उपदेश

विषय १० : प्रकाशितवाक्य (प्रकाशितवाक्य पर टिप्पणी)

[अध्याय 5-1] यीशु जिसे परमेश्वर पिता के प्रतिनिधि के रूप में सिंहासन पर बिठाया गया ( प्रकाशितवाक्य ५:१-१४ )

यीशु जिसे परमेश्वर पिता के प्रतिनिधि के रूप में सिंहासन पर बिठाया गया
( प्रकाशितवाक्य ५:१-१४ )
“जो सिंहासन पर बैठा था, मैं ने उसके दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखी जो भीतर और बाहर लिखी हुई थी, और वह सात मुहर लगाकर बन्द की गई थी। फिर मैं ने एक बलवन्त स्वर्गदूत को देखा जो ऊँचे शब्द से यह प्रचार करता था, “इस पुस्तक के खोलने और उसकी मुहरें तोड़ने के योग्य कौन है?” परन्तु न स्वर्ग में, न पृथ्वी पर, न पृथ्वी के नीचे कोई उस पुस्तक को खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य निकला। तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य कोई न मिला। इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, “मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है।” तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेम्ना खड़ा देखा। उसके सात सींग और सात आँखें थीं; ये परमेश्‍वर की सातों आत्माएँ हैं जो सारी पृथ्वी पर भेजी गई हैं। उसने आकर उसके दाहिने हाथ से जो सिंहासन पर बैठा था, वह पुस्तक ले ली। जब उसने पुस्तक ले ली, तो वे चारों प्राणी और चौबीसों प्राचीन उस मेम्ने के सामने गिर पड़े। उनमें से हर एक के हाथ में वीणा और धूप, जो पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ हैं, से भरे हुए सोने के कटोरे थे। वे यह नया गीत गाने लगे,
“तू इस पुस्तक के लेने, और इसकी मुहरें खोलने के योग्य है;
क्योंकि तूने वध होकर अपने लहू से
हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से
परमेश्‍वर के लिये लोगों को मोल लिया है,
और उन्हें हमारे परमेश्‍वर के लिये एक
राज्य और याजक बनाया;
और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं।”
जब मैं ने देखा, तो उस सिंहासन और उन प्राणियों और उन प्राचीनों के चारों ओर बहुत से स्वर्गदूतों का शब्द सुना, जिन की गिनती लाखों और करोड़ों की थी, और वे ऊँचे शब्द से कहते थे, “वध किया हुआ मेम्ना ही सामर्थ्य और धन और ज्ञान और शक्‍ति और आदर और महिमा और धन्यवाद के योग्य है!” फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, “जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेम्ने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!” और चारों प्राणियों ने आमीन कहा, और प्राचीनों ने गिरकर दण्डवत् किया।” 
 

विवरण

वचन १: “जो सिंहासन पर बैठा था, मैं ने उसके दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखी जो भीतर और बाहर लिखी हुई थी, और वह सात मुहर लगाकर बन्द की गई थी।”
यह यहाँ कहता है कि परमेश्वर पिता के दाहिने हाथ में सात मुहरों से मुहरबंद एक पुस्तक थी। हमारे प्रभु यीशु मसीह ने पिता के दाहिने हाथ में रखे इस पुस्तक को लिया, जिसका अर्थ है कि यीशु को स्वर्ग का सारा अधिकार दिया गया है। 

वचन २-४: “फिर मैं ने एक बलवन्त स्वर्गदूत को देखा जो ऊँचे शब्द से यह प्रचार करता था, “इस पुस्तक के खोलने और उसकी मुहरें तोड़ने के योग्य कौन है?” परन्तु न स्वर्ग में, न पृथ्वी पर, न पृथ्वी के नीचे कोई उस पुस्तक को खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य निकला। तब मैं फूट फूटकर रोने लगा, क्योंकि उस पुस्तक के खोलने या उस पर दृष्‍टि डालने के योग्य कोई न मिला।”
यीशु के अलावा कोई नहीं था, जो दुनिया का न्याय कर सके, नए स्वर्ग और पृथ्वी का निर्माण कर सके, और इसमें संतों के साथ पिता परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में रह सके।

वचन ५: “इस पर उन प्राचीनों में से एक ने मुझ से कहा, “मत रो; देख, यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है, उस पुस्तक को खोलने और उसकी सातों मुहरें तोड़ने के लिये जयवन्त हुआ है।”
यहाँ, वाक्यांश “यहूदा के गोत्र का वह सिंह जो दाऊद का मूल है” इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यीशु मसीह सर्वशक्तिमान परमेश्वर और राजाओं का राजा है जो पिता की योजना को सम्पूर्ण रीती से पूरा करने के योग्य और सक्षम है। यीशु मसीह स्वयं परमेश्वर हैं और परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं जो पिता की योजना को पूरा करेंगे।
 
वचन ६: “तब मैं ने उस सिंहासन और चारों प्राणियों और उन प्राचीनों के बीच में, मानो एक वध किया हुआ मेम्ना खड़ा देखा। उसके सात सींग और सात आँखें थीं; ये परमेश्‍वर की सातों आत्माएँ हैं जो सारी पृथ्वी पर भेजी गई हैं।”
यीशु मसीह, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार पिता परमेश्वर से प्राप्त किया है, वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर है जिसने सभी चीजों को बनाया है। वह वही है जो मनुष्य के शरीर में इस पृथ्वी पर आया, उसने संसार के सभी पापों को उठा लिया, और हमें हमारे पापों से छुडाने के लिए इन पापों के लिए मर गया।

