमारा विश्वास उसकी इच्छा के विपरीत दिशा में बह सकता है। यही कारण है कि इतने सारे अलग-अलग संप्रदाय हैं, और जिनकी आस्था परमेश्वर के साथ जुड़ी हुई है, उन्हें अक्सर खारिज कर दिया जाता है। 
जो लोग पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास करते हैं जब वे बाइबल पढ़ते हैं, तो वे ठीक-ठीक समझ सकते हैं कि परमेश्वर का उद्देश्य क्या है। लेकिन जब कोई व्यक्ति पानी और आत्मा के सुसमाचार और परमेश्वर के द्वारा दिए गए आत्मा पर विश्वास किए बिना बाइबल पढ़ता है, तो यह केवल बड़ी गलतफहमी पैदा कर सकता है, और ऐसे व्यक्ति को कभी भी बाइबल का सच्चा विश्वास नहीं हो सकता है, चाहे वह कितनी भी मेहनत से बाइबल का अध्ययन करे।
 
 
व्यवस्था क्या कहती है?

हम लूका के भाग को पढ़ना जारी रखते है: “उसने उस से कहा, “व्यवस्था में क्या लिखा है? तू कैसे पढ़ता है?” उसने उत्तर दिया, “तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी शक्‍ति और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख; और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।”
रोमियों ३:२० कहता है, “कि व्यवस्था के द्वारा पाप की पहिचान होती है।” बाइबल हमसे यह भी कहती है की, “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह शापित है (गलातियों ३:१०)।”
व्यवस्था न केवल हमें, जो पहले से ही पापियों के रूप में पैदा हुए थे, और भी बड़े पापियों के रूप में तबदील करती है, बल्कि यह हमारे कर्मों की कमियों को भी प्रकट करती है। यही कारण है कि “जो कोई व्यवस्था की पुस्तक में लिखी हुई सब बातों के करने में स्थिर नहीं रहता, वह शापित है।”
कुछ लोग कहते हैं कि कोई व्यक्ति स्वर्ग में तभी प्रवेश कर सकता है यदि वह परमेश्वर में विश्वास करता है और व्यवस्था का अच्छी तरह से पालन करता है, और उसे व्यवस्था का पालन करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए। इसलिए ये लोग, यीशु में विश्वास करने के बावजूद भी, अपना पूरा जीवन व्यवस्था का पालन करने में लगाते हैं। परन्तु वास्तव में वे व्यवस्था के अभिशाप के अधीन हैं। जिन लोगों को यीशु पर विश्वास करने के बावजूद भी उनके पापों से बचाया नहीं गया है, वे अपने विश्वास की सीमा से बचने में असमर्थ हैं जो व्यवस्था को व्यर्थ में पालन करने की कोशिश करता है। वे यीशु में विश्वास कर सकते हैं, लेकिन वे परमेश्वर के सामने पापी के रूप में बने रहेंगे, और परमेश्वर के सामने पापी केवल उसके भयानक न्याय का सामना कर सकते हैं। यही कारण है कि यीशु, जो परमेश्वर है, हमारे पास हमारे उद्धारकर्ता के रूप में आया और पापियों का उद्धारक बन गया। दूसरे शब्दों में, यीशु ने यरदन नदी में बपतिस्मा लेने के द्वारा हमारे सभी पापों को दूर किया।
क्या आप जानते हैं कि बपतिस्मा उद्धार का प्रतीक है जो हमारे सभी पापों को दूर करता है? यीशु का बपतिस्मा ही एकमात्र तरीका था जिसे परमेश्वर ने हमारे सभी पापों को शुद्ध करने के लिए स्थापित किया था।
मत्ती ३:१५ में बाइबल हमें बताती है, “अब तो ऐसा ही होने दे, क्योंकि हमें इसी रीति से सब धार्मिकता को पूरा करना उचित है।” यहाँ "इसी रीती से" शब्द का अर्थ, इसकी मूल भाषा में, "सबसे उपयुक्त," या "सबसे उचित" है। दूसरे शब्दों में, यह सबसे उपयुक्त और उचित था कि यीशु यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लेने के द्वारा हमारे सभी पापों को अपने ऊपर उठाए। संक्षेप में, यीशु मसीह के बपतिस्मा ने हमारे सभी पापों को दूर किया है। यीशु मसीह ने बपतिस्मा लेने और क्रूस पर मरने के द्वारा हमें हमारे पापों से छूटकारा दिलाया है। जब लोग इस सटीक सत्य को जानते हैं और झूठ से लड़ते हैं, तो परमेश्वर उन्हें जित पानेवाले कहते है।
 
 

नया जन्म पाए हुए व्यक्ति को किसके खिलाफ लड़ना चाहिए?


नया जन्म पाए हुए लोगों को कानूनीवाद के खिलाफ लड़ना चाहिए और उस पर जय प्राप्त करनी चाहिए। धार्मिक दृष्टि से, व्यवस्था के अगुवे भले ही दिखने में अच्छे प्रतीत हों, परन्तु भीतर ही भीतर वे परमेश्वर के विरुद्ध चुनौती देने वाले हैं। इस प्रकार उनके शब्द, भले ही वे गुणी प्रतीत हों लेकिन वास्तव में शैतान के वचन हैं जो उनके अनुयायियों को पाप के अभिशाप के अधीन रखते हैं। इसलिए संतों को इन धर्मवादियों से लड़ना चाहिए और उन पर जय प्राप्त करनी चाहिए।
धर्मवादियों का दावा है कि यीशु में विश्वास करने से उद्धार मिलता है, लेकिन वे यह भी दावा करते हैं कि कोई व्यक्ति तभी स्वर्ग में प्रवेश कर सकता है जब वह व्यवस्था के सामने एक सदाचारी जीवन जीता है। क्या ऐसे विश्वास को ऐसा विश्वास कहा जा सकता है जो किसी व्यक्ति को बचाए जाने की ओर ले जाता है? बिलकूल नही!
इसलिए, प्रभु ने इस मामले पर कानूनविद और हमें प्रबुद्ध करने के लिए एक दृष्टांत का इस्तेमाल किया। कहानी कुछ इस प्रकार है: एक व्यक्ति जो यरूशलेम से यरीहो जा रहा था, उस पर लुटेरों ने हमला कर दिया और उसे आधा मरा हुआ छोड़ दिया। एक याजक भी यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था, और उस पीटे हुए व्यक्ति के पास आया। लेकिन याजक ने उसकी मदद नहीं की, बल्कि दूसरी ओर से चला गया। इस बार एक और व्यक्ति लेवी, पीड़ित के पास आया, लेकिन उसने भी मदद के लिए गरीब आदमी की पुकार नहीं सुनने का नाटक किया और दूसरी ओर से चला गया। 
फिर, एक तीसरा व्यक्ति आया, इस बार एक सामरी आया। याजक या लेवी के विपरीत, सामरी ने वास्तव में उसके घावों पर पट्टी बांधी, तेल और दाखमधु डाला, उसे अपने जानवर पर उठाकर उसे एक सराय में ले गया, और उसकी देखभाल की। उसने सरायवाले को पैसे भी दिए और कहा, ‘इसकी सेवा टहल करना, और जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे भर दूँगा।”
इन तीनों में से कौन अच्छा है? सामरी, बिल्कुल। यह सामरी यीशु को संदर्भित करता है। हमारे जैसे पापियों को न तो परमेश्वर की व्यवस्था ने बचाया है, न ही उसके शिक्षकों ने, न ही उसके अगुवों ने, हमारी अपनी ताकत, प्रयास, या पश्चाताप की प्रार्थनाओं को तो छोड़ ही दीजिए। केवल यीशु जो इस पृथ्वी पर हमारे पापों को शुद्ध करने के लिए आया, वही वास्तविक उद्धारकर्ता हैं। यीशु ने "इसी रीती से (मत्ती ३:१५)" सभी पापियों को छुड़ाया है। यीशु का बपतिस्मा और क्रूस पर उसका लहू पापी के उद्धार का चिह्न है (१ पतरस ३:२१)। इस दुनिया के सभी पापी यीशु के बपतिस्मा और क्रूस द्वारा बचाए गए हैं। जो लोग यरदन नदी में यीशु के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू को उनके उद्धार के रूप में मानते हैं, वे अपने सभी पापों से पूरी तरह से छूटकारा पाते है।
यीशु ने हमें असत्य के झूठे सिद्धांतों से लड़ने और उन पर जय पाने की सामर्थ दी है। जब लोग दावा करते हैं, "हम यीशु में विश्वास करते हैं, लेकिन यदि आप परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करते हैं और आपके कर्म अच्छे हैं, तो आप अपने सभी पापों से मुक्त हो जाएंगे," वे केवल अपनी जिद दिखा रहे हैं और झूठ का प्रचार कर रहे हैं। यदि आप यीशु द्वारा हमारे उद्धार के सत्य में कुछ भी जोड़ते या घटाते हैं, तो यह सत्य नहीं रहेगा। यीशु ने हमें असत्य के ऐसे झूठे सिद्धांतों से लड़ने और उन पर जय पाने की सामर्थ दी है।
आज के व्यवस्था के अगुवे लोगों के सामने जोर से बात करते हैं, जैसे कि वे व्यवस्था का अच्छी तरह से पालन करते हैं। लेकिन हम अक्सर देखते हैं कि जब वे ऐसी स्थिति का सामना करते हैं जहाँ व्यवस्था उनसे कुछ मांग करती है तब वे अपने शब्दों पर कार्य नहीं कर सकते हैं। वे खुद महसूस करते हैं कि हालांकि वे अपने दिलों में अच्छा करना चाहते हैं, लेकिन वे अपने शरीर की कमजोरी के कारण ऐसा नहीं कर सकते। अपनी कमजोरियों को छुपाकर और धार्मिक औपचारिकताओं में खुद को लपेटकर, वे दूसरों को धोखा देते हैं और उन्हें उसी बोझ के टेल दबा देते है। 
जैसा कि याजक और लेवी ने उपरोक्त भाग में किया था उसी प्रकार आज के विधिवादी भी जब भी उनकी प्रतिबद्धता के लिए उनके बलिदान की आवश्यकता होती है तब वे दूसरी तरफ से गुजरने का दोहरा मापदंड अपनाते हैं। यह परमेश्वर की व्यवस्था के सामने मनुष्य की शक्तिहीनता है। लोग इसे धर्म नामक सुन्दर वस्त्र में लपेट कर छिपाते हैं। परन्तु वे सब जो प्रभु के सामने छिप जाते हैं वे उद्धार नहीं पा सकते। केवल वे जो व्यवस्था के माप के साथ अपने सच्चे स्वयं को प्रकट करके अपने पापीपन को पहचानते हैं, वे पानी और आत्मा के सच्चाई के वचन से अपने सभी पापों से छूटकारा प्राप्त कर सकते है।
केवल यीशु ही है जो मरते हुए पापियों के पास से गुजरकर चले नहीं जाते है और केवल वे ही है जो उन्हें ढूंढ़कर और उनसे मिल कर उन्हें बचाते हैं। उसने व्यक्तिगत रूप से बपतिस्मा लेने के द्वारा हमारे सभी पापों को खुद पर स्थानांतरित कर दिया, और उसने अपने स्वयं के शरीर के बलिदान के साथ अपनी मजदूरी का भुगतान करके मरने वाले पापियों को उनके सभी पापों से मुक्त कर दिया। इस तरह यीशु सभी पापियों का उद्धारकर्ता बन गया है।
 
 
जो जय पाए उसे श्वेत वस्त्र पहिनाए जाएंगे

यहाँ यह भाग हमें बताता है कि जो जय प्राप्त करेंगे, वे श्वेत वस्त्र पहनेंगे। इसका अर्थ यह है कि हमें मसीही जगत में झूठे लोगों से लड़ना है और उन पर जय पाना है। यहाँ तक कि जब हम अभी बात कर रहे हैं, ये झूठे लोग लोगों को यीशु पर विश्वास करना और भलाई में जीना सिखा रहे हैं। बेशक, भलाई में जीना सही काम है। लेकिन बुनियादी तौर पर, लोगों के दिल हर तरह की गंदी चीजों से भरे हुए हैं, हत्या से लेकर व्यभिचार, चोरी और ईर्ष्या तक; और इस प्रकार इन लोगों को भलाई में रहने के लिए कहना, हालांकि यह कहावत सही है, उन्हें केवल एक धर्म तक सीमित रखने और उन्हें मौत के घाट उतारने के समान है। जिन लोगों के पाप उनके गले में अटके हुए है, उन्हें "भलाई में जीने" के लिए कहना, उन्हें आत्म-निंदा में धकेलना है। 
इसलिए, उन्हें वास्तव में जरूरत है कि हम उन्हें पानी और आत्मा की सच्चाई की शिक्षा देकर उनके सभी पापों से छूटकारा दिलाने में मदद करें जो उन्हें उनके मौलिक पापों से बचा सकते हैं। यह सही शिक्षा है, और इस शिक्षा के बाद परमेश्वर में भलाई का जीवन जीने की नसीहत आती है। दूसरे शब्दों में कहें तो, पापियों के रूप में मसीह के बाहर खड़े लोगों के लिए सबसे तात्कालिक प्राथमिकता उन्हें पहले पानी और आत्मा के सुसमाचार का प्रचार करके उन्हें धर्मी बनाना है।
 