वचन ७: “उसने आकर उसके दाहिने हाथ से जो सिंहासन पर बैठा था, वह पुस्तक ले ली।” 
क्योंकि यीशु मसीह परमेश्वर के रूप में योग्य था इसलिए वह पिता से पुस्तक को ले पाया। इसका मतलब है कि तब से, हमारे प्रभु, परमेश्वर के सारे कार्य को पूरा कर रहे है।
 
वचन ८: “जब उसने पुस्तक ले ली, तो वे चारों प्राणी और चौबीसों प्राचीन उस मेम्ने के सामने गिर पड़े। उनमें से हर एक के हाथ में वीणा और धूप, जो पवित्र लोगों की प्रार्थनाएँ हैं, से भरे हुए सोने के कटोरे थे।”
इसका अर्थ है कि यीशु मसीह पिता के लिए परमेश्वर के रूप में कार्य करेगा, जिसका पहला कार्य संतों की प्रार्थनाओं को सुनना है जो २४ प्राचीनों और चार जीवित प्राणियों द्वारा प्रदान की गई हैं।

वचन ९: “वे यह नया गीत गाने लगे, “तू इस पुस्तक के लेने, और इसकी मुहरें खोलने के योग्य है; क्योंकि तूने वध होकर अपने लहू से हर एक कुल और भाषा और लोग और जाति में से परमेश्‍वर के लिये लोगों को मोल लिया है,” 
यहाँ, परमेश्वर के प्रतिनिधि बनने के बाद स्वर्ग के सेवको द्वारा यीशु मसीह की प्रशंसा की जा रही है। इस पृथ्वी पर पापियों को संसार के पापों से बचाने के लिए स्वर्ग के सेवको ने यीशु मसीह की प्रशंसा की। इस पृथ्वी पर रहते हुए, यीशु ने पापियों को दुनिया के सभी पापों से बचाने के लिए यूहन्ना द्वारा बपतिस्मा लिया और क्रूस पर मर गए, और उन्होंने अपने स्वयं के लहू से पाप की मजदूरी का भुगतान करके इन पापियों को पिता के लिए छुड़ाया। यही कारण है कि स्वर्ग के सेवक उनके धर्मी कार्यों की प्रशंसा कर रहे हैं जो उसका परमेश्वर बन गया है।
 
वचन १०: “और उन्हें हमारे परमेश्‍वर के लिये एक राज्य और याजक बनाया; और वे पृथ्वी पर राज्य करते हैं।” 
यीशु मसीह, जो परमेश्वर पिता का प्रतिनिधि बन गया, उसने संतों को परमेश्वर के राज्य के लोगों और याजकों में बदल दिया, और उन्हें उन पर शासन करने के लिए नियुक्त किया। इस प्रकार वह स्वर्ग के सेवको से सभी महिमा और प्रशंसा प्राप्त करने के लिए और भी अधिक योग्य था।
 
वचन ११-१२: “जब मैं ने देखा, तो उस सिंहासन और उन प्राणियों और उन प्राचीनों के चारों ओर बहुत से स्वर्गदूतों का शब्द सुना, जिन की गिनती लाखों और करोड़ों की थी, और वे ऊँचे शब्द से कहते थे, “वध किया हुआ मेम्ना ही सामर्थ्य और धन और ज्ञान और शक्‍ति और आदर और महिमा और धन्यवाद के योग्य है!” 
क्योंकि यीशु ने यूहन्ना से बपतिस्मा लेने के द्वारा अपनी देह पर जगत के सभी पापों को उठा लिया था, वह क्रूस पर लहू बहा सका, और इसलिए वह पिता के प्रतिनिधि के रूप में स्वर्ग के सभी प्राणियों से शक्ति, धन, ज्ञान, सामर्थ, सम्मान, महिमा और आशीर्वाद प्राप्त करने के योग्य है। स्वर्ग के सेवको और उसके स्वर्गदूतों से घिरे, वह उनकी सभी प्रशंसा और आराधना प्राप्त करता है। हल्लेलूयाह! प्रभु की स्तुति हो! परमेश्वर के सिंहासन के चारों ओर चार जीवित प्राणी और २४ प्राचीन थे। उन्होंने उस परमेश्वर की स्तुति की, जिसने सभी आत्माओं को पाप से छुड़ाया, क्योंकि उसकी महिमा अनंत है।
 
वचन १३-१४: “फिर मैं ने स्वर्ग में और पृथ्वी पर और पृथ्वी के नीचे और समुद्र की सब सृजी हुई वस्तुओं को, और सब कुछ को जो उनमें हैं, यह कहते सुना, “जो सिंहासन पर बैठा है उसका और मेम्ने का धन्यवाद और आदर और महिमा और राज्य युगानुयुग रहे!” और चारों प्राणियों ने आमीन कहा, और प्राचीनों ने गिरकर दण्डवत् किया।”
अंत में, यीशु मसीह, जो परमेश्वर के प्रतिनिधि बने, उसे स्वर्ग के सेवकों से सभी प्रशंसा और आराधना प्राप्त करने योग्य उठाया गया। स्वर्ग के सभी सेवकों ने उसे हमेशा-हमेशा के लिए आशीर्वाद, सम्मान और महिमा दी, क्योंकि यह सबसे आश्चर्यजनक और आभारी था कि परमेश्वर इतने योग्य होंगे। स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में सभी संतों को उसे महिमा और सम्मान देना चाहिए जो पिता परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में बिराजमान है।