 
मसीही धर्म की सांसारिक धर्म के रूप में अधोगति

हमें सांसारिक धर्मों के बहकावे में नहीं आना चाहिए। जब हम झूठ फैलाने वाले सांसारिक धर्मों से लड़ते हैं और उन पर जय प्राप्त करते हैं, तभी हम स्वर्ग में प्रवेश कर सकते हैं। क्योंकि हम परमेश्वर की व्यवस्था का पालन करने में असमर्थ हैं, हमें उद्धार के उस अनुग्रह की आवश्यकता है जो यीशु ने हमें दिया है, और केवल इस अनुग्रह में विश्वास करके ही हम प्रभु से मिल सकते हैं। 
लेकिन ईसाईजगत में बहुत से लोग यीशु में विश्वास करते हैं फिर भी उन्हें नरक में घसीटा जा रहा है, झूठ फैलाने वालों द्वारा धोखा दिया जाता है और गुमराह किया जा रहा है। वे इस मोहक धारणा से धोखा खा जाते हैं कि लोग अच्छे हो सकते हैं और होना भी चाहिए। लेकिन क्योंकि हम मूल रूप से पाप के साथ पैदा हुए हैं, हम कभी भी अच्छे नहीं हो सकते, चाहे हम कितनी भी कोशिश कर लें। इस प्रकार, हम केवल सत्य के सुसमाचार यानी कि यीशु ने अपने पानी और आत्मा के द्वारा हमें बचाया है इस पर विश्वास करने के द्वारा ही बचाए जा सकते हैं कि। हम एक नया जीवन तभी जी सकते हैं जब हम यह पहचान लें कि इस सत्य में विश्वास करने से हम पापरहित हो गए हैं।
बाइबल के फरीसी और आज के अधिकांश मसीही जो पानी और आत्मा के सुसमाचार में विश्वास न करके अपने पापों से शुद्ध नहीं हुए हैं, वे सभी एक जैसे हैं—वे सभी विधर्मी हैं। फरीसी परमेश्वर में, आत्माओं के पुनरुत्थान में, और बाद के जीवन जैसा कि पवित्रशास्त्र में दर्ज है उस पर विश्वास करते थे। लेकिन वे यीशु को अपना मसीहा नहीं मानते थे। इसके अलावा, उन्होंने मसीह के बपतिस्मा और क्रूस पर उसके लहू को कुचल दिया और अनदेखा कर दिया। 
आज, कई ऐसे मसीही हैं जो इन फरीसियों की तरह ही हैं। उनमें स्वयं बाइबिल की तुलना में मसीही सिद्धांतों को अधिक मान्यता देने की प्रवृत्ति है। यही कारण है कि आजकल बहुत सारी झूठी सिक्षाए अंतहीन रूप से पनप रही हैं। तीतुस ३:१०-११ में, परमेश्वर हमें विधर्मियों के बारे में यह कहते हुए बताता है, “किसी पाखंडी को एक दो बार समझा–बुझाकर उससे अलग रह, यह जानकर कि ऐसा मनुष्य भटक गया है, और अपने आप को दोषी ठहराकर पाप करता रहता है।” जो लोग विधर्मियों से संबंधित हैं, वे बाइबल से अधिक अपने धार्मिक अगुवों पर भरोसा करते हैं, विश्वास करते हैं और उनका अनुसरण करते हैं, और परिणामस्वरूप, वे सभी नष्ट हो जाते हैं।
अब पहले की तरह, इस संसार में बहुत से झूठे भविष्यद्वक्ता आ रहे हैं। मुख्य भाग के वचन के द्वारा, परमेश्वर ने हमें इस प्रकार कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को इन झूठे भविष्यवक्ताओं से लड़ना चाहिए और उन पर जय प्राप्त करनी चाहिए। उसने यह भी कहा कि जो जय पाएगा उसे ही धार्मिक वस्त्र पहिनाए जाएँगे।
लूका १८ में "फरीसी और चुंगी लेने वाले का दृष्टान्त" मिलता है। एक फरीसी ने मन्दिर में जाकर अपने हाथ उठाए, और गर्व से प्रार्थना की: "हे परमेश्वर, मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं और जो कुछ मैं कमाता हूं उसका दशमांश देता हूं।" इसके विपरीत, चुंगी लेने वाला अपना मुँह भी नहीं उठा सका जब उसने प्रार्थना की: “हे परमेश्वर, मैं वह नहीं कर सकता जो उसने किया है। मैं पापी हूँ जिसमें बहुत सी कमियाँ हैं, जो सप्ताह में दो बार उपवास नहीं कर सकता और जो आपको दशमांश भी नहीं दे सकता। इतना ही नहीं, मैंने लोगों को धोखा दिया है, उनसे चुराया है, और बहुत से बुरे काम किए हैं। मैं एक बेकार आदमी हूँ। मुझ पर दया करो, परमेश्वर। दया करो और कृपया मुझे बचाओ। ”
बाइबल हमें बताती है कि यह चुंगी लेने वाला था जिसे फरीसी के बजाय परमेश्वर ने धर्मी ठहराया था। यह इस प्रश्न में अच्छी तरह से दिखाया गया है, "किस को संभवतः पाप से क्षमा किया जा सकता है?" यह कोई और नहीं बल्कि वे हैं जिन्हें अपनी कमियों का एहसास होता है। जो लोग जानते हैं कि वे पापी हैं, वे आत्माएं जो यह मानती हैं कि वे निस्संदेह नरक में बंधी हैं, वे परमेश्वर की व्यवस्था या धार्मिक न्याय थे जिन्हें उन पर लागू किया जाना था—ये वे हैं जो यीशु से छुटकारे का उद्धार प्राप्त करते हैं।
मत्ती ३:१५ में लिखा है कि यीशु ने बपतिस्मा लेने से ठीक पहले क्या कहा था। इस पद में "इसी रीती से" का अर्थ है कि यीशु का बपतिस्मा पापियों को बचाने का सबसे उपयुक्त तरीका था - अर्थात, यीशु के बपतिस्मा के साथ उनके पापों को दूर करके उन्हें बचाना, जिसने सभी पापों को उसे सौंप दिया।
क्या आप इस सच्चाई में विश्वास करते हैं कि यीशु ने "इसी रीती से" आपको आपके पापों से बचाया है? प्रभु ने आपके सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया जब उन्होंने "इसी रीती से" बपतिस्मा लिया। फिर उसने दुनिया के सभी पापों को क्रूस पर चढ़ा दिया और इन सभी पापों की मजदूरी अपने लहू से चुकाई। अपनी आत्मा को जीवित रखने के लिए आपको इस पर विश्वास करना चाहिए। जब आप इस पर विश्वास करते हैं, तो आपकी आत्मा का प्रायश्चित हो जाता है, और आप फिर से परमेश्वर की संतान के रूप में जन्म लेते हैं।
तौभी इस संसार में बहुत से ऐसे हैं जो पानी और आत्मा के इस सत्य यानी उद्धार के सुसमाचार का इन्कार करते हैं। इसलिए हमें आत्मिक लड़ाई लड़नी चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हमें अपने पापों को पहचानने के लिए और अधिक गलत कार्य करने चाहिए, बल्कि यह कि हमें खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचानना चाहिए जो मूल रूप से पाप से बंधे हैं और आत्मिक रूप से उनका न्याय किया जाना चाहिए और इसके द्वारा हमें परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करना चाहिए। आपको इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि यीशु आपका उद्धारकर्ता है। हर कोई जो उद्धार पाना चाहता है उसे छुटकारे के यीशु में विश्वास करना चाहिए जिसने हमारे सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया और हमारे स्थान पर न्याय किया गया। केवल तभी व्यक्ति के दिल में कोई पाप नहीं रह सकता।
क्या अभी आपके दिल में पाप है? जो लोग सोचते हैं कि उनके हृदय में पाप है, उन्हें पहले परमेश्वर की व्यवस्था को जानना चाहिए। परमेश्वर की व्यवस्था के अनुसार, पाप की मजदूरी मृत्यु है। पाप है तो मरना ही पड़ेगा। यदि आप अपने पापों के लिए प्रायश्चित किए बिना मर जाते हैं, तो आपका न्याय किया जाएगा और नरक में भेज दिया जाएगा। क्योंकि इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति पाप करता है, और प्रतयेक व्यक्ति परमेश्वर की व्यवस्था के सामने नरक में भेजा जाएगा। यही कारण है कि परमेश्वर ने हम पर दया करते हुए, अपने एकलौते पुत्र यीशु मसीह को इस पृथ्वी पर भेजकर हमें बचाया, "इसी रीती से (मत्ती ३:१५)" यरदन नदी में अपने बपतिस्मा के द्वारा जगत के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया और हमारे स्थान पर क्रूस पर उसका न्याय किया गया —यह सब कुछ इसलिए ताकि वह हमें स्वर्ग भेज सके। 
हमारे अच्छे कर्मों के कारण हमें बचाया नहीं जा सकता है। लोगों के पाखंड के विभिन्न स्तर हो सकते हैं, लेकिन फिर भी हर कोई एक पाखंडी है, और कोई भी पूरी तरह से पूर्ण भलाई तक नहीं पहुंच सकता है। इसलिए, लोगों को उनके सभी पापों से पूरी तरह से तभी छुटकारा दिलाया जा सकता है जब वे मसीह के प्रायश्चित के उद्धार में विश्वास करने के द्वारा अपने सभी पापों की माफ़ी प्राप्त करे। यह बाइबल का मूल सत्य है।
यह बताते हुए कि पौलुस प्रभु से मिलने से पहले कैसा था, उसने ने स्वीकार किया, “क्योंकि जिस अच्छे काम की मैं इच्छा करता हूँ, वह तो नहीं करता, परन्तु जिस बुराई की इच्छा नहीं करता, वही किया करता हूँ।” (रोमियों ७:१९)। पौलुस ऐसा क्यों था? क्योंकि मनुष्यजाति कोई भी अच्छा कार्य करने में असमर्थ है। हर कोई जानता है कि अच्छा करना सही काम है, लेकिन कोई भी मौलिक रूप से ऐसा करने में सक्षम नहीं है। यह शरीर की इच्छाओं से सीमा और आयाम में पूरी तरह से भिन्न है जो धर्मी लोगों के पास भी है। यही कारण है कि लोगों को प्रभु के द्वारा दी गए सच्चाई के सुसमाचार में विश्वास करने से ही बचाया जाता है।
धर्मी और पापरहित परमेश्वर ने हम जैसे अशुद्ध और गन्दे प्राणियों को कैसे स्वीकार किया? हमारे प्रभु यीशु के कारण परमेश्वर ने हमें बचाया और गले लगाया। उन्होंने मनुष्यजाति के महायाजक यूहन्ना द्वारा अपने बपतिस्मा के साथ मनुष्यजाति के सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया, इन पापों को क्रूस पर ले गए, और हमारे स्थान पर न्याय किया गया। क्या आपको यीशु में विश्वास है? यीशु पर विश्वास करना उस पर विश्वास करना है जो उसने हमारे लिए किया है।
 
 

परमेश्वर के सामने खड़े रहने का तरिका


कैन और हाबिल का जन्म आदम और हव्वा से हुआ था, जो मनुष्यजाति के पहले माता-पिता थे। जब आदम और हव्वा ने पाप किया, तो परमेश्वर ने उनके बजाय एक जानवर को मार डाला और उन्हें उसकी खाल पहना दी। यह मनुष्यजाति को परमेश्वर के दो नियम सिखाता है। एक है परमेश्वर की न्याय की व्यवस्था, जहां "पाप की मजदूरी मृत्यु है," और दूसरी उसकी प्रेम की व्यवस्था है, जहां पापियों के शर्मनाक पापों को ढकने के लिए बलिदानों का उपयोग किया जाता है। आदम और हव्वा ने, शैतान के बहकावे में आकर, परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया। इस बात की परवाह किए बिना कि उन्होंने कैसे पाप किया, उन्हें मौत के घाट उतार देना चाहिए था, क्योंकि पाप की मजदूरी परमेश्वर की व्यवस्था के सामने मृत्यु है। लेकिन परमेश्वर ने इसके बजाय एक जानवर को मार डाला और उन्हें उसकी खाल पहना दी। यह आने वाले बलिदान के प्रायश्चित का पूर्वाभास था।
पाप करने के बाद आदम और हव्वा ने अंजीर के पत्तों को एक साथ सिल दिया और खुद को ढक लिया। लेकिन अंजीर के ये पत्ते लंबे समय तक नहीं चल सके, क्योंकि वे धूप में सूख गए, टूट गए और उनके हलन चलन से अलग हो गए, और इस तरह अपने दोष को ढंकने में असमर्थ रहे। इसलिए आदम और हव्वा की ओर से, जिन्होंने अपनी लज्जा को अंजीर के पत्तों से ढँकने की कोशिश की, परमेश्वर ने एक जानवर को मार डाला, खाल के पहनावे बनाए, और उन्हें पहनाया। दुसरे शब्दों में, बलिदान के अर्पण के द्वारा परमेश्वर ने पापियों की सारी लज्जा को ढक दिया।
यह हमें परमेश्वर के प्रेम और उसके न्यायपूर्ण उद्धार के बारे में बताता है। आदम और हव्वा ने महसूस किया कि परमेश्वर ने उनके बजाय जानवर को मार डाला, और उन्होंने स्वयं उनकी सारी शर्म को ढँक दिया और उन्हें बचाया। फिर उन्होंने इस विश्वास को अपने बच्चों को दिया।
आदम के दो बेटे थे, कैन और हाबिल। कैन, पहले पुत्र ने अपने स्वयं के प्रयास और सामर्थ की उपज को अपनी भेंट के रूप में परमेश्वर को अर्पण किया, जबकि हाबिल की भेंट परमेश्वर के प्रायश्चित की व्यवस्था के अनुसार एक वध किया हुआ मेमना था। परमेश्वर ने किसको स्वीकार किया? ये दो भेंट पुराने नियम की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं में से एक थीं जिसने विश्वास की भेंट और मानव विचार की भेंट के बीच के अंतर को दिखाया। परमेश्वर ने हाबिल की भेंट स्वीकार की। बाइबल हमें बताती है कि परमेश्वर ने कैन की भूमि के फल और उसके पसीने और श्रम की भेंट को स्वीकार नहीं किया, बल्कि हाबिल की अपनी भेड़-बकरियों और उनके पहलौठों की भेंट और उनकी चर्बी को स्वीकार किया।
बाइबल बताती है, “और हाबिल भी अपनी भेड़–बकरियों के कई एक पहिलौठे बच्‍चे भेंट चढ़ाने ले आया और उनकी चर्बी भेंट चढ़ाई; तब यहोवा ने हाबिल और उसकी भेंट को तो ग्रहण किया।” परमेश्वर ने हाबिल की भेंट और बलिदान को आनंद के साथ स्वीकार किया। इस वचन से, हमें यह पढ़ने में सक्षम होना चाहिए की परमेश्वर का ह्रदय हमसे क्या चाहता है।
परमेश्वर हमें कैसे स्वीकार करेंगे? हर दिन हम उसके सामने इतने कमजोर होते हैं; हम कभी भी परमेश्वर के सामने कैसे खड़े हो सकते हैं? केवल एक ही रास्ता है जिससे हम परमेश्वर तक जा सकते हैं, केवल एक ही रास्ता है जो परमेश्वर ने हमारे लिए निर्धारित किया है। यह "बलि" के अलावा और कुछ नहीं है - हमारे "कर्मों" की भेंट नहीं, बल्कि हमारे "विश्वास" की भेंट। यही परमेश्वर स्वीकार करता है।
आदम और हव्वा ने अपने बच्चों को क्या विश्वास दिया था? यह "खाल के पहिनावे" का विश्वास था। दूसरे शब्दों में कहें तो यह वह विश्वास था जो बलिदान के माध्यम से प्रायश्चित में विश्वास करता था। आज, यह यीशु के पानी और लहू के सुसमाचार में विश्वास है: "मैं विश्वास करता हूं कि यीशु के बपतिस्मा और लहू से मेरे सारे पाप दूर हो गए, और मेरे स्थान पर उनका न्याय किया गया। मैं इस विश्वास को अपनी भेंट के रूप में देता हूं। मेरा मानना है कि बपतिस्मा लेने के बाद प्रभु ने मेरे सभी पापों को दूर कर दिया। मुझे विश्वास है कि मेरे सभी पाप यीशु पर पारित हो गए थे। जैसा कि परमेश्वर ने पुराने नियम में वादा किया था, यीशु मसीह ने बलि का मेमना बनकर और मेरे लिए मरकर मुझे पापरहित बनाया। मैं इस उद्धार में विश्वास करता हूं।"
जब हम यह विश्वास करते हुए परमेश्वर के सामने खड़े होते हैं कि प्रभु ने हमें इसी रीती से बचाया है, परमेश्वर इस विश्वास की भेंट को स्वीकार करते हैं और हमें गले लगाते हैं। क्यों? क्योंकि किसी ओर चीज से नहीं लेकिन केवल उसके "बलिदान" से हम परमेश्वर के सामने पापरहित और धर्मी हो गए हैं।
परमेश्वर ने हमें स्वीकार किया क्योंकि हमने उसे अपने विश्वास की भेंट दी जो यीशु को हमारे उद्धारकर्ता के रूप में मानता है। दुसरे शब्दों में, जब परमेश्वर ने यीशु के बलिदान को स्वीकार किया तब उसने हमें भी मसीह में स्वीकार किया। इसका कारण यह है कि हमारे सभी पाप बलिदान पर चढ़ा दिए गए थे। क्योंकि इस बलिदान पर हमारे पापों का न्याय दिया गया था, हम पापरहित हो गए हैं। यह परमेश्वर का न्याय और उसकी धार्मिकता है। यह परमेश्वर का प्रेम और उसका पूर्ण उद्धार भी है।
 
 
हम भी हाबिल के जैसा अर्पण भेंट करते है

बाइबल हमें बताती है कि परमेश्वर ने हाबिल के विश्वास की भेंट को खुशी के साथ स्वीकार किया। तो फिर, विश्वास की भेंट क्या है जिसे परमेश्वर आज हमसे स्वीकार करेगा? जब हम अपने दिलों में विश्वास करते हैं कि यीशु हमारा उद्धारकर्ता है, और उसने हमारे सभी पापों को दूर किया है और हमारे लिए न्याय सहा, और जब हम परमेश्वर को यह विश्वास देते हैं, तो परमेश्वर हमें इस विश्वास की भेंट के द्वारा स्वीकार करता है। भले ही हमारे कर्म कितने ही छोटे क्यों न हों, क्योंकि हमारे सभी पाप यीशु पर पारित हो गए थे, और क्योंकि यीशु का न्याय हमारे स्थान पर किया गया था, पिता परमेश्वर ने हमारे पापों को अपने पुत्र में पाया, हम में नहीं। इस प्रकार परमेश्वर ने हमारे सभी पापों को अपने पुत्र को सौंप दिया, हमारे स्थान पर उसका न्याय किया, उसे तीन दिनों में मरे हुओं में से जिलाया, और उसे अपने दाहिने हाथ पर बैठाया।
परमेश्वर ने उन सभी को बचाया है जो इस पर विश्वास करते हैं। उसने हमारे विश्वास की भेंट को स्वीकार कर लिया है। यीशु मसीह के बिना, हम कभी भी परमेश्वर के सामने खड़े नहीं हो सकते। परन्तु चूँकि यीशु हमारा निश्चित उद्धारकर्ता बन गया, हम इस विश्वास की भेंट के साथ परमेश्वर के पास जा सकते हैं, और इस भेंट के कारण, परमेश्वर हमें स्वीकार कर सकता है। क्या इस सत्य में हमारा पूरा विश्वास है? निश्चित रूप से है!
अब हम वास्तव में पापरहित हो गए हैं। क्योंकि हमारे पाप यीशु पर पारित किए गए थे, परमेश्वर ने हमें, जो पापरहित हो गए हैं, श्वेत वस्त्र पहिनाए। उसने हमें धर्मी बनाया। जैसा कि हमारे प्रभु ने वादा किया था, "जो जय पाए, उसे सफेद वस्त्र पहिनाए जाएंगे, और मैं उसका नाम जीवन की पुस्तक से किसी रीती से न काटूंगा," वह अपने स्वर्गदूतों के सामने हमारे नामों को स्वीकार करेगा।
सरदीस की परमेश्वर की कलीसिया में, कुछ ऐसे थे जो श्वेत वस्त्र पहिने प्रभु के साथ चलते थे। वे और कोई नहीं लेकिन परमेश्वर के दास, उसकी संतान और संत थे।
परमेश्वर ने हाबिल की भेंट स्वीकार की। और उसने हाबिल को भी ग्रहण किया। लेकिन परमेश्वर उस भेंट को स्वीकार नहीं करते हैं जो सम्पूर्ण नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर ने कैन और उसकी भेंट को स्वीकार नहीं किया। परमेश्वर ने कैन और उसकी भेंट को क्यों स्वीकार नहीं किया? उसने उन्हें स्वीकार नहीं किया क्योंकि कैन की भेंट प्रायश्चित के लहू से तैयार की गई जीवन की भेंट नहीं थी। बाइबल हमें बताती है कि कैन ने भूमि के फल, अपने स्वयं के प्रयास की उपज, अपनी भेंट के रूप में दिए। सीधे शब्दों में कहें तो उसने अपनी फसल की भेंट को अर्पण किया। ये तरबूज, मक्का, या आलू, या जो भी हो, निस्संदेह सभी साफ और अच्छी तरह से तैयार हो सकते हैं। लेकिन परमेश्वर ने इस तरह की भेंट को स्वीकार नहीं किया।
कैन की इस भेंट का एक महत्वपूर्ण अर्थ है जिसका आज के सभी मसीहियों को उद्धार पाने के लिए समझना चाहिए। लेकिन आज की दुनिया में बहुत कम लोग वास्तव में परमेश्वर के हृदय को जानते हैं, क्योंकि उनमें से बहुतों को इस बात का अंदाजा भी नहीं है, यहां तक कि अपने सपनों में भी नहीं, कि वे वास्तव में कैन की भेंट परमेश्वर को दे रहे हैं।
जब कोई परमेश्वर के सामने खड़ा होता है, तो उसे पहले अपने पापों के कारण खुद को मृत्यु और नरक के रूप में पहचानना चाहिए। क्या आप परमेश्वर के सामने इसे पहचानते हैं कि आप अपने पापों के कारण बर्बाद हो गए हैं और नरक में बंध गए हैं? यदि आप इसे स्वीकार नहीं करते हैं, तो आपको यीशु पर विश्वास करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यीशु पापियों का उद्धारकर्ता है। यहोवा ने हमसे कहा, “वैद्य भले चंगों के लिए नहीं परन्तु बीमारों के लिए आवश्यक है।” हमारे प्रभु की जरूरत उन आत्माओं को है जो पाप के जुए में तड़प रही हैं, न कि उन्हें जिन्हें अपने पापों का एहसास नहीं है और जो दावा करते हैं कि जब उनका नया जन्म होना बाकी है फिर भी वे पाप रहित हैं।
हर कोई मूल रूप से पापी है। इसलिए परमेश्वर को मनुष्यजाति का न्याय करना है, और मनुष्यजाति परमेश्वर के क्रोध के इस न्याय का सामना करने के लिए बाध्य है। दुसरे शब्दों में, आप और मैं सभी नष्ट होने के लिए अभिशप्त हैं। परन्तु हमें विनाश के इस नरक में भेजने से बचने के लिए, प्रभु ने यरदन नदी में अपने बपतिस्मा के द्वारा हमारे सभी पापों को दूर किया और हमारे स्थान पर परमेश्वर का न्याय प्राप्त किया। इस वजह से, प्रभु हम सभी को परमेश्वर के सामने पूरी तरह से बचा सका। इसलिए, केवल वे जो वास्तव में परमेश्वर के सामने पाप करते हैं और स्वयं को पापी के रूप में स्वीकार करते हैं, उन्हें परमेश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता है, और केवल उन्हीं के लिए परमेश्वर उद्धारकर्ता बन गया है।
 
 
ऐसा विश्वास जो हमें उद्धार के श्वेत वस्त्र पहनाता है

जैसा कि बाइबल हमें बताती है, "क्योंकि शरीर का जीवन लहू में है," मनुष्य का जीवन भी उसके लहू में है। हमारे पापों के कारण, हमें निश्चित रूप से मरना चाहिए। तो फिर, यीशु क्रूस पर क्यों मरे? वह क्रूस पर मरा क्योंकि उसने हमारे सभी पापों को अपने ऊपर ले लिया, और क्योंकि पाप की मजदूरी मृत्यु है, यीशु ने मजदूरी का भुगतान करने के लिए अपने जीवन का लहू बहाया और हमारे स्थान पर मर गया। इस सत्य की गवाही देने के लिए, उन्हें हमारे स्थान पर क्रूस पर चढ़ाया गया, लहू बहाया गया और क्रूस पर मर गया।
जैसा कि बाइबल हमें बताती है, "वह हमारे अपराधों के लिए घायल किया गया था, वह हमारे अधर्म के कामों के लिए कुचला गया था," यीशु वास्तव में हमारे अपराधों और अधर्म के कारण मर गया। इसलिए उसकी मृत्यु हमारी मृत्यु है, और उसका पुनरुत्थान हमारा पुनरुत्थान है। क्या आप इस पर विश्वास करते हैं?
यीशु हमें बचाने के लिए इस धरती पर आए और हमारे पापों को दूर करने के लिए बपतिस्मा लिया। यीशु को क्रूस पर भी चढ़ाया गया था। लोगों ने उसका तिरस्कार किया, उसके कपड़े लूंट लिए, उस पर थूंके, और उसके मुँह पर थप्पड़ मारे। यीशु, जो परमेश्वर है, उसको थप्पड़ मारने और उस पर थूकने के इस अपमान का सामना क्यों करना पड़ा? हमारे पापों के कारण हमारे प्रभु को तुच्छ जाना गया।
इसलिए, प्रभु की मृत्यु और पुनरुत्थान हम में से प्रत्येक की मृत्यु और पुनरुत्थान है। दुनिया के किसी भी धर्मगुरु ने हमारे पापों की सुधि नहीं ली। न तो मोहम्मद, न बुद्ध, और न ही इस दुनिया में किसी और ने हमारे पापों के लिए अपना जीवन दिया।
परन्तु यीशु मसीह, परमेश्वर का पुत्र, इस पृथ्वी पर आया और यरदन नदी में अपने बपतिस्मा के द्वारा हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया और हमें पापरहित बना दिया। और हमें हमारी मृत्यु, न्याय, विनाश और श्राप से छुड़ाने के लिए, उसने अपना जीवन दे दिया।
इसलिए, जैसा कि बाइबल हमें बताती है, "क्योंकि तुम में से जितनों ने मसीह में बपतिस्मा लिया है, उन्होंने मसीह को पहिन लिया है," यीशु के बपतिस्मा पर विश्वास करने के द्वारा जिसने हमारे सारे पापों को दूर किया है, हमारा विश्वास धार्मिकता के वस्त्र में पहिनाया जाना चाहिए और हमारे पापों के लिए प्रायश्चित किया जाना चाहिए। इस प्रकार यीशु के बपतिस्मा पर इस विश्वास में हमारी मृत्यु और पुनरुत्थान में हमारा विश्वास शामिल है।
परमेश्वर ने अपने पुत्र पर विश्वास करने वाले हमारे इस विश्वास को देखकर हमें अपनी सन्तान बनाया है। यह स्वीकार करने वाला है। परमेश्वर हमें हमारे विश्वास की भेंट को देखकर प्राप्त करता है जिसे हम उसके सामने लाते हैं। वह हमारे कामों को देखकर हमें ग्रहण नहीं करता, परन्तु परमेश्वर के पुत्र में हमारे विश्वास को देखकर हमें अपनी सन्तान के रूप में ग्रहण करता है, जो हमारे पापों को उठाने वाले सभी के उद्धारकर्ता के रूप में हमारे स्थान पर न्याय किया गया, और मरे हुओं में से दोबारा जी उठा।
मेरे प्यारे भाइयों और बहनों, यही सच्चा विश्वास है। हम अपने कर्मों से ही नहीं बचाए गए हैं, लेकिन हम यीशु मसीह के कामों से श्वेत वस्त्र पहने हुए हैं। किसी भी मनुष्य का कर्म शत-प्रतिशत शुद्ध नहीं हो सकता। हमारे दिलों को पापरहित बनाने के लिए, हमें अपने स्वयं के व्यर्थ प्रयास को छोड़ देना चाहिए, और इसके बजाय केवल प्रभु को अपने उद्धारकर्ता के रूप में मानना चाहिए। केवल इसी बात पर विश्वास करने के द्वारा ही हम श्वेत वस्त्र धारण कर सकते हैं।
तब हमारे नाम जीवन की पुस्तक में लिखे जाएंगे, और हम स्वर्गदूतों के सामने परमेश्वर द्वारा स्वीकार किए जाएंगे। यीशु स्वयं हमें परमेश्वर की सन्तान के रूप में पहचानेंगे, और कहेंगे, "मैंने तुम्हें बचाया है; तू धर्मी है, क्योंकि मैं ने तेरे सब पापों को मिटा दिया है।”प्रकाशितवाक्य से मुख्य भाग का यही सटीक अर्थ है जिसकी हम अब तक चर्चा कर रहे हैं। हमारे केवल तभी प्रायश्चित किए जासकते है जब हम परमेश्वर की कलीसिया में आते हैं, और प्रायश्चित केवल परमेश्वर की कलीसिया में पाया जाता है।
परमेश्वर पिता ने अपने पुत्र में हमारे विश्वास को देखकर हमें ग्रहण किया है। यद्यपि हमारी दुर्बलताओं और कमियों के कारण हम दैनिक आधार पर भटक जाते हैं और लगातार कमजोरियों में पड़ जाते हैं, परमेश्वर ने अपने पुत्र में हमारे विश्वास को देखा, और इस विश्वास के कारण उसने हमें स्वीकार किया है जैसे उसने अपने पुत्र को स्वीकार किया। हमारे प्रभु ने हमें बचाया है।
और उसने हम को श्वेत वस्त्र पहिनाए हैं। हमारे हृदय की निष्पापता में विश्वास हमारे श्वेत वस्त्रों को पहिनने का प्रमाण है। प्रभु ने हमसे वादा किया है कि, जब हम पहले श्वेत वस्त्र पहिने हुए अपने दिलों के साथ उसके सामने खड़े होंगे, तो वह हमारे शरीर को दैवीय शरीर में बदल देगा।
इस संसार में, परमेश्वर की कलीसियाएँ हैं जहाँ धर्मी और परमेश्वर के सेवक पाए जा सकते हैं। इन कलीसियाओं में ऐसे लोग हैं जो सफेद वस्त्र पहिने हुए हैं, और परमेश्वर अपनी कलीसियाओं और अपने सेवकों के द्वारा कार्य करता है।
आइए हम प्रकाशितवाक्य ३:५ की ओर लौटते है: “जो जय पाए उसे इसी प्रकार श्‍वेत वस्त्र पहिनाया जाएगा, और मैं उसका नाम जीवन की पुस्तक में से किसी रीति से न काटूँगा; पर उसका नाम अपने पिता और उसके स्वर्गदूतों के सामने मान लूँगा।”
एक पूर्व शर्त जो परमेश्वर ने हमें उपरोक्त भाग में दी है वह यह है कि वह केवल "जो जय प्राप्त करता है" उसे ही श्वेत वस्त्र पहिनाएगा। हमें जय पाना ही चाहिए। लेकिन जो लोग, यीशु में विश्वास करते हुए भी यह मानते हैं कि उनके दैनिक पापों को उनके दैनिक अंगीकार द्वारा क्षमा किया जाना चाहिए, वे वो लोग नहीं हैं जिन्होंने शैतान के खिलाफ अपनी लड़ाई में जीत हासिल की, बल्कि वे लोग है जो पराजित हुए थे। ऐसा विश्वास वाले लोग कभी भी श्वेत वस्त्र नहीं पहन सकते। वे कभी धर्मी नहीं बन सकते। 
केवल वे जो जय प्राप्त करते हैं वे उद्धार के प्रभु के सिद्ध कार्य में विश्वास करते हैं। प्रभु ने आपको पहले से ही वह विश्वास दिया है जो पवित्रीकरण या धर्मी ठहराने के सिद्धांत जैसे झूठे सिद्धांतों पर विजय प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर ने हमें अपने सच्चे सुसमाचार यानी बपतिस्मा और लहू के सुसमाचार से बचाया है, ताकि हम उन झूठे सुसमाचारों से लड़ सकें और उन पर जय पा सकें जो हमें पूर्ण उद्धार नहीं देते और हम शैतान से छूटकारा पा सके।
हमें केवल अपने पापों को विश्वास से सौंपना चाहिए, अपने दिलों में ठोस रूप से यह समझना चाहिए कि हमारे सभी पाप वास्तव में यीशु को सौंपे गए हैं। और हमें विश्वास करना चाहिए कि जब यीशु की मृत्यु हुई तो हम मर गए, और यह कि उसकी मृत्यु हमारे स्थान पर प्रतिवर्ती थी। हमें यह भी विश्वास करना चाहिए कि यीशु हमें फिर से जीवित करने के लिए मरे हुओं में से जी उठा। जब हमारे पास सत्य का यह ठोस विश्वास होता है, तब परमेश्वर हमारे विश्वास को देखकर हमें धर्मी मानते हैं।
इसे अलग तरह से देखे तो यह वचन का अर्थ है, "पर जितनों ने उसे ग्रहण किया, उस ने उन्हें परमेश्वर की सन्तान होने का अधिकार दिया, अर्थात जो उसके नाम पर विश्वास करते हैं" (यूहन्ना १:१२)। लोग केवल अपने मुँह से "मैं यीशु पर विश्वास करता हूँ" कहने मात्र से परमेश्वर की सन्तान नहीं हो जाते, जबकि वास्तव में उन्हें यीशु के बारे में ठीक से ज्ञान भी नहीं है।
परमेश्वर का वचन आगे कहता है, "जो न लहू से, न शरीर की इच्छा से, न मनुष्य की इच्छा से, परन्तु परमेश्वर से उत्पन्न हुए हैं।" ये सही है। परमेश्वर की सन्तान बनना विश्वास से ही संभव है। इसके लिए हमें झूठों के खिलाफ लड़ना चाहिए और उन पर जय पानी चाहिए। जिन लोगों ने इस प्रकार झूठे लोगों पर जय पाने के द्वारा पाप की क्षमा प्राप्त की है, उन्हें अपने शरीर की अभिलाषाओं पर जय पाने के द्वारा परमेश्वर के साथ चलना चाहिए। दूसरे शब्दों में, उन्हें परमेश्वर की इच्छा से जीना चाहिए।
तो फिर, परमेश्वर की इच्छा क्या है? परमेश्वर की इच्छा उन लोगों के लिए है जिन्हें श्वेत वस्त्र पहनाए गए हैं कि वे एक हो जाएं और परमेश्वर के सुसमाचार की सेवा करें। उसकी इच्छा धर्मी लोगों के लिए है, भले ही वे अलग रहें, परमेश्वर की आराधना, सेवा और स्तुति करने के लिए एक साथ इकट्ठा हों, और पापियों को सुसमाचार फैलाएं ताकि वे भी श्वेत वस्त्र पहन सकें। आत्माओं के उद्धार के लिए काम करने का यह जीवन परमेश्वर के लोगों का जीवन है, उनके सेवकों का जीवन है।
जब हम ऐसा जीवन जीते हैं, तो परमेश्वर न केवल हमें अपनी "धार्मिकता" के कपड़े पहनाता है, बल्कि वह हमें इस पृथ्वी पर समृद्धि और स्वर्ग की आत्मिक दोनों आशीषें भी देता है। हमें अपने आस-पास के लोगों को इस सुसमाचार का प्रचार करवाने के द्वारा, परमेश्वर उन्हें भी श्वेत वस्त्र पहनाता है। परमेश्वर ने सभी धर्मी लोगों और उनके आसपास के लोगों को श्वेत वस्त्र पहनाए हैं। परमेश्वर ने हमें सत्य के वचन में विश्वास करने के द्वारा असत्य के विरुद्ध हमारी लड़ाई में जय प्राप्त करने की अनुमति दी है। और उसने इस आत्मिक संघर्ष में जय प्राप्त करने वाले धर्मियों को श्वेत वस्त्र पहिनने का आशीष दिया है। प्रभु की स्तुति हो!